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Success Story: क्लिनिक टूटा, लेकिन हौसला नहीं... हिंदी बनी सबसे बड़ी चुनौती; डॉ बिजेता अब बनीं रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर

हाजीपुर की रहने वाली डॉ बिजेता ने 70वीं बीपीएससी की संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में1719 वीं रैंक लाकर पहले ही प्रयास में सफलता हासिल की. उनका चयन रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर हुआ है. तैयारी के दौरान डॉ बिजेता के जीवन में कई चुनौतियां आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.

Success Story: क्लिनिक टूटा, लेकिन हौसला नहीं... हिंदी बनी सबसे बड़ी चुनौती; डॉ बिजेता अब बनीं रूरल डेवलपमेंट ऑफिसर
Success Story: क्लिनिक टूटने के बाद भी नहीं टूटीं डॉ. बिजेता, BPSC पास कर बनीं अफसर (फोटो क्रेडिट-insta/BDO Dr. Bijeta)

Dr Bijeta Kumari Success Story: अगर इरादे मजबूत हों, तो मुश्किल परिस्थितियां भी सपनों की राह नहीं रोक सकतीं. इसका जीता-जागता उदाहरण हैं डॉ. बिजेता कुमारी (Dr Bijeta Kumari), जिन्होंने तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए बीपीएससी परीक्षा (BPSC) में सफलता हासिल की और अधिकारी (Rural Development Officer) बनने का अपना सपना पूरा किया. एक समय ऐसा भी आया जब डेंटल क्लिनिक बनाने का सपना टूट गया, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा... हिंदी भाषा भी डॉ. बिजेता के लिए बड़ी चुनौती थी, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार लगातार मेहनत के दम पर सफलता हासिल कर ली.

डेंटिस्ट से RDO तक का सफर

डॉ. बिजेता ने बीपीएससी की 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में 1719वीं रैंक हासिल कर ग्रामीण विकास पदाधिकारी (RDO) का पद प्राप्त किया. एक डॉक्टर से सिविल सेवक बनने तक का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायक मिसाल है.

मेघालय में पली-बढ़ीं डॉ. बिजेता ने डेंटिस्ट के रूप में सेवाएं देने के साथ-साथ नौकरी भी की, लेकिन उनका सपना सिविल सेवा में जाना था. उन्होंने कठिन परिश्रम, धैर्य और समर्पण के दम पर आखिरकार अपने इस सपने को साकार कर दिखाया.

इंटर्नशिप के दौरान जगा अफसर बनने का सपना

डॉ. बिजेता कुमारी बिहार के हाजीपुर की रहने वाली है. हालांकि उनकी परवरिश मेघालय में हुई. दरअसल, पिता मेघालय पुलिस में कार्यरत हैं, इसलिए उनका पूरा परिवार मेघालय में रहता है. वहीं उनकी मां गृहिणी हैं. बिजेता ने स्कूली शिक्षा और 12वीं तक की पढ़ाई शिलांग से पूरी की. इसके बाद उन्होंने वर्ष 2021 में मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी से डेंटल साइंस में स्नातक की डिग्री हासिल की. सिविल सेवा के बारे में उन्हें पहली बार इंटर्नशिप के दौरान जानकारी मिली. तभी उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना पनपा. ग्रेजुएशन के बाद वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने लगभग एक वर्ष तक एसोसिएट डेंटिस्ट के रूप में काम किया. इसके बाद वो अमेरिकी हेल्थकेयर सेक्टर से जुड़ गईं. हालांकि साल 2024 में नौकरी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने पूरी तरह बीपीएससी की तैयारी में जुट गई.

नहीं आती थी हिंदी

डेंटल पृष्ठभूमि और साइंस विषय से आने के कारण इतिहास, भूगोल और भारतीय राजव्यवस्था जैसे विषय उनके लिए बिल्कुल नए थे. ऐसे में तैयारी का सफर आसान नहीं था. इसके अलावा हिंदी भाषा भी उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई. प्रीलिम्स के बाद उन्होंने हिंदी सीखना शुरू किया क्योंकि मेंस परीक्षा में सामान्य हिंदी का पेपर पास करना अनिवार्य है. उन्होंने अक्षरों से शुरुआत की और धीरे-धीरे सामान्य हिंदी की तैयारी करते हुए इस चुनौती को पार किया.

क्लिनिक टूटने के बाद भी नहीं टूटीं डॉ. बिजेता

मुख्य परीक्षा के परिणाम में देरी होते देख उन्होंने अपना डेंटल क्लिनिक शुरू करने का फैसला किया. क्लीनिक का लगभग 90% काम पूरा हो चुका था, तभी अचानक इमारत गिर गई. इस हादसे में उनकी महीनों की मेहनत, प्लानिंग और निवेश एक झटके में खत्म हो गया. इस घटना ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया, जिसके बाद वो अपने माता-पिता के पास मेघायल लौट गई.

संघर्षों को मात देकर जीती BPSC की जंग

जब वह मेघालय में थीं, तभी बीपीएससी मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ. चयनित अभ्यर्थियों की सूची में उनका नाम भी शामिल था. उन्होंने इंटरव्यू के लिए पूरी मेहनत और समर्पण के साथ तैयारी की. इस दौरान उन्होंने अपनी पूरी जान लगा दी, कोई कसर नहीं छोड़ी. नतीजा सबके सामने है, आज वो बीपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल कर ग्रामीण विकास पदाधिकारी (RDO) बन गईं.

डॉ. बिजेता की कहानी यह सिखाती है कि जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, यदि हौसला बुलंद हो और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो सफलता जरूर मिलती है. 

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