- बिहार के पूस महीने में बगिया नामक पारंपरिक व्यंजन चावल और चने की दाल से घरों में बनाया और खाया जाता है.
- बगिया स्थानीय लोक संस्कृति का प्रतीक है जो सगे संबंधियों को संदेश या सौगात के रूप में भेजा जाता है.
- यह व्यंजन पोषण से भरपूर होता है क्योंकि इसमें कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का संतुलित मेल शामिल होता है.
पूस का महीना आते ही बिहार में ठंड के साथ-साथ परंपराओं की गरमाहट भी महसूस होने लगती है. खेतों में फसल कटाई की आहट, अलाव की धूनी और घर-घर बनने वाले मौसमी पकवान. इन सबके बीच जिस व्यंजन की खास चर्चा होती है, वह है 'बगिया'. चावल और चने की दाल से बनने वाला यह पारंपरिक बिहारी व्यंजन न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होता है, बल्कि इसकी जड़ें बिहार, खासकर कोसी सहित मिथिला की लोक संस्कृति में गहराई तक धंसी हुई हैं. यह बाजार के किसी रेस्टूरेंट में नहीं मिलता, बल्कि सिर्फ और सिर्फ घरों में पकाया और खाया जाता है.
सोंधी खुशबू के साथ भाप निकले तो, समझिए बन रहा है बगिया
पूस की ठिठुरन भरी सुबह या शाम में जब घर के आंगन से सोंधी-सोंधी खुशबू के साथ भाप उठती है और चूल्हे पर बगिया पकता है, तो पूरे माहौल में लोक जीवन की सादगी और अपनापन बिखेर देता है. यह केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि आपसी रिश्तों और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक भी है. यही वजह है कि पूस के महीने में सगे-संबंधियों को बगिया भेजने की परंपरा आज भी निभाई जाती है. कई परिवार इसे संदेश या सौगात के रूप में दूर बसे रिश्तेदारों तक पहुंचाते हैं. यह संदेश महंगी से महंगी मिठाई और फलों को काफी पीछे छोड़ देता है.

पोषण और परंपरा का है संगम
बगिया चावल और चने की दाल से बनता है. इसलिए इसमें कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन दोनों का संतुलित मेल मिलता है. चूंकि दाल में नमक के साथ कुछ मशाले भी डले होते हैं, जिससे इसका स्वाद तो दोगुना हो ही जाता है और ठंड के मौसम में यह शरीर को ऊर्जा देने के साथ आसानी से पचने वाला भोजन भी साबित होता है. ग्रामीण इलाकों में इसे सुबह, दोपहर या रात के भोजन के रूप में परोसा जाता है. वहीं, शहरों में यह अब त्योहारनुमा व्यंजन का रूप ले चुका है.
बगिया की होती है कई वेरायटीज
मिथिला के इस विशेष व्यंजन की कई किस्में प्रचलन में हैं. सबसे सामान्य बगिया चावल और चने की दाल से तैयार होता है. इसके अलावा इसमें तीसी (अलसी) या पोस्ता दाना मिलाकर नमकीन बगिया बनाया जाता है, जिसकी खुशबू और स्वाद अलग ही पहचान रखती है. कुछ घरों में बगिया में शक्कर डालकर मीठा बगिया भी बनाया जाता है, जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को पसंद आता है. वहीं बिना नमक-शक्कर के सादा बगिया भी कई परिवारों की पहली पसंद है. हर वेरायटी का स्वाद और उसका अवसर अलग-अलग होता है.
ऐसे बनता है बगिया
बगिया बनाना कोई साधारण काम नहीं होता. बगिया बनाने की प्रक्रिया भी पारंपरिक और धैर्य भरी होती है. इसके लिए अरवा, उसना या खुद्दी किसी भी तरह के चावल को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाया जाता है. पूरी तरह सूख जाने के बाद चावल को घर की हाथ चक्की या मिल से पिसवाया जाता है. बगिया के इस आटे को हल्का नमक देकर गर्म पानी के साथ गूंथ लिया जाता है. इसी तरह चने की दाल को भी भिगोकर फुलाया जाता है. फिर इसे हरी मिर्च, लहसून की कली और अदरक के टूकड़े के साथ पीस लिया जाता है. पीसे हुए दाल में सेंधा नमक, हल्दी और धनिया पावडर मिलाकर इसे तैयार कर लिया जाता है. फिर चावल के गूंथे आटे की गोल-गोल लोई बनाकर उसके बीच दाल भरकर उसे विशेष आकार दिया जाता है. इधर, एक बर्तन में पानी को गर्म किया जाता है. पानी के खौलते ही उसमें तैयार बगिये को डालकर उबलने के लिए थोड़ी देर छोड़ दिया जाता है. थोड़ी ही देर में बगिया खाने के लिए तैयार हो जाता है.
टेस्टी और हेल्दी फुड है बगिया.
शक्कर या खोआ देकर बनाया गया मीठा बगिया तो वैसे ही टोमेटो साउस या नारियल की चटनी के साथ गर्म-गर्म खा लिया जाता है. लेकिन नमकीन बगिया को बाद में भी खाने का एक और तरीका है. दाल, पोस्ता दाना भरकर बनाया गया या फिर सादा बगिया पर मिर्च और लहसून का पेस्ट लगाकर उसे सरसों के तेल में सेंक लिया जाता है. फिर इसे टोमेटो साउस या फिर नारियल की चटनी के साथ खाया जाता है. यदि चटनी नहीं भी हो तो, फ्राई बगिया क्रंची, टेस्टी और हेल्दी फुड के रूप में खाया जाता है.

मिथिला की लोक संस्कृति में है बगिया
मिथिला की लोक संस्कृति में मौसमी पकवानों का खास महत्व है. जैसे मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा और तिलकुट, वैसे ही पूस के महीने में बगिया. लोकगीतों, घरेलू बातचीत और पर्व-त्योहारों में बगिया का जिक्र आम है. यह व्यंजन सामूहिकता का भी प्रतीक है, जहां महिलाएं मिलकर चावल सुखाती हैं, पीसने से लेकर पकाने तक का काम साझा होता है और अंत में पूरे परिवार के साथ बैठकर इसे खाया जाता है.
परंपरा से आधुनिकता तक...
समय के साथ रसोई में बदलाव आया है. लेकिन बगिया की परंपरा आज भी जीवित है. अब मिल से पिसा आटा और गैस चूल्हा भले इस्तेमाल होने लगा हो, लेकिन पूस आते ही बगिया का स्वाद और उसकी खुशबू लोगों को अपने गांव-घर की याद दिला देती है. कुल मिलाकर, बगिया सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि बिहार और मिथिला की लोक संस्कृति, पारिवारिक जुड़ाव और मौसम के साथ बदलते जीवन-रंगों की जीवंत पहचान है.
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