बिहार के मुंगेर जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक युवक के शव को अस्पताल से गांव तक ले जाने के लिए परिजनों को घंटों संघर्ष करना पड़ा. आरोप है कि पोस्टमार्टम के बाद सरकारी शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया, जबकि परिजन लगातार अधिकारियों और अस्पताल प्रबंधन से गुहार लगाते रहे. आखिरकार मजबूरी में परिवार ने किराये का ई-रिक्शा किया और शव को उसी में रस्सियों से बांधकर करीब 30 किलोमीटर दूर गांव ले गए. घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं. NDTV के लिए मुंगेर से मिथुन कुमार की रिपोर्ट.
सड़क हादसे में तीन युवकों की हुई थी मौत
जानकारी के अनुसार बरियारपुर-हवेली खड़गपुर एनएच-333 पर बुधवार देर शाम दो तेज रफ्तार बाइकों की आमने-सामने टक्कर हो गई थी. हादसा इतना भीषण था कि धपड़ी गांव निवासी बिट्टू कुमार और सूरज कुमार की मौके पर ही मौत हो गई. वहीं हादसे में गंभीर रूप से घायल बरियारपुर थाना क्षेत्र के कल्याणपुर निवासी पिंटू कुमार को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उपचार के दौरान उनकी भी मौत हो गई. पिंटू कुमार अपने पीछे पत्नी सुलेखा देवी और छह छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं. उनकी मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.

Bihar Health System: मृतक के परिजनों ने किया शव वाहन का घंटों इंतजार
पोस्टमार्टम के बाद शव ले जाने की शुरू हुई जद्दोजहद
पिंटू कुमार के शव का पोस्टमार्टम कराए जाने के बाद परिजनों ने शव को गांव ले जाने के लिए सरकारी शव वाहन की मांग की. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे निजी वाहन का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं थे. परिजनों ने 102 एंबुलेंस सेवा से संपर्क किया. उन्हें आश्वासन दिया गया कि जल्द ही वाहन उपलब्ध कराया जाएगा. लेकिन सुबह करीब 8 बजे से लेकर दोपहर 1 बजे तक इंतजार करने के बावजूद कोई शव वाहन नहीं पहुंचा. इस दौरान परिवार के लोगों ने कई बार सदर अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया. परिजनों का आरोप है कि हर बार यही कहा गया कि वाहन दूसरे स्थान पर गया है और वापस लौटते ही भेज दिया जाएगा.
मजबूरी में किराये पर किया ई-रिक्शा
लगातार इंतजार और निराशा के बाद परिजनों ने शव को गांव ले जाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने का फैसला किया. काफी प्रयास के बाद उन्हें 1500 रुपये में एक निजी ई-रिक्शा मिला. बताया गया कि चालक शुरुआत में शव ले जाने के लिए तैयार नहीं था. बाद में पोस्टमार्टम से जुड़े दस्तावेज और परिवार की मजबूरी देखकर वह मान गया. इसके बाद शव को ई-रिक्शा की बीच वाली सीट पर रखा गया और रास्ते में गिरने से बचाने के लिए मोटी रस्सियों से तीन अलग-अलग स्थानों पर बांधा गया. शव के साथ परिवार के कई सदस्य भी उसी वाहन में बैठकर गांव के लिए रवाना हुए.
30 किलोमीटर का कठिन सफर
कल्याणपुर गांव तक पहुंचने के लिए परिवार को करीब 30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी. रास्ते में कई स्थानों पर जाम मिलने के कारण चालक को वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ा. पूरे सफर के दौरान शव ई-रिक्शा में रस्सियों से बंधा रहा. यह दृश्य जहां-जहां लोगों ने देखा, वहां लोग हैरान रह गए. कई राहगीरों ने इस घटना का वीडियो बनाया, जो बाद में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया.
परिजनों ने लगाए गंभीर आरोप
मृतक के भाई संजय दास ने स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि गरीबों के लिए चलाई जा रही सरकारी शव वाहन सेवा पूरी तरह विफल साबित हुई. उन्होंने कहा कि परिवार लगातार पांच घंटे तक अधिकारियों से मदद मांगता रहा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. यदि समय पर शव वाहन उपलब्ध करा दिया जाता तो उन्हें शव को ई-रिक्शा में बांधकर ले जाने जैसी पीड़ादायक और अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता. परिजनों का आरोप है कि सरकारी व्यवस्था की लापरवाही ने उनके दुख को और बढ़ा दिया.
प्रशासन ने जांच का दिया आश्वासन
घटना का वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग भी सक्रिय हुआ है. सिविल सर्जन डॉ. राजू ने कहा कि उन्हें मामले की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली है. उन्होंने बताया कि यदि पीड़ित परिवार लिखित शिकायत देता है तो पूरे मामले की जांच कराई जाएगी. साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि आखिर किन परिस्थितियों में शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया जा सका. सिविल सर्जन ने कहा कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद जिम्मेदारी तय की जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.
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