- बिहार में सरकारी नौकरी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमुख पैमाना मानी जाती है.
- 67वीं BPSC परीक्षा में लाखों उम्मीदवार शामिल हुए और सरकारी नौकरियों की मांग लगातार अत्यधिक बनी हुई है.
- बिहार में युवा श्रम बल भागीदारी राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और रोजगार बाजार से दूरी बनी हुई है.
बिहार में अगर आप मुख्यमंत्री भी बन जाएं, तब भी अगर आपके पास 'सरकारी नौकरी' नहीं है, तो आपकी कामयाबी अधूरी मानी जा सकती है, यह कोई कहानी नहीं, बल्कि 1990 की वह हकीकत है जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पहली बार CM बनकर अपने गांव पहुंचे. लालू प्रसाद यादव जब 1990 में पहली बार CM बनकर अपने गांव पहुंचे, तब उन्होंने अपनी मां मरछिया देवी से कहा- माई हम मुख्यमंत्री बन गइल. इस पर मां ने तपाक से कहा था- 'अच्छा ठीक बा जाय दअ, लेकिन तोहरा के सरकारी नोकरी ना मिलल.' कामयाबी का एक ही पैमाना सरकारी नौकरी आखिर कहां से आया. बिहार में क्यों इतनी बेरोजगारी दिखती है और इसकी असल वजहें क्या हैं. इस स्टोरी में आंकड़ों के साथ इसकी पड़ताल की गई है.
BPSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर लगातार हो रहे प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि राज्य के युवाओं के बीच सरकारी नौकरी का आकर्षण कितना मजबूत है. हाल के वर्षों में हर भर्ती परीक्षा में लाखों उम्मीदवार शामिल हुए हैं. 67वीं BPSC में 802 पदों के लिए करीब 4.8 लाख अभ्यर्थी परीक्षा में बैठे, जबकि 71वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में 1,298 पदों के लिए 3.2 लाख उम्मीदवार शामिल हुए. इससे साफ है कि सरकारी नौकरियों की मांग लगातार बहुत अधिक बनी हुई है.

सिर्फ बेरोजगारी नहीं, श्रम बाजार से दूरी भी बड़ी समस्या
बिहार की रोजगार चुनौती को केवल बेरोजगारी के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता. पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के अनुसार, 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर 12.1 प्रतिशत रही. लेकिन इससे भी ज्यादा अहम आंकड़ा लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) का है, जो बताता है कि कितने युवा नौकरी कर रहे हैं या नौकरी की तलाश में हैं.
राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है बिहार
2025 में बिहार के केवल 34.3 प्रतिशत युवा श्रम बल का हिस्सा थे, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 46 प्रतिशत रहा. यानी बिहार राष्ट्रीय औसत से 11.7 प्रतिशत अंक पीछे है. इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में युवा न तो रोजगार में हैं और न ही सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रहे हैं.
पिछले वर्षों में सुधार हुआ, लेकिन चुनौती बरकरार
बिहार का युवा LFPR 2017-18 में 24.4 प्रतिशत था, जो 2023-24 में बढ़कर 34.6 प्रतिशत तक पहुंचा. हालांकि 2025 में यह मामूली गिरावट के साथ 34.3 प्रतिशत रहा. आंकड़े बताते हैं कि स्थिति में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में युवा रोजगार बाजार से बाहर हैं.

सरकारी नौकरी क्यों बन रही पहली पसंद?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी नौकरी युवाओं को स्थिर आय, सामाजिक सुरक्षा, पद की प्रतिष्ठा और लंबी अवधि के करियर का भरोसा देती है. दूसरी ओर निजी क्षेत्र में सीमित अवसर, कम वेतन और नौकरी की अनिश्चितता के कारण बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी को ही बेहतर विकल्प मानते हैं. यही वजह है कि रिक्तियां बढ़ने के बावजूद सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कमजोर नहीं पड़ रही है.
बिहार के लिए सबसे बड़ा सवाल
बिहार के सामने असली चुनौती सिर्फ बेरोजगारी कम करना नहीं, बल्कि युवाओं को व्यापक रोजगार बाजार से जोड़ना है. जब तक निजी क्षेत्र में पर्याप्त और भरोसेमंद अवसर नहीं बढ़ेंगे, तब तक लाखों युवा सरकारी नौकरी को ही करियर का सबसे सुरक्षित रास्ता मानते रहेंगे.
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