- नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के जदयू में शामिल होने की खबर बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू कर चुकी है
- निशांत कुमार के राजनीति में आने से बिहार के प्रमुख राजनीतिक परिवारों में उनका परिवार भी सक्रिय होगा
- तेजस्वी यादव और चिराग पासवान पहले से ही बिहार की राजनीति में अपनी विरासत और अनुभव के साथ सक्रिय हैं
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के रविवार को जदयू ज्वाइन करने की खबर ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है. अगर ऐसा होता है तो यह पहली बार होगा जब नीतीश कुमार के परिवार का कोई सदस्य सीधे सक्रिय राजनीति में आएगा. लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि क्या निशांत कुमार कभी राजनीति में कदम रखेंगे. अब वह समय आ गया है.बिहार की राजनीति में पहले से कई बड़े राजनीतिक परिवार सक्रिय रहे हैं. लालू प्रसाद यादव के परिवार से तेजस्वी यादव,तेज प्रताप यादव और मीसा भारती राजनीति में सक्रिय हैं.इसी तरह रामविलास पासवान के बाद उनके बेटे चिराग पासवान भी राजनीति में बड़ा चेहरा बन चुके हैं.अगर निशांत कुमार भी राजनीति में आते हैं, तो बिहार में लालू यादव और रामविलास पासवान के बाद नीतीश कुमार के परिवार की भी सीधी राजनीतिक मौजूदगी हो जाएगी.
अगर चिराग पासवान, तेजस्वी यादव और निशांत कुमार की तुलना की जाए तो तीनों की राजनीतिक यात्रा, अनुभव और विरासत अलग-अलग दिखाई देती है. तेजस्वी यादव काफी समय से सक्रिय राजनीति में हैं. वे 2015 में पहली बार विधायक बने और बिहार के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. अभी वे राज्य में विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे माने जाते हैं. उनकी राजनीतिक ताकत उनके पिता लालू प्रसाद यादव की विरासत से जुड़ी है, जिन्होंने लंबे समय तक पिछड़े वर्ग और सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत किया. हालांकि तेजस्वी यादव के सामने अपने पिता के दौर से जुड़ी विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों की राजनीतिक छाया भी रहती है, जिसे विपक्ष अक्सर मुद्दा बनाता है. इसके बावजूद उन्होंने अपने तरीके से युवा नेता के रूप में अलग पहचान बनाने की कोशिश की है.
इसके मुकाबले निशांत कुमार की स्थिति अलग है. वे अब तक राजनीति से दूर रहे हैं और सार्वजनिक जीवन में भी कम ही दिखाई देते हैं. उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनके पिता नीतीश कुमार की छवि है, जो बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे और विकास तथा सुशासन की राजनीति के लिए जाने जाते हैं. लेकिन निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे बिना किसी राजनीतिक अनुभव के इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं और क्या वे अपनी अलग पहचान बना पाते हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव बिहार की राजनीति में एक पीढ़ी परिवर्तन का संकेत भी है. जयप्रकाश आंदोलन से निकले नेताओं में नीतीश कुमार, लालू यादव और रामविलास पासवान लंबे समय तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे. अब धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक विरासत अगली पीढ़ी के नेताओं के हाथों में जाती दिखाई दे रही है.तेजस्वी यादव और चिराग पासवान पहले से ही इस नई पीढ़ी के प्रमुख चेहरे बन चुके हैं. अगर निशांत कुमार भी राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो यह साफ संकेत होगा कि बिहार की राजनीति में नेतृत्व का नया दौर शुरू हो रहा है.
आने वाले वर्षों में राज्य की राजनीति में प्रतिस्पर्धा भी इन नई पीढ़ी के नेताओं के बीच ही देखने को मिल सकती है.कुल मिलाकर निशांत कुमार की संभावित एंट्री सिर्फ एक व्यक्ति का राजनीति में आना नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में नेतृत्व के बदलाव का संकेत भी है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे राजनीति में कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं और क्या वे चिराग पासवान और तेजस्वी यादव की तरह अपनी अलग राजनीतिक पहचान बना पाते हैं.
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