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NDA के लिए बिहार विधान परिषद चुनाव बड़ी चुनौती, ताकत-हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा

बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर पटना से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है. जेडीयू अपने संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन कर रही है, जबकि बीजेपी ने भी संभावित नामों की सूची केंद्रीय नेतृत्व को भेज दी है.

NDA के लिए बिहार विधान परिषद चुनाव बड़ी चुनौती, ताकत-हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा
बिहार विधान परिषद चुनाव
  • बिहार विधान परिषद चुनाव में NDA में सीट बंटवारे को लेकर सबसे बड़ी चुनौती है
  • निशांत कुमार और दीपक प्रकाश को विधान परिषद सदस्य बनाने की संभावना
  • जीतन राम मांझी महादलित समाज से विधान परिषद में सीट की मांग कर रहे हैं
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Bihar News:

बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. पटना से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर चल रहा है. जेडीयू अपने संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन कर रही है, जबकि बीजेपी ने भी संभावित नामों की सूची केंद्रीय नेतृत्व को भेज दी है. लेकिन इस बार चुनाव सिर्फ विधान परिषद की सीटों तक सीमित नहीं है. इसके जरिए NDA के अंदर ताकत, हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा होने वाली है. सबसे ज्यादा चर्चा स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है. दोनों मंत्री फिलहाल विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. 

संविधान के मुताबिक मंत्री बनने के बाद तय समय के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है. ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों नेताओं को विधान परिषद के रास्ते सदन भेजा जा सकता है. हालांकि अंतिम फैसला अभी होना बाकी है. अगर दोनों को टिकट मिलता है तो कई दूसरे दावेदारों की उम्मीदों पर असर पड़ सकता है.

मांझी ने मांगी एक सीट

असल चुनौती NDA के सहयोगी दलों की मांगों को लेकर है. HAM प्रमुख जीतन राम मांझी पहले ही एक सीट की मांग कर चुके हैं. मांझी का कहना है कि महादलित समाज में उनकी मजबूत पकड़ है और NDA को इसका राजनीतिक लाभ मिलता है. इसलिए उनकी पार्टी को विधान परिषद में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. मांझी पिछले कुछ दिनों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं और खुलकर अपनी दावेदारी जता रहे हैं.

चिराग और कुशवाहा भी चाहते हैं हिस्सेदारी

दूसरी तरफ चिराग पासवान की पार्टी भी अपनी हिस्सेदारी चाहती है. लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद चिराग का राजनीतिक कद बढ़ा है. उनकी पार्टी चाहती है कि विधान परिषद चुनाव में भी उसे सम्मानजनक हिस्सेदारी मिले. चिराग भले सार्वजनिक तौर पर ज्यादा दबाव नहीं बना रहे हों, लेकिन NDA के अंदर उनकी दावेदारी को गंभीरता से देखा जा रहा है. राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी अपनी पार्टी के लिए प्रतिनिधित्व चाहते हैं. उनका मानना है कि पिछड़ा वर्ग, खासकर कुशवाहा समाज में उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत है. ऐसे में वे भी NDA में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

यहीं से NDA की मुश्किलें बढ़ जाती हैं. सीटें सीमित हैं, लेकिन दावेदारों की संख्या लगातार बढ़ रही है. जेडीयू अपने नेताओं को एडजस्ट करना चाहती है. बीजेपी के अंदर भी कई नेता टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं. ऐसे में सहयोगी दलों की मांग पूरी करना आसान नहीं माना जा रहा.

राजनीतिक ताकत दिखाने का मौका

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल विधान परिषद चुनाव नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव से पहले की राजनीतिक तैयारी भी है. सभी सहयोगी दल अभी से अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं ताकि विधानसभा सीटों के बंटवारे के समय उनकी स्थिति मजबूत रहे. इसलिए विधान परिषद चुनाव को छोटे दल अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के मौके के रूप में देख रहे हैं.

सबसे दिलचस्प सवाल जीतन राम मांझी को लेकर है. राज्यसभा चुनाव के समय भी मांझी की नाराजगी और दावेदारी चर्चा में रही थी. उस समय उन्हें मनाने की कोशिश हुई थी, लेकिन उनकी सभी राजनीतिक अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकी थीं.

अब एक बार फिर वही सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार उन्हें वास्तव में विधान परिषद की सीट मिलेगी या फिर उन्हें केवल आश्वासनों के सहारे शांत करने की कोशिश होगी.

नाराजगी की बड़ी चुनौती

बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किसी एक सहयोगी दल को ज्यादा महत्व देने पर दूसरा दल नाराज हो सकता है. अगर मांझी को सीट मिलती है तो चिराग और कुशवाहा की दावेदारी भी मजबूत होगी. अगर चिराग को ज्यादा महत्व मिलता है तो दूसरे सहयोगी दल असहज हो सकते हैं. इसलिए बीजेपी और जेडीयू दोनों बहुत सोच-समझकर फैसला लेना चाहती हैं.

सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में इसी मुद्दे पर लगातार चर्चा हो रही है. NDA नेतृत्व चाहता है कि विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन पूरी तरह एकजुट दिखाई दे. किसी भी तरह का असंतोष या नाराजगी विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे सकती है. इसलिए सीटों का फैसला केवल राजनीतिक गणित नहीं, बल्कि सामाजिक और चुनावी समीकरण को ध्यान में रखकर किया जाएगा.

फिलहाल इतना साफ है कि विधान परिषद चुनाव NDA के लिए विपक्ष से ज्यादा अपनी अंदरूनी राजनीति की परीक्षा बन गया है. निशांत कुमार और दीपक प्रकाश का भविष्य, मांझी और चिराग की दावेदारी, जेडीयू और बीजेपी का तालमेल और सहयोगियों की नाराजगी—इन सभी सवालों के जवाब अगले कुछ दिनों में सामने आएंगे. लेकिन इतना तय है कि इस बार की लड़ाई केवल सीटों की नहीं, बल्कि सम्मान, हिस्सेदारी और राजनीतिक ताकत की भी है.

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