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दिल्ली की वह हवेली जहां नेहरू दूल्हा बनकर आए थे, कहां से आई थी बारात

विवेक शुक्ला
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 27, 2026 16:17 pm IST
    • Published On मई 27, 2026 16:17 pm IST
    • Last Updated On मई 27, 2026 16:17 pm IST
दिल्ली की वह हवेली जहां नेहरू दूल्हा बनकर आए थे,  कहां से आई थी बारात

दिल्ली-6 की संकरी गलियों में, जहां की हर ईंट में इतिहास बसता है, वहां एक जर्जर हवेली है जिसे लोग हक्सर हवेली या नेहरू जी की ससुराल कहते हैं. यह हवेली रामलीला मैदान के पास सीताराम बाजार इलाके में स्थित है. आठ फरवरी 1916 को जवाहरलाल नेहरू इस हवेली में दूल्हा बनकर आए थे. उनकी दुल्हन कमला कौल थीं, जो कश्मीरी पंडित परिवार की थीं. कमला जी का जन्म इसी हवेली में हुआ था. इसी हवेली में इंदिरा जी का बचपन बीता था. 

उस दिन दिल्ली में ठंडी हवा चल रही थी. नेहरू जी की बारात इलाहाबाद से आई थी. पूरे परिवार और दोस्तों के साथ वे बैंड-बाजा-बरात के साथ हक्सर हवेली पहुंचे. हवेली कमला जी के माता-पिता राजपति कौल और जवाहर कौल की थी. शादी का मंडप हवेली के आंगन में सजाया गया. कश्मीरी रीति-रिवाज के मुताबिक फेरे हुए. नेहरू जी उस समय 26 साल के थे और कमला जी सिर्फ 16 साल की. यह शादी व्यवस्थित थी, लेकिन बाद में दोनों के बीच गहरा प्यार और सम्मान विकसित हुआ.

हक्सर हवेली पुरानी दिल्ली की एक भव्य हवेली थी. चारों तरफ ऊंची दीवारें, लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे और आंगन में फव्वारे. शादी के बाद नेहरू जी और कमला जी यहां कुछ दिन रहे. इंदिरा गांधी यहां खेला करती थीं. लेकिन नेहरू जी बाद में  ससुराल नहीं आए. स्वतंत्रता संग्राम की व्यस्तता और उनके व्यस्त जीवन ने उन्हें दिल्ली-6 के इस घर से दूर रखा. आज यह हवेली जीर्ण-शीर्ण हालत में है. पुरानी दिल्ली की भीड़-भाड़ में यह लगभग भुला दी गई है, लेकिन इतिहासकार इसे नेहरू-कमला शादी की गवाह मानते हैं.

अब किस हाल में है हक्सर हवेली?

हक्सर हवेली उन दिनों कश्मीरी पंडित समुदाय का केंद्र थी. नेहरू का परिवार कश्मीरी ब्राह्मण था, इसलिए यह रिश्ता सांस्कृतिक रूप से भी जुड़ा था. शादी के बाद नेहरू जी इलाहाबाद लौट गए, जहां आनंद भवन उनका मुख्य घर था. लेकिन दिल्ली का यह घर हमेशा परिवार की जड़ों से जोड़ा जाता रहा.

दिल्ली-6 के सामाजिक कार्यकर्ता आशीष वर्मा कहते हैं कि आज हक्सर हवेली की हालत खराब है. दीवारें टूटी हुईं हैं, छत जर्जर हो चुकी है. यह दिल्ली की विरासत का हिस्सा है, जहां भारत के पहले प्रधानमंत्री ने अपनी जीवनसाथी को पहली बार घर के रूप में स्वीकार किया.

दिल्ली में नेहरू जी का पहला घर कहां था

आजादी से पहले नेहरू जी दिल्ली में ज्यादा नहीं रहते थे. उनका मुख्य ठिकाना इलाहाबाद का आनंद भवन और स्वराज भवन था. लेकिन 1946 में जब वे अंतरिम सरकार के प्रमुख बने, तो दिल्ली आना पड़ा. उनका पहला आधिकारिक घर 17 यॉर्क रोड (अब मोतीलाल नेहरू मार्ग) पर था. यह लुटियंस दिल्ली का हिस्सा है, जहां ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस ने भव्य बंगले बनाए थे. यह बंगला लगभग 3.7 एकड़ में फैला है. नेहरू जी 2 सितंबर  1946 को शिफ्ट हुए. वे अंतरिम सरकार चला रहे थे. यहां से उन्होंने आजादी की तैयारियां कीं. ब्रिटिश अधिकारियों से मुलाकातें हुईं, कांग्रेस नेताओं के साथ बैठकें चलीं. यह घर स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण का गवाह बना.

भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ. नेहरू जी ने लाल किले पर 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण दिया. उसके बाद वे कुछ समय यॉर्क रोड पर ही रहे. वे 1947 के अंत  में तीन मूर्ति भवन चले गए, जो दिल्ली में उनका सबसे प्रसिद्ध घर बना. तीन मूर्ति को प्रधानमंत्री संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है. लेकिन यॉर्क रोड वाला घर उनका पहला दिल्ली का आधिकारिक निवास था.

जिस घर में बीता इंदिरा गांधी का बचपन

हक्सर हवेली और यॉर्क रोड के घर नेहरू जी के जीवन के अलग-अलग पड़ाव को दिखाते हैं. एक व्यक्तिगत जीवन की शुरुआत, दूसरा राष्ट्र निर्माण की. कहते हैं कि शादी के दिन नेहरू जी ने कमला जी से वादा किया कि वे हमेशा साथ रहेंगे. कमला जी ने भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया. साल 1936 में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन नेहरू जी उन्हें हमेशा याद करते रहे. हक्सर हवेली में इंदिरा जी का बचपन बीता. वे वहां दादी-नानी के साथ रहती थीं. 

लेखक और दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राज कुमार जैन के मुताबिक यह घर केवल ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि सपनों का प्रतीक हैं. हक्सर हवेली हमें सादगी और जड़ों की याद दिलाती है. पुरानी दिल्ली की यह हवेली आज भले ही यादों से गुम हो गई हो,लेकिन इतिहास नहीं भूलता. नेहरू जी का यॉर्क रोड वाला बंगला आधुनिक भारत की शुरुआत का गवाह है. लेकिन अब उसका स्वामित्व निजी हाथों में है.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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