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जंतर-मंतर पर 'लोकतंत्र' की लड़ाई का बंगला साहिब गुरुद्वारा कनेक्शन

विवेक शुक्ला
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 23, 2026 16:49 pm IST
    • Published On जुलाई 23, 2026 16:49 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 23, 2026 16:49 pm IST
जंतर-मंतर पर 'लोकतंत्र' की लड़ाई का बंगला साहिब गुरुद्वारा कनेक्शन

दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में स्थित गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है. यह सेवा, समरसता और मानवता का जीवंत प्रतीक है. जब भी राजधानी के जंतर-मंतर पर कोई आंदोलन खड़ा होता है, चाहे वह किसानों का हो, छात्रों का हो या किसी अन्य सामाजिक मुद्दे का, बंगला साहिब के दरवाजे जरूरतमंदों के लिए हमेशा खुले रहते हैं. लंबे समय से यह गुरुद्वारा जंतर-मंतर के आंदोलनकारियों के लिए भोजन और शरण का मुख्य आधार बना हुआ है. इस बार भी स्थिति अलग नहीं है. प्रदर्शनकारियों को यहां गर्म भोजन, पानी, प्राथमिक चिकित्सा और रात बिताने के लिए सुरक्षित स्थान मिला हुआ है.

किसने की थी गुरुद्वारों में लंगर की शुरुआत

गुरुद्वारा बंगला साहिब की यह परंपरा सिख धर्म की मूल शिक्षाओं से जुड़ी है. गुरु नानक देव जी ने 'लंगर' की शुरुआत की थी. एक ऐसी सामुदायिक रसोई जहां जाति, धर्म, भाषा या राजनीतिक विचारधारा का कोई भेद नहीं होता. हर व्यक्ति एक पंक्ति में बैठकर एक जैसा भोजन करता है. जाने-माने लेखक और संपादक त्रिलोक दीप कहते हैं कि बंगला साहिब में रोजाना हजारों लोगों को लंगर खिलाया जाता है. आंदोलनों के दौरान यह संख्या और बढ़ जाती है.

जंतर-मंतर से सिर्फ कुछ सौ मीटर दूर होने के कारण यह जगह प्रदर्शनकारियों को राहत देती है. अगर हालिया इतिहास के पन्ने पलटे तो बंगला साहिब ने कई बड़े आंदोलनों में निर्णायक भूमिका निभाई है. 1980 के दशक में बाबा आम्टे के 'भारत जोड़ो' मार्च के दौरान उनके हजारों समर्थकों ने यहां शरण ली और लंगर खाया. उसके कुछ साल बाद महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का विशाल काफिला दिल्ली पहुंचा था. हजारों किसान रात भर बंगला साहिब और रकाबगंज साहिब में रुके. डीएसजीएमसी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जीके ने एक साक्षात्कार में कहा था कि दोनों गुरुद्वारे सेंट्रल दिल्ली के प्रदर्शनकारियों के लिए 'लाइफलाइन' बन चुके हैं.

जंतर-मंतर के आंदोलनकारियों गुरुद्वारे से मिलती है उर्जा

2017 में तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन इस परंपरा का एक यादगार उदाहरण है. सूखे और कर्ज से त्रस्त किसान जंतर-मंतर पर महीनों से धरना दे रहे थे. भाषा की बाधा और संसाधनों की कमी के कारण वे परेशान थे. बंगला साहिब के स्वयंसेवकों ने रोज दो बार लंगर पहुंचाना शुरू किया. दाल, सब्जी, रोटी और खीर के साथ चावल भी भेजा गया, क्योंकि दक्षिण भारतीय किसान चावल पसंद करते थे. मंजीत सिंह ने तब साफ कहा था, ''ये लोग दूर से आए हैं. न भाषा जानते हैं, न खाने का ठिकाना. हम सिर्फ गुरु का लंगर पहुंचा रहे हैं. इसमें कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है.'' किसान आंदोलनों के दौरान भी यही दृश्य बार-बार दोहराया गया. पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों से आए किसान परिवार बंगला साहिब के लंगर पर निर्भर रहे.

अब 2026 में जंतर-मंतर पर चल रहे युवाओं के प्रदर्शनों में भी यही परंपरा कायम है. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के समर्थकों और अन्य युवा प्रदर्शनकारियों को बंगला साहिब, रकाबगंज साहिब और अन्य गुरुद्वारों में चाय,गद्दे, प्राथमिक चिकित्सा और गर्म भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है. दिन में धूप और बारिश झेलने वाले युवा रात को गुरुद्वारे की छतरी के नीचे सुरक्षित सो पा रहे हैं. सेवादार घायल और थके हुए प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए तैयार खड़े हैं. जानकारों के अनुसार, सेंट्रल दिल्ली के सभी गुरुद्वारे आश्रय, लंगर और चिकित्सा सहायता देने के लिए तैयार हैं. आवश्यकता पड़ने पर आपूर्ति बढ़ाई जा रही है.

नहीं पूछा जाता है कि आंदोलन का एजेंडा क्या है

यह सहायता सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है. कई प्रदर्शनकारियों ने बताया कि गुरुद्वारे ने उन्हें सुरक्षा का अहसास दिलाया. पुलिस कार्रवाई या मौसम की मार के बाद जब बाहर ठहरना मुश्किल हो जाता है, तो बंगला साहिब का प्रांगण एक सुरक्षित ठिकाना बन जाता है. सेवादार बिना किसी सवाल के मदद करते हैं. वे न पार्टी का नाम पूछते हैं और न ही आंदोलन का एजेंडा.

बंगला साहिब की इस भूमिका का महत्व सिर्फ व्यावहारिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है. लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, लेकिन कई बार प्रदर्शनकारियों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जाता है. ऐसे में एक धार्मिक संस्था का आगे आना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित करता है. कोविड महामारी के दौरान भी बंगला साहिब ने लाखों लोगों को भोजन पहुंचाया था. उसी भावना से आज भी काम हो रहा है.

आलोचक कभी-कभी इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश करते हैं, लेकिन गुरुद्वारा प्रबंधन हमेशा दोहराता है कि यह सेवा निरपेक्ष है. चाहे आंदोलन किसी भी मुद्दे पर हो किसान, छात्र, पर्यावरण या अन्य जरूरतमंद व्यक्ति को मदद मिलनी चाहिए. यही कारण है कि बंगला साहिब जंतर-मंतर के आंदोलनकारियों का सहारा बना रहता है. 

जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों के लिए बंगला साहिब गुरुद्वारा सिर्फ भोजन और शरण का स्थान नहीं, बल्कि आशा और गरिमा का प्रतीक भी है.

सेवा की यह परंपरा जब तक जीवित रहेगी, दिल्ली का यह गुरुद्वारा समाज के कमजोर और संघर्षरत वर्गों का मजबूत सहारा बना रहेगा. बंगला साहिब की दीवारें गवाह हैं सैकड़ों आंदोलनों की, हजारों थकी हुई आंखों की और अनगिनत कृतज्ञ हृदयों की. इस बार भी, जैसा पहले कई बार हुआ आंदोलनकारियों को वहां भोजन और शरण मिली है. यह सिख धर्म की सबसे सुंदर विरासत है, जो हर संकट में इंसानियत का दीया जलाए रखती है.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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