छह नवंबर 2004 को दिल्ली के मौर्या शेरटन होटल के प्रांगण में जाड़ा सिहरन पैदा कर रहा था, पर 'हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट' में भारत-पाकिस्तान संबंधों में गर्मजोशी घोलने का प्रयास चल रहा था. दोनों देशों की नामवर हस्तियों ने प्रथम सत्र में रिश्तों की बेहतरी पर विचार रखे. सत्र के बाद होटल के रूफ टॉप रेस्तरां में अतिथि लजीज भोजन के साथ बौद्धिक विमर्श में जुटे हुए थे.
एक कोने में काले चश्मे और थ्री पीस सूट में एक परिचित चेहरा सिगरेट के कश ले रहा था. क्षण भर सोचने के बाद पहचान पाया कि यह तो अल्ताफ हुसैन हैं, पाकिस्तान की मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट ( एमक्यूएम) के नेता, जिन पर वहां मुहाजिर (भारत से गए लोग) समुदाय जान निसार करता है. हम उनके पास पहुंचे, परिचय दिया. उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से पास बिठाया. बैंसन एंड हेजेस का पैकेट निकालकर पूछा, 'बरखुरदार, आप भी लें?' हमने विनम्रता से मना किया. उन्होंने बताया कि सुबह ही लंदन से आए हैं और कुछ देर बाद समिट में बोलेंगे. फिर पूछा,'शुक्ला? तो आप ब्राह्मण हैं?' हमारे आश्चर्य पर मुस्कराते हुए बोले,यार,''मैं आपसे दूर कहां हूं? आगरा का हूं, यूपी वाला. मेरे कितने पुरखे आगरा के राजा की मंडी की मिट्टी में दफन हैं. वालिद रेलवे में थे. 1950 में सरहद पार चले गए, पर जड़ें इतनी जल्दी कैसे टूट सकती हैं?''
अरहर की दाल का स्वाद
पाकिस्तानी नेता का यह आत्मीय स्वर अच्छा लगा. सिगरेट खत्म होने पर हमने उन्हें लंच का निमंत्रण दिया. प्लेट में दाल देखते ही उन्होंने पूछा,''यह कौन सी दाल है?'' स्टाफ ने बताया-अरहर. उनका चेहरा खिल उठा,''लंदन में भी अरहर खाता हूं. देखें, यहां का स्वाद कैसा है. हम यूपी वालों को अरहर पसंद होती है.''
वहां इमरान खान भी थे, किंतु दोनों हमवतनों में संवाद नहीं हुआ. हमने पूछा कि समिट में उनके वक्तव्य का केंद्र क्या रहेगा. दाल-चावल का आनंद लेते हुए उन्होंने कहा,''मेरा फोकस आम अवाम की सरहद पार आवाजाही सुगम बनाने पर रहेगा. बंटवारे से टूटे खानदानों को फिर मिलने का अवसर मिले तो दोनों मुल्क अमन से रह सकेंगे.''
मुहाजिरों को पाकिस्तान में दोयम दर्जा मिला है. बंटवारा न होता तो मुसलमान बेहतर दशा में होते. बातचीत में आगरा और उत्तर प्रदेश बार-बार आए.

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Photo Credit: Altaf Hussain X
पाकिस्तान में कौन कहलाता है मुहाजिर
मुहाजिर अरबी शब्द है, जिसका अर्थ अप्रवासी है. अल्ताफ ने आरोप लगाया कि पंजाबी बहुमत वाली सेना मुहाजिरों का कत्लेआम कर रही है और सरकार उनके हक नहीं देती. वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहायता की अपील करते रहे हैं.मुहाजिर मुख्यतः उत्तर प्रदेश समेत भारत के अलग-अलग राज्यों से सिंध, विशेषकर कराची में बसे. पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के रूप में उन्होंने सिंध की राजनीति को प्रभावित किया. उनकी संख्या लगभग चार करोड़ आंकी जाती है.
प्रखर वक्ता अल्ताफ अपनी तकरीरों में भारत से संबंध का उल्लेख करते हुए कहते रहे हैं कि भारत को मुहाजिरों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए. समिट में उन्होंने 1971 की पराजय पर पाकिस्तानी सेना की खिल्ली उड़ाई, जिससे वहां की सरकार और सेना नाराज हुई.
अल्ताफ का जन्म कराची में हुआ. वे लंबे समय से लंदन में रह रहे हैं. समिट के बाद हम उन्हें आगरा ले गए. इस यात्रा में उन्होंने बताया कि मुहाजिरों ने अयूब खान के काल में अपने अधिकारों की आवाज उठाई, 1978 में छात्र संगठन बनाया और 1984 में मुहाजिर कौमी मूवमेंट के नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई.
क्या जन्नत जैसा है आगरा
आगरा पहुंचते ही वे राजा की मंडी गए. दीवारें, दुकानें और लोग देखकर भावुक हो उठे, ''जन्नत से कम तो नहीं है आगरा.'' उन्होंने कहा कि मुहाजिरों के उत्तर प्रदेश से रिश्ते को समझने के लिए पाकिस्तानी अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन पढ़िए.'डॉन','द नेशन' या उर्दू पत्रों में प्रायः लिखा होता है- मूलतः यूपी के परिवार से संबंध रखने वाले वर-वधू संपर्क करें. उनका वतन की मिट्टी से जुड़ाव बना हुआ है. उनकी दिली ख्वाहिश है कि उनके बच्चों के निकाह उत्तर प्रदेश के परिवारों में हों. तल्खी बनी रही तो बंटे परिवार सदा दूर हो जाएंगे.
आज के तनावपूर्ण संबंधों में सरहद पार निकाह दुर्लभ हो गए हैं. एक समय सैकड़ों विवाह होते थे. पाकिस्तानी दूल्हा भारतीय दुल्हन या भारतीय दूल्हा और पाकिस्तानी दुल्हन. सबसे बड़ी बाधा वीजा है. आम नागरिक अदनान सामी जैसे विशिष्ट लोगों जितने सौभाग्यशाली नहीं हैं. झंझट से बचने के लिए बहुतों ने सीमा पार जीवनसाथी खोजना छोड़ दिया.
कुछ वर्ष पूर्व पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष शहरयार खान ने अपने बेटे अली का विवाह भोपाल की लड़की से किया. कट्टरपंथियों ने हंगामा मचाया कि पाकिस्तान में लड़की नहीं मिली क्या. इस पर शहरयार ने उत्तर दिया,''भोपाल मेरा शहर है. अम्मी वहीं की थीं. नवाब पटौदी के चचेरे भाई होने के नाते विभाजन के बाद परिवार पाकिस्तान गया.''
केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं, हिंदू परिवार भी ऐसे रिश्ते जोड़ते रहे. पाकिस्तानी फिल्म निर्माता सतीश आनंद की बहन टीना का विवाह वेस्टन टीवी के रवि वच्छानी से हुआ. सतीश कराची में हिंदू समाज के प्रमुख चेहरे हैं.
सरहद के आर-पास शादी-ब्याह
विकेट कीपर सरफराज अहमद के कराची में हुए निकाह में इटावा से मामू महमूद भाई सहित अनेक रिश्तेदार पहुंचे थे. उनकी मां अकीला बानू इटावा से हैं. अब भारत से दूल्हा-दुल्हन खोजना कठिन होने से मुहाजिर परिवार पाकिस्तान में बसे यूपी वाले परिवारों से संबंध जोड़ते हैं. जहीर अब्बास की पत्नी कानपुर की हैं. मोहसिन खान ने रीना रॉय से निकाह किया. लेखक अनिल धाड़कर और सादिया देहलवी ने भी पाकिस्तानी जीवनसाथी चुने. पूर्व थलसेनाध्यक्ष बिक्रम सिंह की बहू भी पाकिस्तानी हैं.
ये उदाहरण याद दिलाते हैं कि बंटवारे की रेखा कितनी भी गहरी क्यों न हो, मिट्टी की पुकार और खून के रिश्ते अब भी जीवित हैं. काश दोनों देशों की नीतियां भी उतनी ही मानवीय और उदार होतीं जितना आम अवाम का मन आज भी है.
खैर, आगरा से वापस दिल्ली आते हुए अल्ताफ हुसैन कार से बाहर का नजारा देखते हुए कह रहे थे यूपी कितना खूबसूरत है ना.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं.यह लेख उनकी किताब '1947- विभाजन के शेष सवाल' का संपादित अंश है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)