बदलाव प्रकृति का नियम है. पीढ़ियों के बदलने के साथ बहुत कुछ बदल जाता है. पहनावा, खान-पान और भाषा यानी इंसानी शरीर की बनावट के अतिरिक्त अन्य सब कुछ बदलता जाता है.
मेरे परिवार में दो पीढ़ियों के पत्र संरक्षित हैं. उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि वाकई पीढ़ियों के अंतराल में भाषा का बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. पुराने दस्तावेज पढ़ते हुए अथवा श्वेत-श्याम फिल्मों की भाषा सुनने पर महसूस होता है कि हम बहुत मर्यादित भाषाई जीवन से बाहर निकल आए हैं. रिश्तों के संबोधन, औपचारिक संबंधों से वार्तालाप की ऐसी भाषा जो आज की आधुनिक होती जा रही भाषा सुनकर लगता है कि 'क्या कभी इस तरह भी बोला जाता था?'
सांस्कृतिक मूल्यों का बदलाव
धीरे-धीरे होता बदलाव सांस्कृतिक मूल्यों में भी बदलाव ले आता है. जिस संस्कृति में पिता के घर के भीतर कदम रखने पर कभी समूचे घर में कर्फ्यू जैसा माहौल बन जाता था. नब्बे के दशक में बदलाव इस तरह आया कि पिता का संबोधन पिता जी से पापा और डैडी/डैड से आगे निकल कर 'अरे यार पापा' तक पहुंच गया है. हमारे लड़कपन की भाषा भी परिवार जन के समक्ष संयमित होती थी, जबकि मित्र-मंडली के साथ थोड़ी छूट ले ली जाती थी. उम्र के असर के बावजूद नब्बे के दशक तक बालकों की भाषा में अलग-अलग माहौल में बोले जाने वाली भाषा में बहुत अंतर नहीं आया था.
समय के साथ संयुक्त परिवार नाम की संस्था का स्थान न्यूक्लियर परिवारों ने और आज काम-काज के चलते व्यक्ति अकेले रहने को बाध्य होता जा रहा है. अस्सी-नब्बे के दशक तक घर के पुरुषों द्वारा ढोई गई कठोरता समय के बदलाव के साथ आज अनावश्यक लगती है. आने वाला समय आज के समय को किस चश्मे से देखने वाला है, यह विचारणीय मुद्दा है. इससे अधिक चिंतित करने वाली बात भावनाओं के अतिरेक में उपयोग में लाई जाने वाली शब्दावली से है.
पीढ़ियों का बदलाव नए युग के युवाओं की आवश्यकताओं में, मंसूबों और आकांक्षाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए पहचाना जाता है. ऐसा हर काल में हुआ है. हर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अधिकांश मामलों में असहमत रहती है. यह एकमात्र ऐसा सिद्धांत है जिसके भविष्य में भी बदलने की उम्मीद नहीं है. इतिहास बताता है कि युवाओं ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए हर दशक में विरोध के स्वर बुलंद किए हैं. हर पीढ़ी ने अपने नारे गढ़े. बदलाव के बीच वयस्कता वाली उम्र कुछ हद तक नई पीढ़ी को समझने में सफल रहती थी. उन्हें समझाने, मनाने, धमकाने या बरगला कर बात मनाने का हुनर वयस्क पीढ़ी को आता था लेकिन स्थिति इस बार अलग है. तथाकथित रूप से जिसे 'छात्रों का आंदोलन' कहा जा रहा है, उसकी भाषा अमर्यादित थी.

प्रदर्शनकारी छात्रों ने प्रधानमंत्री समेत सत्ता पक्ष के कई नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें की हैं.
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कैसी होनी चाहिए आंदोलन की भाषा
प्रदर्शन की भाषा हमेशा से कटाक्ष पूर्ण, आक्षेप युक्त, कठोर और आलोचनात्मक रहती है. जिस तरह का एक्शन युवा झेलते हैं, बदलाव की चाह में उसी के अनुपात में अधिक कठोर, असंयमित रिएक्शन वह देते हैं. वर्ष 2026 जुलाई में प्रदर्शन की भाषा ने व्यवहार और एक्शन के मामले ने सबको हैरत में डाल दिया. माना जाता है कि 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए बच्चे जेन-जी हैं. इनके साथ कुछ इनके आगे-पीछे की उम्र वाले युवा भी इस आंदोलन में शामिल थे. सबसे पहले तो इस सच्चाई को मानना होगा कि यह पीढ़ी बदलाव की तेज आंधी के बीच पैदा हुई पीढ़ी है. टेलीविजन पर अनेक चैनलों से आगे बढ़ते हुए इस पीढ़ी ने हर हाथ में मोबाइल तक का सफर देखा है.
इंटरनेट की पावर को यह पीढ़ी ना सिर्फ जानती है बल्कि उसे इस्तेमाल करना भी इन्हें अच्छी तरह आता है. अपने अड़ोस-पड़ोस से लेकर ब्रह्मांड तक की जानकारी एक क्लिक पर इनके सामने होती है. विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ते हुए यह सकारात्मक परिणाम है. लेकिन इस बदलाव से जेन-जी की भाषा और व्यवहार चिंतित करते हैं. इन्हें गैर जरूरी बातों-रिश्तों यानी स्वयं को अनचाही लगने वाली हर स्थिति को ढोने से परहेज है. इनका खानपान, पहनावा तो बदला ही, परिवार और रिश्तों में भी इन्हें दिखावा पसंद नहीं. भाषाई तौर पर ये इतने विविधतापूर्ण और एक तरह से कहा जाए कि समृद्ध है कि इनसे मुकाबला करना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है.
भाषा की मर्यादा क्या होती है
इस पीढ़ी की भाषा, स्लैंग और एक्शन से बात कहने का अंदाज अगले स्तर का है. आलोचना की भाषा कठोर हो सकती है लेकिन असंयमित व्यवहार या भाषा का प्रयोग गलत है. व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि गुस्सा हो या नाराजगी, आलोचना करनी हो या किसी को आहत करना ही उद्देश्य हो तब भी भाषा की मर्यादा रखनी चाहिए. यह सामने वाले के मान-अपमान से जितना जुड़ा है, उससे अधिक आपके सम्मान से जुड़ा होता है. ऐसी भाषा के प्रयोग से बचना चाहिए जो कल कोई आपके लिए इस्तेमाल करे और उसे सुनकर आपको दुख या अफसोस हो. हम अपने समय के दर्पण में खड़े हैं. इसकी प्रतिछाया भविष्य में भी दिखाई देती रहेगी. प्रधानमंत्री और अन्य चयनित पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए. सबसे कठोर सवाल पूछने का हक हमारा संविधान देता है, लेकिन किसी के सम्मान की सीमा रेखा लांघने का अधिकार किसी को नहीं है.
जेन-जी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. निडर होकर अपनी बात रखने का हुनर, अपनी बात मनवाने के लिए विनम्र जिद करना, हालात चाहे जैसे हों, अहिंसा का मतलब अहिंसा ही है. पुलिस और प्रशासन के बल के सामने निहत्थे खड़े होने का साहस और सबसे अधिक महत्वपूर्ण है अत्यंत गंभीर मुद्दे पर गंभीर रहते हुए भी खिलंदड़ापन बरकरार रखना. जेन-जी बहुत सारे क्षेत्र में अच्छी गुरु साबित हो सकती है लेकिन यह कोरा जोश है. इसे होश की, मार्गदर्शन की, सलाह की जरूरत है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. इस पीढ़ी को व्यंग्य और अपमान के बीच की महीन रेखा का अंतर समझना होगा. 'कूल' बनने की लालसा में देश की स्वतंत्रता, स्वाधीनता और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता. लेकिन इस अति आधुनिक पढ़ी को अपनी भाषा पर संयम सीखना होगा.
(डिस्क्लेमर: लेखिका साहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर और समाजसेवी हैं. उनके अब तक तीन उपन्यास समेत 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. लेखन और साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, मराठी, हरियाणवी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)