भारत मंडपम में 12-13 सितंबर को जब ब्रिक्स देशों के नेता जुटेंगे, तो नई दिल्ली में सिर्फ एक और शिखर सम्मेलन नहीं हो रहा होगा. पिछले छह महीनों में दुनिया इतनी उलझ गई है कि भारत को इस मंच से आखिर क्या चाहिए, यह सवाल अब सिद्धांत का नहीं रहा, यह सीधे बजट, महंगाई और रोजगार से जुड़ा सवाल बन गया है. इसलिए इस बार भाषणों से ज़्यादा भारत के ठोस हितों पर बात करना ज्यादा ईमानदार तरीका होगा.
कितनी बड़ी है भारत की ऊर्जा जरूरत
सबसे बड़ा हित है ऊर्जा. 28 फरवरी को ईरान के साथ जंग शुरू हुई और होर्मुज लगभग बंद हो गया. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 फीसद आयात करता है. इसमें से करीब 40 फीसद तेल, 60 फीसद एलएनजी और 90 फीसद एलपीजी इसी रास्ते से आता है. असर आंकड़ों में देखिए. अप्रैल-जून तिमाही में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 61 फीसद बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर पहुंच गया. यह तब हुआ जब आयात की मात्रा असल में घट गई थी. माल भाड़ा और युद्ध-बीमा भी कई गुना बढ़ गया है. मार्च से अगस्त के छह महीनों में भारत पर करीब 22 अरब डॉलर का अतिरिक्त ईंधन-बोझ पड़ा. रुपया 96 के पार गिर गया. यह सब आखिर में आम आदमी की रसोई और व्यापार घाटे में उतरता है. सरकार का कहना है कि भारत के पास ढाई सौ करोड़ बैरल से ज़्यादा का भंडार है, लेकिन भंडार कोई हल नहीं है, वह सिर्फ समय खरीदता है. असली हल है सप्लायर और रास्तों में विविधता. यही ब्रिक्स की मेज़ पर मिल सकता है.
दूसरा हित है भुगतान और व्यापार की वैकल्पिक व्यवस्था. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने एक बात साफ कर दी है: व्यापार अब सिर्फ व्यापार नहीं रहा, वह दबाव का हथियार बन गया है. पिछले अगस्त में भारतीय सामान पर 50 फीसद शुल्क लगा, एशिया में सबसे ज्यादा, इसमें रूसी तेल खरीद से जुड़ा दंडात्मक हिस्सा भी था. फरवरी में नेताओं के स्तर की समझ के बाद यह 18 फीसद पर आया, लेकिन बारीक शर्तों पर विवाद और लागू करने की अनिश्चितता अब भी बनी है. एक ही साल में दबाव और सौदा दोनों का अनुभव करने के बाद भारत का निष्कर्ष साफ है: एक ही रास्ते पर निर्भर रहना खतरनाक है. इसीलिए भारत ब्रिक्स में यूपीआई, पिक्स और ई-रुपया जोड़ने वाले 'पेमेंट ब्रिज' पर जोर देगा. मकसद डॉलर को गिराना नहीं है; मकसद डॉलर पर निर्भरता कम करके लेन-देन की लागत और प्रतिबंधों का खतरा घटाना है. साझा ब्रिक्स मुद्रा के विचार को भारत ने लगातार खारिज किया है. यह भी साफ कहा है कि 'डॉलर को कमजोर करने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है.' क्योंकि अमेरिका आज भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. भारत को झगड़ा नहीं चाहिए; भारत को विकल्प चाहिए.
भारत के लिए कितना जरूरी है रूस से रिश्ता
तीसरा हित है, रूस के साथ रिश्ता बनाए रखना. यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें साल में पहुंच गया है. जिनेवा की बातचीत बेनतीजा रही, रूस ने अपनी शर्तें नहीं बदलीं. सितंबर में फिर बातचीत की संभावना जताई जा रही है, फिर भी समझौता दूर दिखता है. इस पृष्ठभूमि में रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर है और रक्षा सामान के लिए भी अहम है.'रूसी तेल खरीदने के लिए हमें किसी की इजाज़त नहीं चाहिए,' यह भारत का साफ रुख रहा है. ब्रिक्स ही वह इकलौता बड़ा मंच है, जहां भारत रूस से खुलकर, सम्मान के साथ और नियमित रूप से बात कर सकता है और वह भी पश्चिमी साझेदारी से समझौता किए बिना. पुतिन और शी जिनपिंग दोनों दिल्ली आ रहे हैं, तो भारत के लिए यह सहूलियत कितनी कीमती है, यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है.

चौथा हित है चीन के साथ संतुलन बनाना. यह आसान नहीं है. इसे लेकर कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए. समूह की अर्थव्यवस्था में चीन का हिस्सा बहुत बड़ा है. चीन की दिलचस्पी ब्रिक्स को 'पश्चिम-विरोधी मोर्चा' बनाने में है. भारत की दिलचस्पी उसमें नहीं है. लेकिन सीमा पर तनाव के बावजूद चीन के साथ सीधे, संस्थागत संवाद की एक जगह उपलब्ध होना भारत के हित में ही है. मई में विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए; न्यू डेवलपमेंट बैंक के पास पर्याप्त पूंजी नहीं है; सदस्यता के नियम भी अभी तय नहीं हुए हैं. इसीलिए भारत की अध्यक्षता 'मतभेद संभालने' की कला बन गई है.
कितना बड़ा है आतंकवाद और सुरक्षा का सवाल
पांचवां हित बिल्कुल ठोस और व्यापारिक है. भारत की अध्यक्षता में 25 शहरों में साढ़े तीन सौ से ज़्यादा बैठकें हुईं. जयपुर में व्यापार मंत्रियों ने 'ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी रणनीति 2030' को अंतिम रूप दिया, निर्यात-केंद्रित छोटे और मझोले उद्योगों के लिए बिल-भुनाई की व्यवस्था को मंजूरी दी, खाद्य सुरक्षा पर विकासशील देशों के रुख का समर्थन किया और विश्व व्यापार संगठन में सुधारों की मांग की. यह समूह खरीद-शक्ति के हिसाब से दुनिया के उत्पादन का करीब 40 फीसद और दुनिया की करीब आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है; आपसी व्यापार 1.17 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है. जहां पश्चिमी बाजार संरक्षणवाद की ओर बढ़ रहे हैं, वहां यह बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए एक तरह का बीमा है.
छठा और अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला हित है, आतंकवाद और सुरक्षा. भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान आतंकवाद-विरोधी भाषा और एफएटीएफ मानकों पर जोर दिया है. 'आतंकवाद की निंदा सुविधा का नहीं, सिद्धांत का मामला होना चाहिए' यह रुख भारत ने पहलगाम हमले के बाद ब्रिक्स के मंच से रखा था. दस-ग्यारह देशों के घोषणापत्र में यह भाषा बनाए रखना भारत के लिए सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि कूटनीतिक कमाई है.
भारत के विदेशी नीति की परीक्षा
आलोचक कहेंगे कि भारत दोनों तरफ पैर रखकर चल रहा है: क्वाड में भी और ब्रिक्स में भी. लेकिन इतनी अस्थिर दुनिया में यही सबसे समझदार रुख है. ट्रंप के झटकों ने भारत की नीति की परीक्षा ली, लेकिन उस नीति की जड़ नहीं बदली. जनवरी में यूरोपीय संघ के साथ समझौता, ब्रिटेन-ओमान के साथ करार, तकनीक में नई साझेदारियां और साथ ही ब्रिक्स की मेजबानी यह विरोधाभास नहीं है, यह सुसंगति है.
अगले हफ्ते दिल्ली में जो तय होगा, वह किसी नई विश्व-व्यवस्था का घोषणापत्र नहीं होगा. लेकिन तेल की सप्लाई, पैसे का रास्ता, निर्यात का बाजार और बातचीत की खिड़की, इन चार चीजों में से एक भी भारत को छोड़ने की गुंजाइश नहीं है, ऐसे दौर में इन चारों को एक ही छत के नीचे जोड़ने का मौका दुर्लभ है. एक यथार्थवादी इस मौके को नकारता नहीं.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)