बलात्कार कोई हल्का अपराध नहीं है. वह इस मायने में बाकी अपराधों से अलग है कि वह एक पूरे समुदाय की अस्मिता पर हमले की तरह आता है. इसलिए बलात्कार को लेकर किसी भी तरह की हल्की बात किसी संवेदनशील आदमी को चोट पहुंचाती है. बलात्कार पर राजनीति भी चोट पहुंचाने वाली चीज़ है. दुर्भाग्य से पिछले तमाम वर्षों में यह राजनीति लगातार जारी है.
अच्छा होता, अगर राहुल गांधी 'मेक इन इंडिया' की तरह 'रेप इन इंडिया' का मुहावरा नहीं देते. यह एक बहुत परेशान करने वाली सच्चाई को इतनी सपाट भाषा में रखना है कि उसकी सारी भयावहता ख़त्म हो जाती है. यह इस बयान का उदास करने वाला पक्ष है.
लेकिन राहुल गांधी के इस बयान पर BJP लोकसभा में जिस तरह आक्रामक हो उठी, वह एक अश्लील दृश्य जैसा था. बलात्कार को लेकर दिखाई जा रही यह अति-संवेदनशीलता सदन के बाहर नज़र आ रही होती, तब भी इसका कोई मतलब होता, लेकिन वह कहीं नहीं है. यह सबको मालूम है कि बलात्कार के आरोपी और बाद में निचली अदालत द्वारा मुजरिम करार दिए गए आसाराम बापू को कैसे BJP-शासित राज्यों की पुलिस अरसे तक गिरफ्तार करने से भी बचती रही. यह भी सबने देखा है कि उन्नाव के भयावह कांड के मुख्य आरोपी अपने विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के ख़िलाफ़ BJP कितनी सदय रही. चुनाव जीतने के बाद BJP सांसद साक्षी महाराज उनसे मिलने पहुंचे. बीते हफ्ते उनके जन्मदिन पर बधाई दी. किसी BJP नेता ने अपने सांसद से नहीं पूछा कि ऐसे भयावह अपराधों के आरोपी के साथ उनकी ऐसी गाढ़ी दोस्ती के क्या मायने हैं. चिन्मयानंद और नित्यानंद जैसे तथाकथित स्वामियों के साथ वह पार्टी कैसे उदार हो सकती है, जो बलात्कार के ख़िलाफ़ इतनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करे कि एक बयान पर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करे...?
बलात्कार को लेकर संसद से सड़क तक चल रहे इस खेल की हृदयहीनता तब कुछ और उजागर होती है, जब हम पाते हैं कि राहुल गांधी ने BJP के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह वीडियो ट्वीट कर दिया, जिसमें उन्होंने 2014 में दिल्ली को 'रेप कैपिटल' बताया था. क्या अब भी स्मृति ईरानी और राजनाथ सिंह अपने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ वैसी ही भाषा का इस्तेमाल करेंगे, जैसी उन्होंने राहुल गांधी को लेकर की है...? सच तो यह है कि उनसे यह अपेक्षा भी उनके प्रति अन्याय है.
तथ्य के तौर पर देखें, तो राहुल गांधी की बात तकलीफ़देह ढंग से सच है. यह बहुत बार दोहराया जा चुका तथ्य है कि देश में हर घंटे तीन बलात्कार होते हैं. लेकिन इस भयावह अपराध से लड़ने को लेकर हमारा पूरा दृष्टिकोण जैसे बहुत सतही है. 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में निर्भया के साथ जो सामूहिक बर्बरता हुई, उसके प्रत्युत्तर में जैसे महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को लेकर पूरे देश में एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ. इस तूफ़ान का नतीजा क्या हुआ...? महिलाओं के प्रति हिंसा से जुड़े क़ानून कुछ और सख़्त हो गए, बलात्कारियों को फांसी देने की मांग के सुर कुछ और ऊंचे हो गए.
लेकिन महिला हिंसा के प्रतिरोध को लेकर पैदा हुई यह नई सजगता क्या महिला अधिकारों के प्रति नई संवेदनशीलता में भी बदल पाई...? दरअसल, बलात्कार अकेला या इकहरा अपराध नहीं है - वह लैंगिक भेदभाव के बहुत सारे प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष रूपों की - जिनकी कई बार हम अनजाने में और कई बार जान-बूझकर - अनदेखी करते हैं - पराकाष्ठा है. जब यह पराकाष्ठा आती है, तो हम सिहर जाते हैं, आंदोलन करने लगते हैं, फांसी की मांग करते हैं, लेकिन उसके पहले लैंगिक भेदभाव, पूर्वाग्रह और वैमनस्य की बहुत सारी श्रेणियों को चुपचाप बस बर्दाश्त ही नहीं करते, कई बार ख़ुशी-ख़ुशी उनमें शामिल भी होते हैं.
यह किस तरह होता है...? परिवार के रोज़मर्रा के व्यवहार में, व्हॉट्सऐप पर शेयर किए जा रहे चुटकुलों में, फिल्मों में और यूट्यूब पर बन रही वेब सीरीज़ में - हर जगह महिला उत्पीड़न के अनेक रूप मिल जाते हैं. कभी 'बलात्कार' हमारे घरों में वर्जित शब्द होता था. यह शब्द सुनते एक डरावनी सिहरन सिर उठाती थी. यह सही है कि शब्दों को छिपा लेने से, ढंक देने से, उनका इस्तेमाल न करने से, सच्चाई ख़त्म नहीं हो जाती. लेकिन यह भी सही है कि किसी शब्द को बार-बार बहुत हल्के ढंग से इस्तेमाल कर हम उसकी भयावहता को लगभग खत्म कर देते हैं. इसी तरह याद कर सकते हैं कि लिंगसूचक बहुत सारी गालियां हमारे सार्वजनिक व्यवहार से बाहर थीं. घरों में वे सुनी नहीं जा सकती थीं. लेकिन हाल के दिनों में जो वेब सीरीज-संस्कृति विकसित हुई है, उसमें बहुत क्रूर और सपाट ढंग से इन गालियों का इस्तेमाल होता है. हम धीरे-धीरे इसके अभ्यस्त हो रहे हैं और लैंगिक पूर्वाग्रह के एक गर्हित रूप के प्रति हमारी संवेदनशीलता लगभग शून्य-सी हो चली है.
आमिर ख़ान की मशहूर फ़िल्म 'थ्री इडियट्स' बहुत सराही गई. इक्कीसवीं सदी में जो फिल्में मनोरंजन और सोद्देश्यता के मेल की तरह आईं, उनमें इस फिल्म का नाम काफ़ी ऊपर लिया जा सकता है. लेकिन फिल्म के एक दृश्य में नायक एक चिट्ठी में फेरबदल करता है और 'चमत्कार' को 'बलात्कार' और 'धन' को 'स्तन' में बदल देता है. एक बहुत अच्छी फिल्म के भीतर क़ायदे से यह एक कुंठित हास्य-बोध था - एक बीमार क़िस्म का मज़ाक, जिसमें एक लैंगिक सड़ांध बहुत आसानी से पहचानी जा सकती थी. लेकिन पूरा देश इस पर हो-हो करके हंसता रहा. ज़ाहिर है, यह शब्द को उसके वास्तविक आशय से वंचित करने का काम था, जो फिल्म में इसलिए संभव हुआ कि वह जीवन में घटित हो रहा था.
स्त्री उत्पीड़न के ऐसे बहुत सारे रूप हमें फिल्मों में ही नहीं, जीवन में भी तरह-तरह से दिखते हैं. उनको हम पोसते रहते हैं और एक दिन बलात्कार के खिलाफ़ लड़ने निकल पड़ते हैं. जब इस लड़ाई का कोई और तरीक़ा समझ में नहीं आता, तो फांसी-फांसी चिल्लाने लगते हैं. इससे अख़बारों, टीवी चैनलों, नेताओं और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं का काम भले चल जाता हो, लेकिन स्त्री की बराबरी और गरिमा की लड़ाई अंततः पीछे छूट जाती है.
इस बार भी यही हो रहा है. लोकसभा सांसद अचानक इतने संवेदनशील हो रहे हैं, जैसे उन्हें किसी भी क़ीमत पर 'रेप इन इंडिया' सुनना गवारा नहीं. अगर यह संवेदनशीलता सच्ची होती, तो इतनी वाचाल न होती - वह कुछ गुरु-गंभीर होती, वह अपने भीतर उतरकर सोचती और समाज की उस बीमार रग को पहचानने का यत्न करती, जहां से स्त्री वैमनस्य का वह सिलसिला शुरू होता है, जो अंततः बलात्कार तक पहुंच जाता है.
प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एडिटर हैं...
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