आमतौर पर केंद्रीय बजट को बड़ी घोषणाओं से आंका जाता है, लेकिन बजट 2026-27 को इस तरह देखना चाहिए कि यह बाहरी आर्थिक दबावों के बीच संतुलन और संयम दिखाने वाला बजट है. इसकी सबसे बड़ी खासियत है- संतुलित और सोच-समझकर लिया गया फैसला. यह बजट वित्तीय अनुशासन बनाए रखता है, अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सुरक्षित करता है और पहले से चल रही सुधार व निवेश की दिशा को आगे बढ़ाता है, न कि अचानक बदलता है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में स्थिरता, वित्तीय अनुशासन, लगातार विकास और नियंत्रित महंगाई रही है और सरकार ने नारेबाजी की बजाय सुधार को चुना है. बजट के आँकड़े इसी बात की पुष्टि करते हैं. आइए देखते हैं कि अर्थशास्त्री आदित्य सिन्हा इस बजट को कैसे देख रहे हैं.
वित्तीय घाटा घटाने का लक्ष्य
सरकार ने वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit) 2026-27 में जीडीपी का 4.3 फीसदी रखने का लक्ष्य रखा है. यह 2025-26 में 4.4 फीसदी था. इससे साफ है कि सरकार धीरे-धीरे घाटा कम करने की नीति पर चल रही है.सरकारी कर्ज जीडीपी के मुकाबले 56.1 फीसदी से घटकर 55.6 फीसदी होने का अनुमान है, ताकि 2030-31 तक इसे लगभग 50 फीसदी तक लाया जा सके.बजट में अनुमान लगाया गया है कि सरकार को 36.5 लाख करोड़ रुपये की आय होगी और 53.5 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे. टैक्स से मिलने वाली शुद्ध आय 28.7 लाख करोड़ रुपये होगी. बाजार से कर्ज लेने की योजना भी वास्तविक जरूरतों के अनुसार रखी गई है.

भरोसा बनाए रखने वाले कदम
सरकारी कर्ज कम करने से भविष्य में ब्याज का बोझ घटेगा, इससे बिना टैक्स बढ़ाए या खर्च घटाए सरकार को ज्यादा गुंजाइश मिलेगी. वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यह एक विश्वसनीय और जिम्मेदार नीति मानी जा सकती है.
बजट में सुधार छोटे-छोटे प्रशासनिक स्तर पर हैं, लेकिन कुल मिलकर इनका बड़ा असर होगा. साल 2025 से अब तक 350 से ज्यादा सुधार किए गए हैं, जिनका मकसद नियमों को सरल बनाना, विवाद कम करना और प्रक्रियाओं को आसान करना है. इनकम टैक्स कानून अप्रैल 2026 से लागू होगा. इससे मुकदमेबाजी कम होगी, जुर्माने सरल होंगे और छोटे मामलों में अपराध की धाराएं हटाई जाएंगी. इससे करदाताओं की परेशानी और खर्च दोनों कम होंगे.
सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) और निर्यात पर ध्यान
एमएसएमई के लिए सीधी सब्सिडी की जगह आसान कर्ज व्यवस्था पर जोर है. ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) के जरिए अब तक सात लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का लेनदेन हो चुका है. इससे छोटे कारोबारियों को कामकाजी पूंजी मिल रही है. निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सीफूड, चमड़ा और कपड़ा उद्योगों को राहत दी गई है. छोटे निर्यातकों और ई-कॉमर्स को भी फायदा पहुंचाने के कदम उठाए गए हैं.कस्टम्स प्रक्रिया को तेज और डिजिटल बनाया जा रहा है, ताकि माल जल्दी क्लियर हो और अनावश्यक अड़चनें कम हों. इससे व्यापार और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ेंगी.
सरकार वित्तवर्ष 2026-27 में 12.2 लाख करोड़ रुपये इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करेगी. यह आर्थिक विकास का सबसे बड़ा जरिया बना रहेगा. अब सरकार सीधे खर्च के बजाय जोखिम साझा करने की नीति अपना रही है, ताकि निजी निवेश भी बढ़े.
इसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह बजट दिखावटी नहीं है, लेकिन लंबे समय की मजबूती पर केंद्रित है. इसका लक्ष्य है-
- भरोसा बनाए रखने के लिए वित्तीय अनुशासन
- प्रक्रियाएं आसान कर सुधार
- व्यापार और निर्यात को सरल बनाना
- इंफ्रास्ट्रक्चर में समझदारी से निवेश
कुल मिलाकर, बजट 2026-27 तेज सुर्खियों के बजाय टिकाऊ और बेहतर गुणवत्ता वाले विकास पर ध्यान देता है.
(एनडीटीवी के इंग्लिश साइट पर प्रकाशित मूल लेख का भावानुवाद.)
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