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क्या अमेरिका से ट्रेड डील कर भारत ने सबसे अच्छा विकल्प चुना, रूस से तेल खरीद होगी बंद?

डॉ. राजन कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 04, 2026 18:27 pm IST
    • Published On फ़रवरी 04, 2026 18:27 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 04, 2026 18:27 pm IST
क्या अमेरिका से ट्रेड डील कर भारत ने सबसे अच्छा विकल्प चुना, रूस से तेल खरीद होगी बंद?

एक साल से अधिक समय तक चले लंबे और जटिल वार्ता के बाद भारत और अमेरिका ने व्यापार समझौते की घोषणा की है. यह समझौता महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे निर्यातकों को राहत मिलेगी और दोनों देशों के बीच संबंधों को खराब करने वाली अनिश्चितता का अंत होगा. यह समझौता उन संबंधों में एक नए सिरे से शुरुआत का संकेत देता है जो दंडात्मक टैरिफ और यूक्रेन-रूस के युद्ध से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों के कारण तनावपूर्ण हो गए थे.

समझौते का विस्तृत विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ को 25 फीसद से घटाकर 18 फीसद करने पर सहमति जताई है. रूस से तेल आयात पर भारत पर लगाए गए 25 फीसद के दंडात्मक टैरिफ को भी हटा दिया गया है. इसके बदले में, भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर शून्य टैरिफ लगाने पर सहमति जताई है.

18 फीसदी टैरिफ का आधार क्या है

दोनों देश 18 फीसद के आंकड़े पर कैसे पहुंचे, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि गहन सौदेबाजी के बाद उन्होंने बीच का रास्ता निकाला. श्रम प्रधान कपड़ा, चमड़ा, मत्स्य, इंजीनियरिंग सामान, रत्न इत्यादि क्षेत्रों में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी बने रहेंगे. भारत को इंडोनेशिया, बांग्लादेश, वियतनाम, चीन और पाकिस्तान जैसी प्रतिस्पर्धी निर्यात अर्थव्यवस्थाओं पर सीमांत बढ़त हासिल है. बांग्लादेश और वियतनाम पर टैरिफ 20 फीसद, पाकिस्तान पर 19 फीसद और चीन पर 37 फीसद है. हालांकि, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया की तुलना में भारत पर टैरिफ अधिक है. इन देशों पर अमेरिका का टैरिफ 15 फीसद है.

इस समझौते की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया,''आज अपने प्रिय मित्र राष्ट्रपति ट्रंप से बात करके बहुत अच्छा लगा. यह जानकर खुशी हुई कि अब 'मेड इन इंडिया' उत्पादों पर टैरिफ घटकर 18% हो जाएगा. इस शानदार घोषणा के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप को बहुत-बहुत धन्यवाद.'' लेकिन विपक्षी दल इस समझौते का कड़ा विरोध कर रहे हैं.

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विपक्षी दलों ने विशेष रूप से तीन चिंताओं को रेखांकित किया है- पहली, भारत 18 फीसद टैरिफ पर क्यों सहमत हुआ जबकि अमेरिकी उत्पादों पर भारत में शून्य टैरिफ है; दूसरी- अमेरिकी दबाव के कारण भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा और तीसरी- कृषि और दुग्ध उत्पादों के अमेरिकी निर्यात से भारतीय किसान बर्बाद हो जाएंगे.

क्या कहते हैं भारत अमेरिका व्यापार के आंकड़े

भारत द्वारा स्वीकार किए गए 18 फीसद अमेरिकी टैरिफ के मुद्दे पर, व्यापक संदर्भ को समझना अत्यंत आवश्यक है. आइए कुछ ठोस आंकड़ों पर गौर करें. अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार,साल 2024 में भारत के साथ अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार करीब 212.3 अरब डॉलर था. यदि हम केवल वस्तुओं के व्यापार की बात करें, तो साल 2024 में भारत के साथ कुल अमेरिकी व्यापार (निर्यात और आयात) लगभग 128.9 अरब डॉलर था. भारत ने 87.3 अरब डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया और केवल 41.5 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी उत्पादों का आयात किया. भारत के साथ अमेरिका का माल व्यापार घाटा 45.8 अरब डॉलर था. व्यापार घाटा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख मुद्दा बन गया है. हर देश व्यापार असंतुलन को कम करने का प्रयास कर रहा है. ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में अमेरिका उच्च टैरिफ और अपने विनिर्माण केंद्रों को बढ़ावा देने वाली संरक्षणवादी नीति को सख्ती से आगे बढ़ा रहा है. यदि भारत का व्यापार अधिशेष 45.8 अरब डॉलर है, तो कुछ समझौता आवश्यक हो जाता है.

भारत अमेरिका से समझौता नहीं करता तो क्या करता

भारत के पास दो विकल्प थे: अपने रुख पर अड़े रहना और किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर न करना या दूसरा सबसे अच्छा विकल्प एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करना था जो आदर्श तो नहीं था, लेकिन विशुद्ध मौद्रिक और वाणिज्यिक दृष्टि से लाभदायक था. यदि भारत समझौतों पर हस्ताक्षर करने में देरी करता, तो भारतीय निर्यातकों के ग्राहक अन्य देशों के निर्यातकों के पास चले जाते और उन्हें वापस लाना मुश्किल होता. इसलिए, कम लाभ सीमा होने के बावजूद भी खुद को बचाए रखने के प्रयास में नई दिल्ली ने दूसरा विकल्प चुना. विशुद्ध वाणिज्यिक दृष्टि से, यह कोई आदर्श सौदा नहीं है, लेकिन भारत के लिए उपलब्ध दूसरा सबसे अच्छा विकल्प है. जब अन्य सभी देश टैरिफ के दायरे में हैं, तो यह उम्मीद करना कि भारत को पूरी तरह से छूट मिल जाएगी, केवल एक कोरी कल्पना थी.

दूसरा मुद्दा रूस से तेल आयात बंद करना और वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावना है. ट्रंप दो कारणों से भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए कह रहे हैं: उनका मानना है कि इससे रूस यूक्रेन के साथ समझौता करने में मदद मिलेगी और दूसरा, अमेरिका खुद अन्य देशों को तेल बेचना चाहता है क्योंकि वह सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन गया है. वेनेजुएला के तेल पर नियंत्रण होने के कारण, वह नए बाजार तलाशने के लिए भी अधिक उत्सुक है. लेकिन अमेरिका भारत को वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए कितना राजी कर पाएगा, यह कहना मुश्किल है. भारत में, रूसी तेल का आयात ज्यादातर निजी कंपनियों द्वारा किया जाता था, जिसका मुख्य कारण रूस द्वारा दी जाने वाली रियायती और सस्ती कीमत थी.भारत की निजी कंपनियां वेनेजुएला से तेल तभी खरीदेंगी जब कीमत वैश्विक तेल कीमतों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी होगी. यदि कीमत अधिक है, तो सरकार निजी कंपनियों को महंगा तेल खरीदने के लिए राजी नहीं कर सकती, यहां तक कि ओएनजीसी (ONGC) जैसी सरकारी तेल कंपनियां भी महंगी कीमत पर तेल नहीं खरीद सकतीं. यह कंपनी की वित्तीय सेहत के लिए खतरनाक होगा. इस तरह के किसी भी दुस्साहस के लिए भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा. हालांकि, यह संभावना जरूर है कि रूसी तेल का आयात धीरे-धीरे कम हो जाएगा, क्योंकि तेल व्यापार में शामिल निजी कंपनियां पश्चिम द्वारा लगाए जाने वाले द्वितीयक प्रतिबंधों और दंडात्मक उपायों से डरती हैं.

अमेरिका के लिए कृषि क्षेत्र को कितना खोलेगा भारत

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कृषि क्षेत्र को आयात के लिए खोलना है. यह अब तक का सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है. यह सत्ताधारी सरकार के लिए बेहद खतरनाक और राजनीतिक रूप से अस्थिरता पैदा करने वाला मुद्दा है. अमेरिका से सस्ते अनाज और दुग्ध उत्पादों से भारतीय किसानों की सीमित आय में भारी कमी आ सकती है. भारतीय किसान अमेरिका के उन बड़े किसानों से प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं हैं, जिन्हें सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है और जो काफी धनवान हैं.

अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका और भारत टैरिफ को 18 फीसदी ही करने पर कैसे सहमत हुए.

अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका और भारत टैरिफ को 18 फीसदी ही करने पर कैसे सहमत हुए.

कृषि और दुग्ध उत्पादों के आयात पर हुए समझौते के बारे में फिलहाल सब कुछ स्पष्ट नहीं है. ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सरकार कृषि के कुछ क्षेत्रों को खोलने पर सहमत हो सकती है, लेकिन सरकार आनुवंशिक रूप से संशोधित  (Genetically Modified) अनाजों के लिए बाजार नहीं खोलेगी. सरकार फलों के कुछ क्षेत्रों को भी खोल सकती है, जैसा कि उसने अन्य मुक्त व्यापार समझौतों के साथ भी किया है. सरकार ने किसानों को आश्वासन दिया है कि उनके हितों की हर कीमत पर रक्षा की जाएगी, लेकिन ट्रंप प्रशासन के दबाव को झेलने में वह कितनी सफल होती है, यह देखना अभी बाकी है. कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक लोग कार्यरत हैं और उनकी सुरक्षा एवं आजीविका सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए.

बहरहाल, यह व्यापार समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. ट्रंप की नीतियों और बयानों के कारण, संबंध बेहद निचले स्तर पर पहुंच गए थे. ऐसी उम्मीद है कि यह समझौता संबंधों में और गिरावट को रोकेगा और एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है. किसी को अमेरिका पसंद हो या नापसंद, यह एक सच्चाई है कि आने वाले सालों में भी अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपना दबदबा बनाए रखेगा. प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, शिक्षा और शक्तिशाली भारतीय प्रवासी कारकों के कारण भारत के लिए अमेरिका का महत्व बना रहेगा. भारत के प्रति चीन और पाकिस्तान की शत्रुता को देखते हुए भू-राजनीतिक कारणों से भी अमेरिका का महत्व बना रहेगा. व्यापार वार्ता के दौरान हम इन सभी कारकों को नजरअंदाज नहीं कर सकते. इसलिए, यह समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को स्थिर करने के लिए महत्वपूर्ण है और कोई भी समझौता अंतिम नहीं होता, इसमें हमेशा बदलाव और पुनर्विचार की गुंजाइश रहती है.

(डिस्क्लेमर: डॉक्टर राजन कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फार रसियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में पढ़ाते हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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