- बिहार में मुख्यमंत्री पद पर सबसे लंबे समय तक कुर्मी और भूमिहार जाति के नेताओं ने शासन किया है
- ब्राह्मण जाति से सबसे अधिक संख्या में मुख्यमंत्री बने, विशेषकर साठ से अस्सी के दशक में उनका राजनीतिक दबदबा रहा
- राजपूत जाति के चार मुख्यमंत्री हुए, पर उनके कार्यकाल कम होने के कारण कुल शासन समय सीमित रहा
बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री पद पर अलग-अलग जातियों का प्रतिनिधित्व समय के साथ बदलता रहा है. आजादी के बाद शुरुआती दशकों में सवर्ण जातियों का दबदबा रहा, लेकिन 1990 के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ पिछड़े और दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा. इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर किस जाति ने सबसे ज्यादा समय तक बिहार पर शासन किया. आंकड़ों के आधार पर यह साफ दिखता है कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग जातियों का प्रभाव रहा, लेकिन कुल समय जोड़ने पर कुछ जातियां लंबे समय तक सत्ता में बनी रहीं.
अगर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली जाति की बात करें, तो कुर्मी और भूमिहार जाति का नाम सबसे ऊपर आता है. कुर्मी समाज से आने वाले नीतीश कुमार ने करीब 19 साल 231 दिन तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया, जो बिहार के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल माना जाता है. वहीं भूमिहार समाज से आने वाले श्रीकृष्ण सिंह ने लगभग 17 साल 52 दिन तक मुख्यमंत्री पद संभाला. इन दोनों नेताओं के लंबे कार्यकाल की वजह से इन जातियों का कुल शासन समय सबसे अधिक दिखाई देता है. इसका मतलब यह है कि भले ही इन जातियों से मुख्यमंत्री कम बार बने हों, लेकिन उनका शासन लंबे समय तक चला, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव मजबूत बना रहा.
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मुख्यमंत्री पद पर सवर्ण जातियों का दबदबा
ब्राह्मण जाति की बात करें, तो इस समाज से सबसे ज्यादा संख्या में मुख्यमंत्री बने हैं. बिंदेश्वरी दूबे, विनोदानंद झा, केदार पांडेय, भागवत झा और जगन्नाथ मिश्रा जैसे कुल पांच ब्राह्मण नेता मुख्यमंत्री बने. अगर इनके सभी कार्यकाल को जोड़ दिया जाए, तो ब्राह्मण समाज का कुल शासन समय भी काफी बड़ा हो जाता है. खासकर 1960 से 1980 के दशक के बीच कांग्रेस के दौर में ब्राह्मण नेतृत्व का प्रभाव काफी मजबूत था. उस समय प्रशासन और संगठन दोनों में ब्राह्मण नेताओं की पकड़ देखी जाती थी, इसलिए उस दौर को ब्राह्मण नेतृत्व का समय भी कहा जाता है.
राजपूत समाज से भी बिहार में चार मुख्यमंत्री बने, जिनमें चंद्रशेखर सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, हरिहर सिंह और दीपनारायण सिंह शामिल हैं. हालांकि इन नेताओं का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, इसलिए कुल शासन समय ब्राह्मण या कुर्मी-भूमिहार समाज जितना नहीं हो पाया. फिर भी राजपूत समाज का राजनीतिक प्रभाव बिहार की राजनीति में लंबे समय तक बना रहा और कई महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका रही.
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90 के दशक के बाद आया बड़ा बदलाव
1990 के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब यादव समाज का प्रभाव तेजी से बढ़ा. लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने मिलकर करीब 14 साल से ज्यादा समय तक बिहार की सत्ता संभाली. इसके अलावा दरोगा प्रसाद राय और बीपी मंडल भी यादव समाज से मुख्यमंत्री बने. अगर कुल समय को जोड़ा जाए, तो यादव समाज का शासन काल भी काफी लंबा रहा है. यही वजह है कि 1990 से 2005 तक के दौर को सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्ग के उभार का समय माना जाता है, जिसमें यादव नेतृत्व का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखाई दिया.
दलित समाज की बात करें, तो इस वर्ग से भी बिहार में कई मुख्यमंत्री बने, जिनमें भोला पासवान शास्त्री, राम सुंदर दास और जीतन राम मांझी प्रमुख हैं. हालांकि इन नेताओं का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन इनकी नियुक्ति ने यह संकेत दिया कि बिहार की राजनीति में दलित समाज को भी प्रतिनिधित्व मिलने लगा है. इसी तरह कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता, जो नाई समाज से आते थे, उन्होंने पिछड़े वर्ग की राजनीति को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई. कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय की राजनीति का शुरुआती चेहरा भी माना जाता है.
अगर कुल मिलाकर समय के हिसाब से देखें, तो सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली जातियों में कुर्मी और भूमिहार समाज सबसे आगे दिखाई देते हैं, क्योंकि इन समाजों से आने वाले नेताओं का कार्यकाल बहुत लंबा रहा है. इसके बाद ब्राह्मण और यादव समाज का नाम आता है, जिन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद संभाला और लंबे समय तक सत्ता में रहे. इस पूरे आंकड़े से एक बात साफ होती है कि बिहार की राजनीति में समय-समय पर अलग-अलग जातियों का प्रभाव बढ़ता और घटता रहा है, लेकिन जिन नेताओं को लंबे समय तक शासन करने का मौका मिला, उनकी जाति का राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत दिखाई देता है.
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