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मोहम्मद अली जिन्ना की वह बहन जिसकी मौत आज भी है एक रहस्य, किताब में लिखे अपने भाई के कई राज

विवेक शुक्ला
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 11, 2026 23:09 pm IST
    • Published On सितंबर 11, 2026 23:09 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 11, 2026 23:09 pm IST
मोहम्मद अली जिन्ना की वह बहन जिसकी मौत आज भी है एक रहस्य, किताब में लिखे अपने भाई के कई राज

सात अगस्त 1947 की उमस भरी दोपहर में मोहम्मद अली जिन्ना दिल्ली के सफ़दरजंग एयरपोर्ट से कराची के लिए रवाना हुए. उनके साथ उनकी छोटी बहन फ़ातिमा जिन्ना भी थीं. दिखने में कुछ कमज़ोर-सी फ़ातिमा अपने भाई की छाया की तरह रहती थीं. वे दंत चिकित्सक होने के साथ-साथ स्त्रियों को स्वावलंबी बनाने की जीवनभर वकालत करती रहीं. साल 1914 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से दंत चिकित्सा की डिग्री लेने के बाद वे जिन्ना की निकटतम सलाहकार और विश्वासपात्र बन गईं. पाकिस्तान आंदोलन में भी वे भाई के साथ सक्रिय रहीं.

क्यों देर से छपी फातिमा जिन्ना की किताब

पाकिस्तान बनने के बाद फ़ातिमा का जीवन निराशाओं से घिर गया. 1947 से 1967 तक, जब उनका निधन हुआ, उनका जीवन घर के भीतर और बाहर दोनों जगह उथल-पुथल भरा रहा. उनकी कुंठाओं और निराशाओं का सबसे प्रामाणिक विवरण उनकी पुस्तक 'माई ब्रदर' में मिलता है, जिसे उन्होंने 1955 में लिखा था. यह पुस्तक 1987 में जनता के सामने आई.

सवाल उठता है कि इसे प्रकाशित होने में इतना समय क्यों लगा. उत्तर पुस्तक में ही छिपा है. फ़ातिमा शिकायत करती हैं कि उनके भाई को उनके कुछ सबसे करीबी साथियों ने भी 'धोखा' दिया. ये वही साथी थे जिन्होंने पाकिस्तान आंदोलन में उनके साथ काम किया था. उनका इशारा स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान की ओर था.

11 अगस्त 1947 को जिन्ना ने पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल का पदभार संभाला. उसी दिन उन्हें पहला बड़ा झटका लगा. संविधान सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने पाकिस्तान को प्रगतिशील मुस्लिम देश के रूप में देखने का अपना विज़न रखा. पर नौकरशाही और मुस्लिम लीग के कुछ सदस्यों ने इस भाषण को अख़बारों और रेडियो पर ठीक से प्रकाशित-प्रसारित नहीं होने दिया.

क्या पाकिस्तानियों ने जिन्ना को धोखा दिया

पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना तपेदिक से गंभीर रूप से ग्रस्त थे और अपने सहयोगियों से भी निराश थे.फ़ातिमा लिखती हैं कि भाई ने उनसे कहा था कि कई पूर्व सहयोगी केवल यह जानने आ रहे हैं कि उनमें कितनी जान बाकी है, अर्थात् वे शायद उनके मरने की प्रतीक्षा कर रहे थे.पुस्तक में वे बताती हैं कि गंभीर रूप से बीमार जिन्ना को खटारे जैसी एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल ले जाया गया. रास्ते में एम्बुलेंस खराब हो गई. 11 सितंबर 1948 को जिन्ना का निधन हो गया.

लेखक ख़ालिद अहमद अपनी पुस्तक 'Pakistan: Behind the Ideological Mask' में जिन्ना के सचिव रहे प्रसिद्ध वकील शरीफ़ुद्दीन पीरज़ादा के हवाले से लिखते हैं कि जब फ़ातिमा रेडियो पाकिस्तान पर भाई की मृत्यु की घोषणा करने गईं और संस्थापक के प्रति सरकार के अमानवीय़ व्यवहार और पुरानी एम्बुलेंस में उन्हें मरने के लिए छोड़ देने की बात कहने लगीं, तो रेडियो के महानिदेशक ज़ेड ए बुख़ारी को एक सरकारी अधिकारी का फ़ोन आया. उन्हें फ़ातिमा का भाषण तत्काल बंद करने का आदेश दिया गया.

अयूब ख़ान को दिन में दिखाए तारे

जिन्ना की मृत्यु के बाद फ़ातिमा कराची के अपने घर में रहने लगीं. साल 1965 में विपक्षी दलों ने उन्हें फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ान के विरुद्ध राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए राज़ी किया. शुरू में उन्होंने हिचक दिखाई, पर बाद में सहमति दे दी. अयूब ख़ान आसान जीत की उम्मीद कर रहे थे, पर फ़ातिमा के मैदान में उतरने से चुनाव कांटे का हो गया. वे चुनाव हार गईं, लेकिन कराची और ढाका जैसे दो सबसे बड़े शहरों में अयूब को हरा दिया. हैदराबाद में भी जीत हासिल की और पेशावर में मामूली अंतर से हारीं. विपक्ष ने चुनाव में व्यापक अनियमितताओं का आरोप लगाया. चुनाव के बाद फ़ातिमा फिर घर में सिमट गईं.

किसी प्रमुख राजनेता से उनकी अंतिम मुलाकात ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो से हुई. तब तक अयूब ख़ान भुट्टो को विदेश मंत्री पद से हटा चुके थे. भुट्टो 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारत के साथ शांति समझौते पर राष्ट्रपति से असहमत थे.

स्टेनली वोल्पर्ट अपनी पुस्तक 'Zulfi Bhutto of Pakistan' में लिखते हैं कि 1966 में पद से हटाए जाने के बाद भुट्टो फ़ातिमा से मिले. दोनों के घर कराची में पास-पास थे. फ़ातिमा ने भुट्टो से कहा,''मैंने तुमसे कहा था कि उन पर (अयूब ख़ान पर) भरोसा मत करना.''

फातिमा की मौत आज भी सवालों के घेरे में है

एक साल बाद, नौ जुलाई 1967 को 71 साल की आयु में फ़ातिमा जिन्ना का कराची में निधन हो गया. सरकार ने कारण हृदय गति रुकना बताया. किंतु अनेक राजनेता और जिन्ना के भतीजे अकबर पीरभाई समेत कई लोग आज भी दावा करते हैं कि उनकी हत्या की गई थी. पाकिस्तान की आम जनता का एक बड़ा हिस्सा भी यही मानता है.

फ़ातिमा की इच्छा थी कि उन्हें भाई की कब्र के पास दफ़नाया जाए. सरकार ऐसा नहीं चाहती थी. कहा जाता है कि कराची के कमिश्नर ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि उन्हें जिन्ना के बगल में नहीं दफ़नाया गया तो बड़ा बवाल हो सकता है. अशांति के डर से अंततः उन्हें जिन्ना के निकट ही दफ़नाया गया. विडंबना यह है कि लियाक़त अली ख़ान भी उन्हीं के पास दफ़न हैं.

पाकिस्तान में यह दावा भी किया जाता है कि फ़ातिमा का क़त्ल हुआ था. दावा करने वाले उन चश्मदीदों का हवाला देते हैं जिन्होंने इस्लामी रीति के अनुसार उनके शव को ग़ुस्ल दिया था. उनका कहना है कि शरीर पर घावों के निशान थे और पेट से रक्त और अन्य तरल पदार्थ निकल रहे थे. अंतिम संस्कार के दौरान आम लोगों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं. जनता अंतिम दर्शन करना चाहती थी, पर प्रशासन अनुमति नहीं दे रहा था.

जिन्ना की मृत्यु के बाद बहुतों ने फ़ातिमा को उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में देखा था. पर इस विचार के विरुद्ध शक्तिशाली स्वार्थ खड़े थे. शासकों ने उनके साथ अनादरपूर्ण व्यवहार किया. आज भी यह रहस्य बना हुआ है कि फ़ातिमा जिन्ना की मृत्यु प्राकृतिक थी या उनकी हत्या की गई थी. इस पर्दे के उठने का इंतज़ार अब भी जारी है.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं.यह लेख उनकी किताब '1947- विभाजन के शेष सवाल' का संपादित अंश है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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