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AI के दौर में H-1B का आकर्षण हुआ कम, टेक प्रोफेशनल के लिए भारत में ही बढ़ रहे हैं अवसर

प्रांजल शर्मा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 09, 2026 22:26 pm IST
    • Published On अक्टूबर 09, 2026 18:38 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 09, 2026 22:26 pm IST
AI के दौर में H-1B का आकर्षण हुआ कम, टेक प्रोफेशनल के लिए भारत में ही बढ़ रहे हैं अवसर
डोनाल्ड ट्रंप सरकार अपने फैसलों से भारतीयों का अमेरिका में काम करना मुश्किल बना रहा है.
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एक समय ऐसा था, जब दो लाख 83 हजार से ज्यादा भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के पास अमेरिका में काम करने के लिए H-1B वर्क वीजा था. लेकिन पिछले कुछ सालों में इनकी संख्या कम हुई है. एक तरह से देखें तो ऐसा होना तय था. वीजा और ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने पर बढ़ती पाबंदियों को अलग भी रख दें, तब भी सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की मांग घटने वाली है, क्योंकि काम करने का तरीका बदल रहा है. अब कोडिंग के बुनियादी काम मशीनों की मदद से अपने आप होने लगे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के ज्यादा उपयोगी होने के साथ टेक्नोलॉजी कंपनियों में यह बदलाव और तेजी से बढ़ेगा.

AI कैसे खा रहा है नौकरियां

पिछले दो सालों में दुनियाभर के टेक्नोलॉजी उद्योग में नौकरियां जाने की घटनाएं बढ़ी हैं. उद्योग में छंटनी पर नजर रखने वाली वेबसाइट Layoffs.fyi के अनुमान के मुताबिक, 2025 में 278 कंपनियों ने छंटनी की 333 घटनाओं में 1 लाख 22 हजार से ज्यादा कर्मचारियों को नौकरी से निकाला. वहीं, 2026 में अक्टूबर की शुरुआत तक 311 कंपनियों में छंटनी की 351 घटनाएं हुईं. इनमें एक लाख 30 हजार से ज्यादा नौकरियां खत्म हो गईं. इस तरह 2025 और 2026 में अब तक टेक्नोलॉजी क्षेत्र में करीब दो लाख 53 हजार नौकरियां जा चुकी हैं. Layoffs.fyi के संस्थापक रोजर ली के मुताबिक, 2026 में टेक्नोलॉजी क्षेत्र में छंटनी की 33 फीसदी घटनाओं के पीछे AI को वजह बताया गया.साल 2024 में ऐसा सिर्फ एक फीसदी मामलों में हुआ था.

टेक्नोलॉजी उद्योग के सामने अब कौशल यानी काम करने की योग्यता से जुड़ा एक बड़ा संकट भी है. पुराने कौशल अब उतने उपयोगी नहीं रह गए हैं. वहीं, नए कौशल रखने वाले पेशेवर इतनी तेजी से तैयार नहीं हो पा रहे हैं कि उद्योग की जरूरतें पूरी की जा सकें. दुनियाभर की टेक्नोलॉजी कंपनियों के सामने यह असंतुलन अगले कुछ सालों तक बना रह सकता है.

 H-1B वीजा कार्यक्रम से कंपनियों का फायदा क्या है

अमेरिका की प्रतिभा और रोजगार से जुड़ी संस्था SHRM की मुख्य प्रशासनिक अधिकारी एमिली एम. डिकेंस ने अमेरिकी सरकार को लिखे एक पत्र में कहा, "अमेरिकी नियोक्ताओं को लगातार ऐसे कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिनके पास जरूरी प्रतिभा और कौशल हों. अपनी जरूरत के कर्मचारियों को भर्ती करने, उन्हें प्रशिक्षित करने और अपने साथ बनाए रखने की व्यापक रणनीति के तहत वे H-1B वीजा कार्यक्रम पर निर्भर रहते हैं."

कंपनियों को योग्य कर्मचारी खोजने में अब भी काफी मुश्किलें आ रही हैं. SHRM के 2026 के एक अध्ययन के मुताबिक, करीब 68 फीसदी संस्थाओं को पूर्णकालिक पदों के लिए कर्मचारियों की भर्ती करने में परेशानी हुई. वहीं, मानव संसाधन (एचआर) से जुड़े 53 फीसदी पेशेवरों ने बताया कि एक साल पहले की तुलना में कर्मचारियों को भर्ती करना अब ज्यादा मुश्किल हो गया है. इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, सूचना प्रौद्योगिकी (IT), स्वास्थ्य सेवाओं, वित्त, लेखा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में यह समस्या खास तौर पर गंभीर है. 

क्या अमेरिका में योग्य उम्मीदवारों की कमी है

यह अध्ययन यह समझने में भी मदद करता है कि कई कंपनियां H-1B वीजा के जरिए विदेशी पेशेवरों को क्यों भर्ती करती है. इस कार्यक्रम का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों में से 65 फीसदी ने कहा कि उन्हें बहुत खास कौशल और विशेषज्ञता वाले कर्मचारियों की जरूरत है. वहीं, 51 फीसदी कंपनियों ने जरूरी कौशल वाले कर्मचारियों की कमी और 49 फीसदी ने अमेरिका में पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने की बात कही.

भारतीय टेक्नोलॉजी उद्योग के सामने भी ऐसी ही स्थिति है. उद्योग संगठन नैसकॉम (Nasscom) के एक अध्ययन में भारतीय पेशेवरों के लिए AI से जुड़े गहरे और बेहतर कौशल विकसित करने की जरूरत बताई गई है. नैसकॉम का कहना है कि AI पर आधारित कार्यस्थलों की जरूरतों को देखते हुए शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों को मिलकर कर्मचारियों को तैयार करने के तरीके बदलने होंगे.

शैक्षणिक संस्थानों को सिर्फ कोडिंग सिखाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें इंजीनियरिंग से जुड़े फैसले लेने की क्षमता, संबंधित क्षेत्र की गहरी जानकारी और काम का आकलन करने के नए तरीकों पर भी ध्यान देना चाहिए. इसी तरह, कंपनियों को भी कर्मचारियों की बुनियादी क्षमताएं विकसित करने के तरीके बदलने होंगे. उन्हें अनुभवी पेशेवरों से नए कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिलाने, स्वतंत्र रूप से समस्याओं को हल करने के ज्यादा मौके देने, रोजमर्रा के काम में AI से मिले नतीजों की जांच करने और करियर की शुरुआत करने वाले कर्मचारियों के विकास में लगातार निवेश करने की जरूरत है.

क्या ऑटोमेशन और AI के लिए तैयार है भारत

इसलिए भारतीय टेक्नोलॉजी उद्योग, कर्मचारियों की भर्ती और प्रशिक्षण से जुड़े अधिकारियों और नीति बनाने वालों के सामने बड़ी चुनौती है. उन्हें शिक्षा से लेकर रोजगार तक की पूरी प्रक्रिया को इस तरह बदलना होगा कि लोग ऑटोमेशन और AI के दौर की जरूरतों के मुताबिक तैयार हो सकें. जिन पेशेवरों के लिए अमेरिका में H-1B वीजा के जरिए नौकरी पाने का रास्ता मुश्किल हो रहा है, उनके लिए कई दूसरे क्षेत्रों में अवसर बढ़ रहे हैं.

उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, बड़ी संख्या में पेशेवर पुरानी IT कंपनियों को छोड़कर ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की ओर जा रहे हैं. पिछले कुछ सालों में इन केंद्रों ने टेक्नोलॉजी से जुड़े पेशेवरों की भर्ती बढ़ाई है.

ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स क्या हैं 

इन्हें कैप्टिव सेंटर या साझा सेवा केंद्र भी कहा जाता है. ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पूरी तरह उनके स्वामित्व वाली इकाइयां होती हैं. इन केंद्रों में मूल कंपनी के लिए टेक्नोलॉजी, डेटा विश्लेषण, शोध एवं विकास (आरएंडडी), इंजीनियरिंग, वित्त, मानव संसाधन और दूसरे काम किए जाते हैं. नैसकॉम और जीनोव की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में GCC का नेटवर्क वित्त वर्ष 2025-26 तक बढ़कर 2,117 केंद्रों और 3,728 इकाइयों तक पहुंच गया. इनमें 23.6 लाख पेशेवर काम कर रहे थे. इनसे 98.4 अरब डॉलर का राजस्व हासिल हुआ. वित्त वर्ष 2020-21 के बाद से भारत में GCC की संख्या 32 फीसद बढ़ी है. फोर्ब्स ग्लोबल 2000 की सूची में शामिल 506 कंपनियों ने भारत में अपना कामकाज शुरू किया है.

इस विस्तार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अहम भूमिका रही है. वित्त वर्ष 2020-21 के बाद स्थापित किए गए GCC में से करीब आधे ऐसे हैं, जिनकी शुरुआत ही AI को ध्यान में रखकर की गई थी. वहीं, 1,200 से ज्यादा केंद्रों ने अपने कामकाज में AI और मशीन लर्निंग को शामिल कर लिया है.

इस बदलाव को बढ़ावा देने के लिए 250 से ज्यादा विशेष केंद्र बनाए गए हैं, जहां AI से जुड़े काम और शोध किए जाते हैं. इसके अलावा, भारत में AI के क्षेत्र में काम करने वाले करीब 2.5 लाख पेशेवरों की प्रतिभा भी मौजूद है. इससे AI आधारित नए प्रयोगों और कंपनियों के कामकाज में बदलाव के लिए भारत की अहमियत बढ़ रही है.

भारत में GCC में काम करने वाले 23.6 लाख लोगों की संख्या, किसी भी समय अमेरिका में H-1B वीजा पर काम कर रहे भारतीयों की अनुमानित संख्या से करीब चार गुना ज्यादा है.

भारतीय  स्टार्टअप कितनी नौकरियां दे सकते हैं

GCC के अलावा, स्टार्टअप कंपनियां भी टेक्नोलॉजी पेशेवरों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर रही हैं. इनमें बड़ी और अरबों डॉलर के मूल्यांकन वाली यूनिकॉर्न कंपनियां भी शामिल हैं. हालांकि, स्टार्टअप में काम करने वाले टेक्नोलॉजी पेशेवरों की अलग से कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन इनमें से ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों की भर्ती कर रही हैं.

भारत सरकार के 'स्टार्टअप इंडिया' कार्यक्रम के मुताबिक, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप ने वित्त वर्ष 2025-26 तक 23.3 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा की थीं. इस दौरान मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की कुल संख्या दो लाख 23 हजार से अधिक हो गई थी. इनमें से बड़ी संख्या में नौकरियों के लिए कोडिंग या AI की जानकारी जरूरी होती है.

प्रतिभा और कौशल रखने वाले पेशेवर वहीं जाते हैं, जहां उनकी मांग होती है. पेशेवरों का एक जगह से दूसरी जगह जाना उद्योगों की तरक्की और नए कारोबार के अवसर पैदा होने पर निर्भर करता है. पिछले कई दशकों में भारतीय पेशेवर बेहतर अवसरों की तलाश में अमेरिका जाते रहे हैं. लेकिन अब भारतीय और एशियाई अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही हैं. इनके साथ ही जरूरी टेक्नोलॉजी कौशल रखने वाले पेशेवरों की मांग भी बढ़ेगी.

ग्रीन कार्ड और H-1B वीजा पर लगी पाबंदियों का मतलब यह नहीं है कि पेशेवरों के लिए आगे बढ़ने के सभी रास्ते बंद हो गए हैं. जिन भारतीय पेशेवरों को अमेरिका से लौटना पड़ सकता है, उनके लिए भारत में तरक्की और करियर बनाने के पर्याप्त अवसर मिलने की संभावना है.

यह बदलाव का दौर है, किसी त्रासदी का नहीं.

 (डिस्क्लेमर: लेखक एक आर्थिक विश्लेषक हैं. वो टेक्नोलॉजी, ग्लोबलाइजेशन और समावेशी विकास पर लेख लिखते रहते हैं.  इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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