भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में दर्ज केस में SDPO राजेश शर्मा को आरोपी बनाया गया है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 19 साल पहले मुजफ्फरपुर में हुए एक एनकाउंटर के लिए सुर्खियों में आए राजेश पर उस वक्त भी गंभीर आरोप लगाए गए थे. राजेश शर्मा ने तीन लोगों का एनकाउंटर कर दिया था. हालांकि इस मामले में भी राजेश शर्मा द्वारा आत्मरक्षा का तर्क दिया था. जिसके बाद जांच में राजेश शर्मा को क्लीन चिट दे दिया गया था. हालांकि इस बार मामला थोड़ा अलग है. आज भरत तिवारी के सरेंडर का वीडियो भी सामने है और एनकाउंटर से पहले के कई सबूत सामने आए हैं. मामले में अब जांच भी शुरू हो गई है. लेकिन दूसरी ओर 19 साल पहले जिस मां के बेटे का एनकाउंटर हुआ था वह आज भी कह रही उन्हें न्याय नहीं मिला. साथ ही मानवाधिकार आयोग ने भी इसे फर्जी एनकाउंटर करार दिया था.
दरअसल यह पुराना मामला मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा थाना क्षेत्र के MIT कॉलेज के समीप का है. जहां 4 नवंबर 2007 की सुबह 4 बजे पुलिस से हुई मुठभेड़ में तीन युवकों की मौत हो गई थी. इसमें सदर थाना क्षेत्र के लहलादपुर पताही निवासी मुकुल ठाकुर, काजी मोहम्मदपुर निवासी मनीष शर्मा और शिवहर जिले के धनकौल सुबोध कुमार सिंह की मौत हो गई थी. हालांकि यह मामला भी पूरी तरह संदिग्ध था.
वाहन चेकिंग के दौरान एनकाउंटर
पुलिस के मुताबिक उस समय वाहन जांच के दौरान गाड़ी को रोकने पर तीन युवकों ने गोली से फायरिंग की थी. पुलिस का दावा था कि युवकों ने 22 राउंड फायरिंग की थी. इसके बाद आत्मरक्षा में गोली चलाकर तीन युवकों को मौत के घाट उतार दिया गया. पूरे मामले को मानवाधिकार आयोग द्वारा भी फर्जी एनकाउंटर बताया था. मनीष कुमार की मां ने भी बेटे के फर्जी एनकाउंटर का गंभीर आरोप लगाया था.
DIG ने मामले की जांच CID से कराने की थी अनुशंसा
बवाल बढ़ने के बाद पूरी घटना को लेकर DIG अरविंद पांडे ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की अनुशंसा की थी. वहीं जांच रिपोर्ट में सभी पुलिस कर्मी को क्लीन चिट दे दी गई. लेकिन मानवाधिकार आयोग ने इस जांच रिपोर्ट पर असंतोष जताया था.
क्योंकि पुलिस अधिकारी और पुलिस वाहन के ड्राइवर के बयान में विरोधाभास था. जहां एक तरफ एनकाउंटर में शामिल पुलिस कर्मी ने बताया था कि वाहन जांच के दौरान वहां रोके जाने पर युवक ने पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग की थी. जबकि पुलिस वाहन के चालक द्वारा बताया गया था कि पुलिस ने पीछा कर युवक पर गोली चलाया था. इसके साथ ही रिपोर्ट में युवकों के फिंगरप्रिंट और हैंड वॉश का सबूत नहीं मिला था.
मानवाधिकार आयोग इस पूरे एनकाउंटर को फर्जी करार दिया था और तत्कालीन सदर थानेदार राजेश कुमार शर्मा सहित अन्य पुलिसकर्मियों को सभी मृतक के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये मुआवजे की राशि देने का निर्देश दिया था.
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