बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सरकार के भीतर मतभेद सामने आए हैं. इस बार सवाल शराबबंदी कानून को खत्म करने का नहीं, बल्कि इसे लागू करने के तरीके और जिम्मेदारी तय करने का है. उत्पाद एवं मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने शराब कंपनियों को भेजे गए नोटिस वापस लेने के विभागीय फैसले पर नाराजगी जताई है.. उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से इसकी शिकायत करते हुए अधिकारियों के फैसले को गलत बताया है. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर शराबबंदी की नीति और उसके असर को लेकर बहस तेज कर दी है.
विवाद दस शराब कंपनियों को भेजे गए नोटिस से शुरू हुआ. इन कंपनियों की शराब बिहार में पकड़ी गई थी. मंत्री के निर्देश पर विभाग ने कंपनियों से जवाब मांगा था कि उनकी शराब दूसरे राज्यों से बिहार कैसे पहुंच रही है. साथ ही यह चेतावनी भी दी गई थी कि जांच में भूमिका सामने आने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकती है.
मदन सहनी का कहना है कि कंपनियों को नोटिस भेजने का फैसला विभागीय अधिकारियों से बातचीत के बाद लिया गया था. लेकिन बाद में विभागीय समीक्षा के दौरान सचिव और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए. अधिकारियों का तर्क था कि कंपनियों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगी. इसके बाद नोटिस वापस लेने का फैसला हुआ. मंत्री इसी फैसले से नाराज हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री से शिकायत की है.
मदन सहनी का सवाल है कि शराबबंदी के मामलों में छोटे तस्करों और शराब बेचने वालों पर तो कार्रवाई होती है, लेकिन जिन कंपनियों की शराब बिहार में पकड़ी जाती है, उनकी जवाबदेही क्यों नहीं तय होती? उनका मानना है कि शराब की आपूर्ति करने वाली कंपनियों से भी जवाब मांगा जाना चाहिए. अगस्त 2026 में भी उन्होंने कहा था कि बिहार में किसी कंपनी की शराब पकड़े जाने पर निर्माता कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. अब उसी दिशा में उठाए गए कदम को वापस लेने से विभाग के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं.
इस विवाद को बिहार में शराबबंदी की पृष्ठभूमि में देखना भी जरूरी है. नीतीश कुमार सरकार ने अप्रैल 2016 में राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी. इसे महिलाओं की मांग और सामाजिक बदलाव से जोड़कर पेश किया गया था. सरकार का तर्क था कि शराब की वजह से गरीब परिवारों की कमाई बर्बाद होती है और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएं बढ़ती हैं. शराबबंदी से परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और महिलाओं को राहत मिलेगी. यही वजह है कि शराबबंदी नीतीश कुमार की राजनीति और उनकी सरकार की बड़ी पहचान बन गई.
लेकिन करीब दस साल बाद भी शराबबंदी को पूरी तरह लागू करना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है. दूसरे राज्यों से शराब की तस्करी, गांवों तक अवैध शराब की पहुंच, जहरीली शराब से मौत और पुलिस तथा उत्पाद विभाग की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. कई बार यह आरोप भी लगा कि शराब के अवैध कारोबार में स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों को संरक्षण मिलता है. ऐसे में सवाल उठता रहा है कि केवल शराब पीने और बेचने वालों को पकड़ने से इस कारोबार पर लगाम कैसे लगेगी.
राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा संवेदनशील है. जेडीयू के लिए शराबबंदी नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत से जुड़ी है. दूसरी ओर, एनडीए के भीतर से भी समय-समय पर इस कानून की समीक्षा की मांग उठती रही है. केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने शराबबंदी के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठाए थे और इसमें बदलाव की जरूरत बताई थी. हालांकि मदन सहनी ने सितंबर में साफ कहा था कि शराबबंदी खत्म करने या कानून में बदलाव का कोई प्रस्ताव नहीं है. फिलहाल विवाद का केंद्र यह है कि शराब की तस्करी रोकने में कंपनियों की भूमिका और अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय हो. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने अब मंत्री की शिकायत और अधिकारियों की कानूनी दलीलों के बीच रास्ता निकालने की चुनौती है. सम्राट सरकार का अगला कदम बताएगा कि वह शराबबंदी को केवल सख्ती से चलाना चाहती है या इसके कामकाज की भी समीक्षा करने जा रही है.
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