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This Article is From Dec 27, 2016

क्या सचमुच काले धन को खत्म करने की कोशिश बेकार साबित होगी...

Dr Vijay Agrawal
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    दिसंबर 27, 2016 19:46 pm IST
    • Published On दिसंबर 27, 2016 19:45 pm IST
    • Last Updated On दिसंबर 27, 2016 19:46 pm IST
मैं स्वीकार करता हूं कि अर्थशास्त्र का मेरा ज्ञान उतना ही है, जितना किसी राजनेता को संविधान का होता है. इसके बावजूद मुझे लगता है कि केवल इसी वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर कुछ कहने के अधिकार से मैं वंचित नहीं हो जाता हूं. कभी-कभी सामान्य-ज्ञान विषयों के विशेषज्ञों की तुलना में अधिक व्यावहारिक एवं सत्य के अधिक निकट बैठे हुए पाए गए हैं. बस, अपने इसी अधिकार और विश्वास को आधार बनाकर मैं यहां विमुद्रीकरण पर कुछ अपने प्रश्न और कुछ राय रखने जा रहा हूं. निःसंदेह इसमें उन लोगों के सवाल और सलाहें भी शामिल हैं, जिन्हें हम 'हम भारत के लोग' कहते हैं.

तो शुरुआत करते हैं, विमुद्रीकरण के उठाए गए कदम पर उठने वाली अंगुलियों से.

इस बारे में अर्थशास्त्रियों के दो धड़े हैं. मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री इस कदम को जीडीपी को दो प्रतिशत कम करने वाला मान रहे हैं. कुछ अन्य की भी राय यही है, लेकिन वे प्रतिशत नहीं बता रहे हैं. मनमोहन सिंह के इस विचार को लोगों ने महज विपक्ष के एक राजनेता का विचार मानकर सिरे से खारिज कर दिया है. हां, अन्य के विचारों के बारे में वह विचार ज़रूर कर रही है.

फिलहाल विमुद्रीकरण के विरोध में तीन तथ्य सबसे अधिक प्रबलता के साथ उठाए जा रहे हैं. इनमें पहला है - आम लोगों को होने वाली परेशानी, दूसरा है - इससे कालाधन खत्म नहीं होगा और तीसरा है - इससे अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ जाएगी.

निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था वाली आशंका आम लोगों को चिंतित करती है, लेकिन कभी-कभी ही, हमेशा नहीं. इस चिंता के बारे में उनके ज़हन में कुछ सवाल उठते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं.
  • क्या जीडीपी इतनी प्रमुख हो गई है कि उसके लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया जाए; देश के कानून तक को?
  • क्या काले धन की अर्थव्यवस्था को एक नया नाम देकर उसे वैध बना दिया जाए, क्योंकि वह जीडीपी के लिए ज़रूरी है?
  • इस जीडीपी का बड़ा भाग किस रूप में और किन लोगों की जेब में जाता है?
  • क्या किसी सरकार को स्वयं को अपने यहां की केवल अर्थव्यवस्था तक ही सीमित रखना चाहिए, और सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों को इस अर्थव्यवस्था के हवाले करके मूक दर्शक की मुद्रा अख्तियार कर लेनी चाहिए?

अब हम आते हैं इस बात पर कि क्या सचमुच काले धन को खत्म करने की यह कोशिश व्यर्थ सिद्ध होगी? अर्थशास्त्री इस बारे में दुनिया के देशों द्वारा उठाए गए कदमों का उदाहरण देते हुए इस कोशिश को महज़ 'राजनीतिक एवं अहमकाना' कदम मानते हैं. उनके इस निष्कर्ष का ठोस बौद्धिक आधार है - 'दुनिया के बहुत से देश' लेकिन अब यहां फिर कुछ सवाल कौंधते हैं.
  • भारत दुनिया का एक देश तो है, लेकिन क्या इसी वजह से वह दुनिया के सभी देशों का प्रतिरूप मात्र है?
  • क्या किसी भी देश की आर्थिक नीति के प्रभाव पर उस देश की सामाजिक संरचना, राजनीतिक चरित्र एवं सांस्कृतिक मूल्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता?
  • क्या भारत में भी काले धन का स्वरूप एवं उसका विस्तार बिल्कुल वैसा ही है, जैसा कि दुनिया के उन देशों में है, जहां यह कदम असफल रहा है?
  • यदि ऐसा ही था, तो भारत पर अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की मंदी का उतना प्रभाव क्यों नहीं पड़ा?

यदि हमारे अर्थशास्त्री इन बिन्दुओं को भी ध्यान में रखकर अपनी बात कहेंगे, तो शायद लोगों को उनकी बातों पर ज़्यादा यकीन हो सकेगा. अन्यथा कम से कम लोग तो ऐसा नहीं ही सोच रहे हैं - 'तेरा क्या होगा रे, नोटबंदी'

डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं...

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