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163 साल पुराना बिहार का कोईलवर पुल हुआ कमजोर, दरक रही नींव... दांव पर लगेगी सैकड़ों जान

Bihar News: 163 साल पुराना अब्दुल बारी कोइलवर पुल अब असुरक्षित हो गया है. अवैध रेत खनन और खंभों में दरारों के कारण लाखों रेल यात्रियों की जान खतरे में है. अवैध खनन के कारण इस पुल के पिलरों की मजबूती कम होती जा रही है.

163 साल पुराना बिहार का कोईलवर पुल हुआ कमजोर, दरक रही नींव... दांव पर लगेगी सैकड़ों जान
163 साल पुराना कोईलवर पुल, बिहार
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Koilwar bridge News: पटना और आरा के बीच स्थित कोईलवर  नामक स्थान पर  ब्रिटिश काल में बना ऐतिहासिक अब्दुल बारी कोईलवर  पुल इस समय गंभीर संकट का सामना कर रहा है. लगभग 163 साल पुराना यह पुल-जिसे कभी इंजीनियरिंग का कमाल माना जाता था-अब अपनी खराब हालत के कारण लाखों लोगों की जान के लिए खतरा बन रहा है.

 पुल की वर्तमान स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों, यात्रियों और विशेषज्ञों में गहरी चिंता व्याप्त है, लेकिन विडंबना यह है कि अब तक न तो जिला प्रशासन और न ही रेलवे प्रशासन ने इस दिशा में कोई ठोस पहल की है.

ऐतिहासिक धरोहर, लेकिन अब खतरे का संकेत

कोईलवर पुल का निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान लगभग 1860 में हुआ था. यह पुल सोन नदी पर बना है और बिहार के भोजपुर और पटना जिलों को जोड़ने का मुख्य साधन रहा है.लंबे समय तक, इस पुल का इस्तेमाल सड़क और रेल दोनों को जोड़ने वाले एकमात्र लिंक के रूप में किया जाता रहा है. यह पुल न केवल यातायात के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसकी अपनी अलग पहचान है.

कई हिस्सों में है बेहद खतरनाक दरारें

वही, समय के साथ-साथ इस पुल की स्थिति लगातार खराब होती गई. वर्षों से पर्याप्त मरम्मत और रखरखाव के अभाव में आज यह पुल जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है. पुल के कई हिस्सों में दरारें साफ देखी जा सकती हैं. इसके पिलर भी अब पहले की तरह मजबूत नहीं है उनकी जर्जर अवस्था दूर से ही दिखती हैं.

अवैध खनन पर नहीं लगाई रोक तो हो सकता है बड़ा नुकसान

स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों के मुताबिक, पुल के पिलर सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. कहा जा रहा है कि इनके आस-पास की मिट्टी कटाव का शिकार हो चुकी है, जिससे जमीन की सतह पर उनकी पकड़ धीरे-धीरे कमज़ोर होती जा रही है. नदी के बहाव में बदलाव और लगातार रेत माइनिंग ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है जिससे पिलर पर दबाव बढ़ रहा है.अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो पुल के स्ट्रक्चर को ऐसा नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.

बालू खनन बना सबसे बड़ा खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध और अनियंत्रित बालू खनन इस पुल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है. सोन नदी से लगातार बालू निकासी के कारण नदी का तल गहरा होता जा रहा है, जिससे पुल के पिलरों की नींव कमजोर हो रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन को इसकी जानकारी दी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई. बालू माफिया बेखौफ होकर दिन-रात खनन कर रहे हैं, जिससे पुल के अस्तित्व पर संकट और गहराता जा रहा है.

रोजाना सैकड़ों ट्रेनों का आवागमन

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पुल से प्रतिदिन कई ट्रेनें गुजरती हैं. हजारों यात्री रोज इस पुल के माध्यम से अपना सफर तय करते हैं. सूत्रों के अनुसार इस स्थिति को लेकर रेलवे  का कहना है कि पुल पर भार का दबाव लगातार बढ़ रहा है. लेकिन इसके अनुरूप इसका रखरखाव और मजबूतीकरण का कार्य नहीं किया जा रहा है. ऐसे में किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है, जिसकी जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा.

प्रशासनिक उदासीनता पर उठ रहे सवाल

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर समस्या के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिख रही है. स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. पुल की नियमित जांच, मरम्मत और बालू खनन पर रोक लगाने जैसे जरूरी उपाय अब तक केवल कागजों तक ही सीमित हैं.

विशेषज्ञों की चेतावनी

इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही इस पुल की व्यापक तकनीकी जांच नहीं कराई गई और जल्द ही इसका आवश्यक मरम्मत कार्य शुरू नहीं किया गया, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है. पुराने पुलों के लिए समय-समय पर स्ट्रक्चरल ऑडिट आवश्यक होता है, जिससे उनकी मजबूती का आकलन किया जा सके. लेकिन कोइलवर पुल के मामले में ऐसी कोई ठोस पहल  अब तक सामने नहीं आई है.

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