बस्तर में नक्सलवादी आंदोलन की समाप्ति की डेडलाइन को खतम हुए अब पांच महीने हो गए हैं. लेकिन अब भी सरकार ने इस हिंसा के कारण विस्थापित होकर दूसरे प्रदेशों में गए लोगों के पुनर्वास के लिए कोई योजना नहीं बनाई है. राष्ट्रीय जनजाति आयोग ने भी इसके लिए कई बार राज्य सरकार से आग्रह किया है.
अधिकतर विस्थापित सरकार की ओर से शुरू किए गए सलवा जुडुम आंदोलन के बाद 2005 में अपना घर-बार छोड़कर तत्कालीन आंध्र प्रदेश जाने को मजबूर हो गए थे. ये लोग आज के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में जंगल काटकर घर और खेती की जमीन बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं.
क्यों वापस नहीं आना चाहते हैं आदिवासी
पिछले 20 साल में वहां विस्थापितों की नई पीढ़ी तैयार हुई है. यह पीढ़ी दक्षिणी प्रदेशों की उन्नत अर्थव्यवस्था से प्रभावित होकर दक्षिण बस्तर के अपने पिछड़े गांवों में वापस नहीं आना चाहती है. लेकिन पिछले कुछ महीने में छत्तीसगढ़ में नक्सल आंदोलन की समाप्ति के बाद दक्षिणी प्रदेशों के सरकारों के रुख से उनमें निराशा बढ़ी है.
जून में विस्थापितों ने तेलंगाना में एक बैठक की थी. इसमें तेलंगाना की केबिनेट मंत्री धनश्री अनुसुइया (सीतक्का) ने विस्थापितों से साफ शब्दों में यह कहा था कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी यह चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में हालात सुधरने के बाद विस्थापितों को अब अपने घर वापस जाना चाहिए. इस हालात में वे चाहते हुए भी विस्थापितों की कोई मदद नहीं कर सकती हैं. धनश्री अनुसुइया कांग्रेस में शामिल होने के पहले माओवादी आंदोलन का हिस्सा रही हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ से विस्थापितों के विषय पर काकातीय विश्वविद्यालय से पीएचडी भी की है. इस बैठक में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पूर्व मंत्री कवासी लखमा और बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी भी शामिल हुए थे. इनके इलाकों से ही अधिकतर आदिवासी विस्थापित हुए हैं.
तेलंगाना सरकार के रुख के बाद कई विस्थापितों का विचार बदला है. कई ने इस बार छत्तीसगढ़ के अपने पुराने गांव में खेती शुरू की है. कई परिवार वापस आ गए हैं. लेकिन पर इन परिवारों को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा कोई नीति घोषित नहीं करने से कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
धर्मांतरित आदिवासियों की समस्या क्या है
कुछ विस्थापित कह रहे हैं कि जब उन्होंने अपने गांव का दौरा किया तो पाया कि उनके खेतों पर कोई और खेती कर रहा है. वे यह नहीं चाहते कि विस्थापित फिर से वापस आएं. सबसे अधिक दिक्कत धर्मांतरित परिवारों को है जिनके बारे में सर्व आदिवासी समाज ने यह घोषित किया है कि उन्हें वापस नहीं आने दिया जाएगा.
कुछ परिवारों की समस्या यह है कि उनकी जमीनों पर पिछले 20 सालों में जंगल उग आया है. उसे फिर से खेत बनाने में काफी खर्च आएगा, उन्हें फिर से नया घर भी बनाना होगा क्योंकि पुराना घर अब टूट गया है.छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से इन सब में मदद की कोई घोषणा नहीं की गई है.
छत्तीसगढ़ सरकार के ताज़ा सर्वे ने यह पाया है कि अब भी 32 हजार विस्थापित आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रह रहे हैं. इनमें से अधिकतर ने वापस आने के लिए मना कर दिया है. यह सर्वे राष्ट्रीय जनजाति आयोग के आग्रह पर किया गया था. इसके पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने विधानसभा में यह कहा था कि राज्य से हिंसा के कारण कोई विस्थापित होकर दूसरे राज्यों में नहीं गया है.
जमीन का मालिकाना और जाति प्रमाण पत्र
साल 1958 में बने दंडकारण्य प्रोजेक्ट में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित लगभग डेढ़ लाख बंगालियों को इन्हीं इलाकों में बसाया गया था.वो अब उनको उस समय दिए गए जमीन के मालिकाने और जातिगत आरक्षण आदि की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं.
हालांकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कुछ आदिवासी संगठन अब भी इसका प्रयास कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ से वहां विस्थापित होकर गए लोगों को वहां जमीन का मालिकाना और जाति प्रमाण पत्र मिले. लेकिन कानून के जानकार कहते हैं संविधान संशोधन के बिना इन सब की संभावना कम है.
सर्व आदिवासी समाज के स्थानीय नेताओं से मैंने बात करने की कोशिश की पर वे ईसाई धर्मांतरित विस्थापितों को वापस नहीं आने देने के मुद्दे पर अडिग हैं. जब मैंने उनसे यह कहा कि उनका यह निर्णय संवैधानिक रूप से गैर कानूनी है तो उन्होंने कहा कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को इस तरह के निर्णय लेने का अधिकार है.
विस्थापितों के पुनर्वास की राह कैसी है
छत्तीसगढ़ सरकार ने वनाधिकार की धारा 3.1.एम के तहत विस्थापितों को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उनके छत्तीसगढ़ की कब्जे की वन भूमि के बदले में वनभूमि का मालिकाना दिलवाने के लिए अब तक कोई प्रयास नहीं किया है, हालांकि छत्तीसगढ़ ने कई जनजाति समूहों को छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति की सूची में लाने के लिए संविधान संशोधन की पहल की, जैसा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ आदिवासी समूह छत्तीसगढ़ के विस्थापितों के लिए प्रयास कर रहे हैं.
छत्तीसगढ़ से विस्थापित मुरिया जनजाति के लोगों को वहां गुती कोया कहा जाता है. लेकिन गलती से संविधान में आंध्र प्रदेश की अनुसूचित जनजाति की सूची में वह कुती कोया लिख गया है. इसे बदलने के लिए भी छत्तीसगढ़ सरकार अनौपचारिक रूप से संविधान संशोधन कर नाम की स्पेलिंग बदलने के लिए आदिवासी समूहों की मदद कर सकती है.
31 मार्च 2026 को दंडकारण्य क्षेत्र पांच दशक के दु:स्वप्न से बाहर निकला. छत्तीसगढ़ में रह रहे विस्थापित अब अपने घरों को लौटने लगे हैं. सरेंडर किए माओवादियों के लिए घर लौटना अभी थोड़ा मुश्किल है. लेकिन उम्मीद है कि सरकार छत्तीसगढ़ के बाहर रह रहे विस्थापितों के पुनर्वास के लिए भी कोई डेडलाइन तय करेगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)