कभी आपने सोचा है कि आपके घर की रसोई में इस्तेमाल होने वाले सूरजमुखी के तेल का यूक्रेन युद्ध से क्या संबंध हो सकता है? शायद पहली नजर में कोई संबंध दिखाई न दे. लेकिन दुनिया की राजनीति ऐसी ही होती है. युद्ध कहीं और होता है, मिसाइलें कहीं और गिरती हैं, लेकिन उसका असर कभी-कभी हजारों किलोमीटर दूर किसी भारतीय परिवार की रसोई तक पहुंच जाता है. शायद यही वजह है कि भारत अब केवल यह कहने तक सीमित नहीं रहना चाहता कि युद्ध का समाधान बातचीत से होना चाहिए. वह बातचीत को संभव बनाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है.
कौन कौन से देश बनना चाहते हैं मध्यस्थ
पिछले दिनों यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने कहा कि यूक्रेन के सामने युद्धविराम के चार प्रस्ताव हैं, भारत, अमेरिका, मिस्र और तुर्किये के. इनमें भारत का प्रस्ताव 'सबसे व्यापक' है. यह एक छोटी-सी कूटनीतिक टिप्पणी लग सकती है. लेकिन ध्यान से देखें तो इसके पीछे एक बड़ी कहानी छिपी है. भारत ने आखिर ऐसा प्रस्ताव दिया ही क्यों और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है? पहले यह समझना जरूरी है कि भारत ने अभी तक अपने प्रस्ताव का पूरा पाठ सार्वजनिक नहीं किया है. यूक्रेन ने इसे सबसे व्यापक प्रस्ताव जरूर बताया है. रूस की ओर से भी भारत के प्रयासों को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों को 'बहुत अच्छा' बताया. सितंबर में क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी कहा था कि रूस भारत के किसी भी प्रयास का स्वागत करेगा. लेकिन यहां एक बारीक अंतर है. किसी प्रस्ताव की तारीफ करना और उसे स्वीकार करना, दो अलग-अलग बातें हैं. रूस ने अभी तक भारत के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार करने की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है. कूटनीति में शब्दों के बीच का यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण होता है. तो फिर भारत अभी क्यों आगे बढ़ रहा है?
अगस्त के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन से मुलाकात की और उनसे 'अंतहीन युद्ध' से 'युद्ध के अंत' की ओर बढ़ने की अपील की. सितंबर की शुरुआत में विदेश मंत्री एस जयशंकर यूक्रेन गए. यह उनकी यूक्रेन की पहली स्वतंत्र यात्रा थी. उन्होंने साफ कहा कि भारत अपनी क्षमता के अनुसार समाधान खोजने में मदद करने के लिए तैयार हैं. इसके बाद न्यूयॉर्क में भारत ने रूस और यूक्रेन, दोनों के विदेश मंत्रियों से बातचीत की. यानी यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है. लगता है, पिछले कुछ सप्ताह से चल रही बातचीत अब एक प्रस्ताव का रूप ले चुकी है.
भारत क्यों कर रहा है मध्यस्थता की पहल
भारत को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? क्योंकि यूक्रेन का युद्ध अब भारत से बहुत दूर नहीं रह गया है. ब्लैक सी में हुए हमलों में भारतीय नाविकों की मौत हुई है. जुलाई के मध्य से कम से कम पांच भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है. इनमें चार की मौत रूसी मिसाइल से MV Golden Leo नाम के जहाज को हुए नुकसान के बाद हुई. भारत ने रूस और यूक्रेन, दोनों के राजदूतों को तलब किया. प्रधानमंत्री मोदी ने भी पुतिन के साथ बातचीत में इस मुद्दे को उठाया. लेकिन कहानी केवल भारतीय नागरिकों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. इस साल की पहली छमाही में भारत के वनस्पति तेल आयात में सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी करीब पांचवां हिस्सा थी. इसमें से करीब 10 लाख टन ब्लैक सी क्षेत्र से आया. अब अगर ब्लैक सी में जहाज सुरक्षित नहीं हैं, तो उसका असर सिर्फ यूक्रेन और रूस पर नहीं पड़ेगा. भारत पर भी पड़ेगा. 24 सितंबर को भारत ने कच्चे सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क शून्य कर दिया. लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि सुरक्षित समुद्री गलियारा नहीं बनता है, तो अक्टूबर से ब्लैक सी के रास्ते सूरजमुखी तेल की आपूर्ति हर महीने 3 से 3.5 लाख टन तक कम हो सकती है यानी युद्ध का एक रास्ता सीधे भारत की रसोई तक आता है. उर्वरक की स्थिति भी अलग नहीं है. तेल की कहानी तो और भी दिलचस्प है. युद्ध से पहले भारत के कुल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी महज 0.2 फीसद थी. जुलाई में यह आधे से अधिक हो गई. लेकिन अब रूस से तेल खरीदना भारत के लिए केवल आर्थिक फैसला नहीं रह गया है. अमेरिका ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसद तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोल दिया है. इसलिए यूक्रेन युद्ध भारत के लिए अब यूरोप का युद्ध नहीं है. यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक हितों का भी सवाल है. इसीलिए भारत शांति चाहता है.
क्या भारत शांति करा सकता है? इसी सवाल पर थोड़ा सावधान होना पड़ेगा. भारत के पास अमेरिका जैसा आर्थिक दबाव बनाने का जरिया नहीं है. उसके पास रूस पर प्रतिबंध लगाने या हटाने की शक्ति नहीं है. उसके पास यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने की क्षमता भी नहीं है. ब्लैक सी के मामले में तुर्किये का अनुभव भारत से अधिक है. उसने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर पहले अनाज समझौते को संभव बनाया था.
भारत के सामने चुनौतियां क्या हैं
फिर भारत के पास क्या है? भारत के पास पहुंच है. यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. पुतिन भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखते हैं जो युद्ध खत्म करने की ईमानदार कोशिश कर सकता है. दूसरी तरफ, जेलेंस्की भी भारत को ग्लोबल साउथ के उन देशों में गिन चुके हैं जो शांति प्रक्रिया में भूमिका निभा सकते हैं. भारत रूस से बात कर सकता है. भारत यूक्रेन से भी बात कर सकता है और भारत पश्चिम से भी बात कर सकता है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क है. पहुंच और प्रभाव एक ही चीज नहीं हैं. भारत दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक ला सकता है. लेकिन मेज पर क्या समझौता होगा, यह भारत अकेले तय नहीं कर सकता. यही उसकी सबसे बड़ी सीमा है और सबसे बड़ी चुनौती भी. क्योंकि युद्धविराम केवल यह कह देने से नहीं होता कि अब गोली मत चलाइए. कौन निगरानी करेगा? उल्लंघन हुआ तो कौन तय करेगा कि किसने किया? उसका जवाब कौन देगा? युद्धविराम से ज्यादा मुश्किल है, युद्धविराम पर भरोसा करना.
भारत के सामने दूसरी चुनौती इससे भी बड़ी है. रूस और यूक्रेन के बीच असली विवाद केवल ऊर्जा प्रतिष्ठानों का नहीं है, असली सवाल क्षेत्र का है, सुरक्षा का है. यूक्रेन को भविष्य में सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? रूस को यूरोप की बदलती सुरक्षा व्यवस्था में अपनी जगह कैसे मिलेगी? इन सवालों का जवाब केवल ब्लैक सी में जहाजों को सुरक्षित करके नहीं दिया जा सकता. इसलिए भारत की पहल को छोटे कदमों से शुरू करना होगा. पहले जहाज सुरक्षित हों. फिर अनाज और तेल की आवाजाही सामान्य हो. फिर ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रुकें. फिर दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा हो और शायद उसके बाद बड़े राजनीतिक सवालों पर बातचीत शुरू हो. युद्ध भी अक्सर इसी तरह खत्म होते हैं. एक छोटी सी व्यवस्था दूसरी बड़ी व्यवस्था का रास्ता खोलती है. लेकिन यदि भारत इसमें सफल होता है, तो उसे केवल यूक्रेन में शांति का लाभ नहीं मिलेगा. भारत की विदेश नीति को भी इससे बहुत कुछ मिलेगा. पिछले कुछ सालों में भारत ने 'रणनीतिक स्वायत्तता' की बात बहुत की है. इसका अर्थ क्या है? सिर्फ इतना नहीं कि भारत किसी एक खेमे में नहीं है. इसका बड़ा अर्थ यह है कि भारत सभी खेमों से बात कर सकता है और यदि भारत की कोशिश से रूस और यूक्रेन के बीच वास्तविक युद्धविराम संभव होता है, तो रणनीतिक स्वायत्तता पहली बार एक सिद्धांत नहीं, एक उपलब्धि के रूप में दिखाई देगी. यह भारत के लिए बहुत बड़ा कूटनीतिक पूंजीकरण होगा. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट की भारत की दावेदारी को भी इससे बल मिलेगा. लेकिन उससे भी बड़ी चीज होगी, ग्लोबल साउथ में भारत की विश्वसनीयता, क्योंकि इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत केवल रूस और यूक्रेन ने नहीं चुकाई है.
महंगा तेल किसने खरीदा? महंगा खाद्य तेल किसने खरीदा? महंगा उर्वरक किसने खरीदा? आपूर्ति शृंखला में व्यवधान का असर किस पर पड़ा? दुनिया के विकासशील देशों पर.
भारत की कोशिशें अगर सफल हुईं तो...
भारत यदि इस युद्ध को रोकने में कोई भूमिका निभाता है, तो वह केवल यूरोप की समस्या हल करने की कोशिश नहीं करेगा. वह ग्लोबल साउथ की उस समस्या की ओर भी ध्यान देना, जिसका फैसला उसके बिना हो रहा है. लेकिन इसके जोखिम भी हैं. अगर यूरोप को लगा कि भारत ऐसा युद्धविराम स्वीकार करा रहा है जिससे रूस को उसके कब्जे वाले क्षेत्र मिल जाते हैं, तो भारत की छवि प्रभावित हो सकती है. अगर रूस को लगा कि भारत पश्चिम का संदेश लेकर आया है, तो रूस के साथ भारत का भरोसा कमजोर हो सकता है. वहीं अगर यूक्रेन को लगा कि भारत केवल रूस के हितों की भाषा बोल रहा है, तो मध्यस्थ की उसकी भूमिका खत्म हो जाएगी. भारत को इसलिए बहुत पतली रस्सी पर चलना है. लेकिन शायद यही भारत की इस पहल की असली खूबसूरती है. भारत को यह दावा करने की जरूरत नहीं है कि वह अकेले रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कर देगा.उसे इतना ही करना है कि वह अगली बातचीत को संभव बना सके.
कुछ युद्ध एक दिन में खत्म नहीं होते. पहले एक समुद्री गलियारा खुलता है. फिर युद्ध विराम होता है. फिर बातचीत शुरू होती है. फिर शायद कोई समझौता होता है. भारत की भूमिका इसी क्रम को आगे बढ़ाने की हो सकती है. आखिरकार इस पहल की सफलता का फैसला किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं होगा. सवाल बहुत साधारण होंगे. क्या इस सर्दी में कीव का कोई बिजलीघर चलता रहेगा? क्या भारतीय नाविकों से भरा जहाज सुरक्षित ब्लैक सी पार कर सकेगा? क्या भारतीय किसानों को उर्वरक समय पर मिलेगा और क्या अगली बार भारत की किसी रसोई में सूरजमुखी तेल की कीमत बढ़े तो उसके पीछे किसी दूर देश की जंग नहीं होगी? भारत के इस शांति प्रस्ताव की शायद यही असली परीक्षा होगी.
डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)