12 साल पहले गर्मियों के ऐसे ही दिनों में नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार का नेतृत्व संभाला था. इससे पहले वे लगातार 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे. काल गणना में 12 साल को एक युग भी माना जाता है. ऐसे दौर में जब वैश्विक स्तर पर सरकार-विरोधी भावनाओं (एंटी इनकंबेंसी) का उभार है और ज्यादातर सरकारें लगातार दूसरा कार्यकाल भी नहीं देख पा रही हैं और कई जगह तो एक कार्यकाल में कई-कई प्रधानमंत्री बन रहे हैं. तब भारत की राजनीतिक स्थिरता और निरंतरता राजनीति विज्ञानियों के लिए दिलचस्पी का विषय है.
यह सही समय है जब नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कार्यशैली और शासन पद्धति का विधिवत अध्ययन किया जाए. यह समझने की कोशिश की जाए कि किस या किन राजनीतिक सिद्धांतों के माध्यम से इस शासन काल की व्याख्या बेहतर तरीके से की जा सकती है.
अभी तक राजनीति विज्ञानियों ने नरेंद्र मोदी के शासन को राष्ट्रवादी या सभ्यतामूलक आदि बताया है. आलोचकों ने उनको अधिनायकवादी, लोकलुभावन या पॉपुलिस्ट, हिंदू उग्र राष्ट्रवादी आदि बताने की कोशिश की है. इस आलेख का उद्देश्य इन लेबल की पड़ताल करना नहीं है. ये काम मैं अन्य विश्लेषकों पर छोड़ता हूं.
इस लेख का सीमित उद्देश्य यह पता करना है कि नरेंद्र मोदी का शासन 18वीं सदी के ब्रिटिश दार्शनिक और राजनेता एडमंड बर्क (1729-1797) के विचारों से कितना मेल खाता है अर्थात राजकाज और शासन पद्धति के मामले में मोदी एडमंड बर्क के विचारों से कितने पास और कितने दूर हैं.
यहां मेरा उद्देश्य ये साबित करना नहीं है कि मोदी एडमंड बर्क के विचारों की परंपरा में आते हैं या उनसे प्रभावित हैं. मोदी विशिष्ट भारतीय परंपरा के नेता हैं. उनकी जड़ें पूरी तरह यहीं है. यहां तक कि बहुत से अन्य भारतीय राजनेताओं के विपरीत उनकी शिक्षा भी पूरी तरह भारत में ही हुई है. इसके बावजूद ये तुलना मुझे बहुत दिलचस्प लगी, क्योंकि हजारों मील की भौगोलिक दूरी और सैकड़ों साल के समय अंतराल के बावजूद ये दोनों कई बार वैचारिक सहयात्री नजर आते हैं.

फ्रांस की राजधानी पेरिस में भारतीयों के साथ बातचीत करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
एडमंड बर्क के विचारों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-
- राजनीति में परंपरा और पूर्वजों के संचित ज्ञान का महत्व
- परिवर्तन क्रांति से नहीं, बल्कि सुधार के माध्यम से
- बदलाव सोच-समझकर, धीरे-धीरे और अनुभव के आधार पर होना चाहिए
- राज्य संरक्षक अर्थात ट्रस्टी है और आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी उसका दायित्व है
- वैचारिक कट्टरता से अधिक व्यावहारिकता या प्रयोजनवाद का महत्व
बर्क का संरक्षण और सुधार (कंजर्वेटिज्म) का दर्शन
1790 में प्रकाशित एडमंड बर्क की पुस्तक 'रिफ्लेक्शन्स ऑन द रिवोल्यूशन इन फ्रांस' अर्थात फ्रांसीसी क्रांति पर चिंतन आधुनिक संरक्षणवाद की आधारशिला मानी जाती है. बर्क बदलाव के विरोधी नहीं थे. उनका विरोध ऐसे अचानक और क्रांतिकारी बदलाव से था जो इतिहास, परंपरा और समाज के अनुभवों से कटकर केवल सैद्धांतिक या वैचारिक जड़ कल्पनाओं पर आधारित हो. बर्क फ्रांस की क्रांति के विरोध में तो थे. लेकिन ब्रिटेन में आए क्रमिक संवैधानिक बदलावों के वे समर्थक थे. वे उपनिवेशवाद का विरोध करते भी नजर आते हैं. उनका मानना था कि समाज कोई मशीन नहीं है, जिसे मनमर्जी से दोबारा डिजाइन किया जा सके. बल्कि यह कई पीढ़ियों के अनुभव, संघर्ष और ज्ञान से बनी एक जीवंत विरासत है.
बर्क ने समाज को इस तरह परिभाषित किया,''समाज केवल जीवित लोगों की साझेदारी नहीं है, बल्कि उन लोगों की भी है जो गुजर चुके हैं और उन लोगों की भी जो अभी जन्म लेने वाले हैं.''
यही विचार बर्क के दर्शन का केंद्र है. उनके अनुसार राजनीतिक नेता समाज को नए सिरे से बनाने वाले रचनाकार नहीं, बल्कि विरासत के संरक्षक होते हैं. उनका काम सभ्यता को बचाना भी है और उसे बेहतर बनाना भी. इसलिए बर्क आदर्श नेतृत्व को दो गुणों का संतुलन मानते थे-'संरक्षण की प्रवृत्ति और सुधार करने की क्षमता.'
नरेंद्र मोदी के 'विरासत भी और विकास भी' के नारे को समझने के लिए यह दृष्टिकोण उपयोगी हो सकता है.
विकास भी, विरासत भी
मोदी भारत की सभ्यतागत निरंतरता पर जोर देते हैं. वे यह नहीं मानते हैं कि 1947 में भारत का जन्म हुआ था. वे भारत को नए बने आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं देखते, बल्कि हजारों साल पुरानी एक सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करते हैं. वे अक्सर सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक निरंतरता और सभ्यतागत पहचान की बात करते हैं. वे प्राचीन धरोहरों के संरक्षण, धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों के पुनरुद्धार और स्वदेशी परंपराओं को बढ़ावा देने के माध्यम से विरासत को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में रखने का प्रयास करते हैं. उदाहरण के लिए, पिपरहवा बुद्ध अवशेषों और दुनिया भर से सैकड़ों भारतीय कलाकृतियों की देश वापसी सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की इसी सोच को दर्शाती है. इसी तरह, ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण का उद्देश्य देशभर की पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और डिजिटलीकरण करना है. वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और केदारनाथ धाम के पुनर्विकास जैसी परियोजनाएं भी इसी दर्शन को प्रतिबिंबित करती हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की सभ्यतागत निरंतरता पर जोर देते हैं.
यह दृष्टिकोण मार्क्सवादी सोच से अलग है. जहां मार्क्सवादी दृष्टिकोण अक्सर आधुनिकता के लिए परंपरा से दूरी को आवश्यक मानता है, वहीं मोदी की सोच में प्रगति को सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़ा जाता है, न कि सांस्कृतिक विस्थापन या अलगाव से. योग, आयुर्वेद, स्थानीय उत्पादन, वोकल फॉर लोकल, एक जिला-एक उत्पाद और सांस्कृतिक विरासत परियोजनाओं का प्रोत्साहन इसी प्रयास का हिस्सा है.
क्रांति नहीं, सुधार के जरिए बदलाव
मोदी शासन की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सुधारों को मौजूदा संस्थाओं के भीतर रहकर लागू करने की कोशिश की गई है न कि पूरे ढांचे को बदलने की. बर्क ने फ्रांसीसी क्रांति का विरोध इसलिए किया था, क्योंकि उनके अनुसार उसने पुराने संस्थानों और सामाजिक ढांचे को पूरी तरह तोड़कर अमूर्त सिद्धांतों के आधार पर नया समाज बनाने की कोशिश की. उनका मानना था कि राजनीतिक स्थिरता धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से आती है न कि अचानक टूट-फूट से.
मोदी सरकार के अधिकांश बड़े सुधार मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के भीतर ही किए गए हैं. बदलाव हुए हैं. लेकिन ये सब भारत की संवैधानिक संरचना के तहत ही हुए हैं. मोदी काल की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि पुराने संस्थानों को खत्म करने के बजाय उन्हें अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की गई.
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, जन धन योजना, उज्ज्वला योजना, डिजिटल पहचान और कल्याणकारी योजनाओं में सुधार इसी दिशा के उदाहरण हैं. कई नई योजनाएं आई हैं. साथ ही, कई पुरानी सरकारी योजनाओं को जारी रखा गया और केवल बदलाव के लिए बदलाव करने से बचा गया.
संविधान के मूल विचारों का संरक्षण
इस सरकार के दौरान संवैधानिक संशोधनों का उपयोग अपेक्षाकृत कम और आवश्यकता पड़ने पर ही किया गया. मोदी सरकार के दौरान लगभग सात संवैधानिक संशोधन पारित हुए. इनमें जीएसटी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडबल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा, राज्यों को ओबीसी सूची बनाने की शक्ति की बहाली, एससी/एसटी आरक्षित सीटों के संवैधानिक प्रावधान का 10 साल के लिए और विस्तार, विधानसभाओं और संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं.
ये बदलाव संविधान की मूल संरचना को बदले बिना किए गए हैं. इन्हें संस्थागत और नीतिगत सुधारों के रूप में देखा जा सकता है. इनमें ध्यान रखा गया है कि संविधान निर्माताओं के विचारों के साथ तारतम्य बना रहे. इसी तरह अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का उपयोग भी इस अवधि में अपेक्षाकृत संयम के साथ किया गया, जबकि पहले इस प्रावधान का अंधाधुंध इस्तेमाल कर राज्य सरकारों को गिराया जाता था.

नरेंद्र मोदी की सरकार में हुए अधिकांश बड़े सुधार मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के भीतर ही हुए हैं.
भविष्य की पीढ़ियों के संरक्षक के रूप में राज्य
बर्क के अनुसार राजनीतिक सत्ता एक अमानत है, जिसे शासकों को अगली पीढ़ी को सौंपना है. चूंकि समाज कई पीढ़ियों की साझेदारी है, इसलिए सरकारों को केवल अगले चुनाव के बारे में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बारे में भी सोचना चाहिए. मोदी के विकास संबंधी दृष्टिकोण में भी ऐसी ही सोच दिखाई देती है, जिसका लक्ष्य अगली पीढ़ी के लिए एक विकसित और मजबूत देश और उसका आधार तैयार करना है. बुनियादी ढांचे, स्वच्छता, डिजिटल कनेक्टिविटी, मैन्युफैक्चरिंग, अक्षय ऊर्जा और दीर्घकालिक आर्थिक आधुनिकीकरण से जुड़ी योजनाओं को केवल आज के लाभ के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के भारत में निवेश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.'विकसित भारत 2047' इसी सोच का व्यापक रूप है. बर्क की तरह यहां भी यह विचार दिखाई देता है कि वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर विरासत छोड़कर जाए.
वैचारिक कट्टरता का निषेध
बर्क को कट्टर वैचारिक प्रणालियों पर भरोसा नहीं था. उनका मानना था कि समाज और राजनीति इतनी जटिल है कि उन्हें केवल सिद्धांतों और नारों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता. राजनीतिक फैसले अनुभव, परिस्थितियों और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता के आधार पर होने चाहिए. मोदी सरकार में भी अक्सर ऐसा दृष्टिकोण दिखाई देता है. हालांकि उनकी राजनीति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ी मानी जाती है, लेकिन नीतियों में कई अलग-अलग विचारधाराओं के तत्व दिखाई देते हैं. इनमें बाजार आधारित सुधार, लोक कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार, तकनीकी आधुनिकीकरण और सरकारी निकायों और निगमों को सशक्त बनाना शामिल हैं.
कई बार एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देने वाले इन दृष्टिकोण को साथ लेकर चलना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि शासन में व्यावहारिकता को वैचारिक जिद और कट्टरता से अधिक महत्व दिया गया है.
(डिस्क्लेमर: लेखक सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ सलाहकार हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )