दिल्ली-6 की गलियों में एक बार फिर ट्राम चलने की बात चल रही है.दिल्ली-6 की इन तंग गलियों में 1950 और 60 के दशक में धीरे-धीरे चलती ट्राम बाजारों के बीच से गुजरती हुई, घर से दफ्तर, दुकान से स्टेशन तक लोगों को पहुंचाती थी.
दिल्ली में इलेक्ट्रिक ट्राम सेवा छह मार्च 1908 को शुरू हुई थी. टाउन हॉल पर उद्घाटन समारोह हुआ था. वायसराय लॉर्ड हार्डिंग खुद उसमें मौजूद थे.पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक भी वहां आए थे. बिजली शहर में कुछ साल पहले 1903 में ही आई थी. उसी बिजली से ट्राम चली.इससे पुरानी दिल्ली को एक नया सफर का आधुनिक साधन मिला था.
इस सेवा को दिल्ली इलेक्ट्रिक ट्रामवेज एंड लाइटिंग कंपनी चलाती थी. बाद में इसे दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई एंड ट्रैक्शन कंपनी भी कहा गया. ये प्राइवेट कंपनी थी, जो बिजली सप्लाई भी करती थी और ट्राम भी चलाती थी.खुली ट्राम कारें बनवाई गईं जो शहर की पहचान बन गईं.
ट्राम की रफ्तार बहुत कम होती थी, 10-15 किलोमीटर प्रति घंटा. इसीलिए लोग आसानी से चढ़-उतर जाते थे. रामजस कॉलेज में पढ़ाते रहे डॉक्टर राज कुमार जैन को याद है जब वे ट्राम में अपनी मां के साथ सफर करते थे. ये व्यस्त बाजारों और मोहल्लों से होकर गुजरती थी. घर से काम पर जाना, खरीदारी करना, सब आसान हो जाता था.
दिल्ली में कहां-कहां आती-जाती थी ट्राम
सबसे ज्यादा ट्राम 1920 के दशक की शुरुआत में चली. करीब 24 खुली ट्राम थीं और पंद्रह किलोमीटर का ट्रैक. ये ट्रैक जामा मस्जिद, चांदनी चौक, चावड़ी बाजार, लाल कुआं, फतेहपुरी, सब्जी मंडी, सदर बाजार, पहाड़गंज, अजमेरी गेट, बाड़ा हिंदू राव और तीस हजारी तक जाता था. पुरानी दिल्ली के ज्यादातर महत्वपूर्ण इलाके इससे जुड़ गए थे. ट्राम का किराया बहुत सस्ता था. दूरी के हिसाब से आधा आना यानी करीब तीन पैसे से लेकर चार आना तक. ट्राम में क्लास भी था निचला, मध्य और ऊपरी डिब्बा. ज्यादातर लोग निचले दर्जे में ही सफर करते थे. पैदल चलने वालों को बचाने और रुकने का इशारा करने के लिए घंटी बजती थी. दिल्ली की घनी बस्तियों में ट्राम ही आने-जाने का मुख्य साधन बन गई थी.
नेहरू जी की शादी के बाराती
1916 में जवाहरलाल नेहरू की शादी सीताराम बाजार इलाके में हुई थी. कहा जाता है कि बारात के कुछ मेहमान ट्राम से ही वहां गए थे. यह दिखाता है कि ट्राम रोजमर्रा की जिंदगी का कितना बड़ा हिस्सा बन चुकी थी. आजादी के बाद बसें आने लगीं. दिल्ली की आबादी तेजी से बढ़ी. बाजार और ज्यादा भीड़भाड़ वाले हो गए. कारें और दूसरे वाहन बढ़ गए. धीमी चलने वाली ट्राम को तंग सड़कों पर जगह मिलना मुश्किल हो गया. आखिरकार दिसंबर 1963 में सेवा बंद कर दी गई. ट्रैक हटा दिए गए और सड़कें दूसरे यातायात के लिए खोल दी गईं. बहुत से लोग उदास हुए. पुराने लोग आज भी उस धीमी सवारी, घंटी की आवाज और पुरानी दिल्ली की रफ्तार से मेल खाती ट्राम की बात करते हैं.
जिन लोगों ने उन ट्रामों की सवारी की है, उनमें से कई आज भी हैं. कोई बल्लीमारान से सदर बाजार जाता था, कोई जमा मस्जिद के पास से फाउंटेन तक. सस्ता किराया और खुली गाड़ी जिसमें हवा और बाजार का नजारा दोनों मिलते थे, ये सब यादें अभी भी जिंदा हैं.
अब दिल्ली सरकार ट्राम वापस लाने की सोच रही है. शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम इस पर काम कर रहा है. ट्राम से प्रदूषण कम हो सकता है और दुकानदारों, वहां के निवासियों और पर्यटकों के लिए आना-जाना आसान बन सकता है. पहले भी चांदनी चौक के आसपास छोटी लाइन की बात हुई थी, लेकिन आगे नहीं बढ़ी. अब फिर से दिलचस्पी दिख रही है. कहा जा रहा है कि नई ट्राम पुरानी खुली गाड़ियों जैसी नहीं होगी. लेकिन मूल विचार वही है कि साफ-सुथरा, साझा यातायात जो पुरानी दिल्ली को और कारों और शोर से न भर दे.
ट्राम की कहानी सिर्फ यातायात की नहीं है. यह दिखाती है कि बीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर आजादी और आज की भीड़भाड़ तक दिल्ली कैसे बदली है. शुरू करने वाली कंपनी, सस्ते किराए, मशहूर बाजारों से होकर जाने वाले रास्ते, नेहरू की शादी का किस्सा और 1963 में बंद होना एक कहानी के हिस्से हैं. अब शायद नया अध्याय शुरू हो. अगर दिल्ली में ट्राम वापस आई तो वह सिर्फ सवारियों को नहीं, पुरानी यादों को भी लेकर चलेगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)