- बिहार कई तरह की मिठाई और पकवानों के लिए मशहूर है
- बिहार के गया जी में 1 किलो वाले रसगुल्ले की है मशहूर दुकान
- इस रसगुल्ले का नाम 'गलाफाड़ रसगुल्ला' है, मशहूर हैं चर्चे
अगर आपसे पूछा जाए कि आपने कितना बड़ा रसगुल्ला देखा या फिर खाया है? आप सोचेंगे और फिर कुछ कहेंगे. लेकिन तिलकुट के लिए मशहूर बिहार के गया जी जिले में किलो-किलो भर का रसगुल्ला मिलता है. चौंक गए न आप? पहले हमें भी यकीन नहीं हुआ था. पर जब आंखों से देखा तो यकीन करना ही पड़ा. तिलकुट के लिए मशहूर गया जी में इतना बड़ा रसगुल्ला बनाने का आइडिया आखिर आया कहां से? इसके लिए हमने सीधे दुकानदार से पूछा. तो फिर पंडित जी के दुकान की पूरी कहानी सामने आई.

गलाफाड़ रसगुल्ला की तैयारी करते दुकान के कारीगर
तो जानिए 1 किलो वाले रसगुल्ले की कहानी
तो इस दुकान की कहानी शुरू हुई 1969 में. स्वर्गीय रामचंद्र मिश्र ने इसकी शुरुआत की थी. रामचंद्र मिश्र को किस्मत इस दुकान की तरफ ले आई. अगर सब ठीक रहता तो वो रेलवे में काम कर रहे होते. रेलवे की कैंटीन में वो 11 साल तक कैजुअल कर्मी के तौर खाना बनाना सीखा. इसमें मिठाई बनाने का काम भी शामिल था. जब उनकी नौकरी पक्की होने ही वाली थी तो कलर ब्लाइंड वाली बीमारी ने उनके सपने पर पानी फेर दिया. खैर. इसके बाद वो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जमशेदपुर, रांची और पटना में अपनी मिठाई बनाने की कला का खूब प्रदर्शन किया. इसके बाद रामचंद्र मिश्र अपने गांव लभरा आ गए. उनका गांव गया जिले से 18 किलोमीटर दूर टिकारी सब डिविजन के तहत पंचानपुर कस्बा के करीब पड़ता है. उनका गांव बोधगया मंदिर से 25 किलोमीटर दूर पड़ता है. आज जहां पंडित जी की दुकान है, वहां 1969 में बियाबान था. यानी दूर-दूर तक कुछ भी नहीं था. फिर भी, रामचंद्र मिश्र ने पहले नमकीन बनाने की दुकान शुरू कर ली. इसी दौरान एक स्थानीय जमींदार ने रामचंद्र से रसगुल्ला बनाने के लिए पूछा तो उन्होंने हामी भरी. और फिर तब से लेकर अबतक इस दुकान पर मशहूर रसगुल्ला बनने लगा.

पंडित जी की मशहूर दुकान
ऐसे बना था पहला 1.5 किलो का रसगुल्ला
बात 1975 की है. स्थानीय दारोगा कुशमांकर पांडेय रामचंद्र मिश्र की दुकान पर पहुंचे. वहां उन्होंने उनसे पूछा कि कितना बड़ा रसगुल्ला बना पाते हैं. दरअसल, पांडेय अपने बड़े अधिकारी को कुछ गिफ्ट देना चाहते थे. तब रामचंद्र मिश्रा ने उनकी मांग पर सबसे पहले 1.5 किलोग्राम का रसगुल्ला बनाया. फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. पांडेय ने अपने आईजी फजल अहमद को ये रसगुल्ला गिफ्ट किया.

एक किलो का गलाफाड़ रसगुल्ला
'गलाफाड़ रसगुल्ला'
गया के इस मशहूर रसगुल्ले के नाम भी खास ही है. इसका नाम 'गलाफाड़ रसगुल्ला' है. जब हमने इसके बारे में पूछा तो दुकान के मालिक अनिल किशोर मिश्र ने बताया कि चूंकि रसगुल्ले काफी छोटे बनते हैं लेकिन ये रसगुल्ला काफी बड़ा होता है. इसलिए इसका नाम गलाफाड़ रसगुल्ला पड़ गया. क्योंकि इसे एकबार में नहीं खाया जा सकता है. तो भइया ये है इस मशहूर रसगुल्ले के नामकरण की कहानी. 1999 में इस दुकान के मालिक रामचंद्र मिश्र के निधन के बाद उनके चार बेटे जयकिशोर मिश्र, श्यामकिशोर मिश्र, अनिल किशोर मिश्र और चंद्रकिशोर मिश्र मिलकर चलाते हैं. आज भी ये अपने पिता की रसगुल्ले की विरासत को बखूबी बढ़ा रहे हैं. आइए अब आपको इस रसगुल्ले की कीमत भी बता देते हैं. दुकान के मालिक अनिल मिश्र ने बताया कि एक किलो रसगुल्ले की कीमत 300 रुपये है. उन्होंने बताया कि अगर वजन ज्यादा हुआ तो कीमत ज्यादा हो सकती है. उन्होंने बताया कि यहां रसगुल्ले 15 रुपये की कीमत से शुरू होकर 450 रुपये की कीमत तक के बनते हैं.

गलाफाड़ रसगुल्ला बनाने में लगता है काफी वक्त
इसमें कुछ खास है
बिहार लिट्ठी-चोखा से लेकर तिलकुट और सिलाव के खाजा के लिए मशहूर रहा है. लेकिन गया का ये मशहूर रसगुल्ला भी उसकी विरासत में शामिल हो गया है. लोग बड़े चाव से इस रसगुल्ले को खाने आते हैं. इस लेखक को भी गया का ये मशहूर रसगुल्ला खाने को मिला तो फिर उसे इसकी कहानी जानने की भी इच्छा हुई. फिर हमें मिली रसगुल्लों के 'बाप' की पूरी कहानी.
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