- बिहार के मंझौल रेफरल अस्पताल में सड़क हादसे में घायल युवक के पैर का इलाज लकड़ी कुट बांधकर किया गया था.
- अस्पताल में आर्थोपेडिक डॉक्टर और ड्रेसर की कमी के कारण प्राथमिक उपचार में असुविधा आई है.
- घायल युवक को प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए बेगूसराय सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया था.
बिहार के बेगूसराय से एक हैरान करने वाला वीडियो सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. वीडियो में सड़क हादसे में घायल एक युवक के पैर का इलाज प्लास्टर ऑफ पेरिस की बजाय लकड़ी कुट बांधकर किए जाने का दावा किया जा रहा है. खास बात यह है कि यह मामला किसी निजी अस्पताल का नहीं, बल्कि एक सरकारी अस्पताल का बताया जा रहा है. वीडियो सामने आने के बाद लोग बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं. बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले ही इस अस्पताल का उद्घाटन नीतीश कुमार ने किया था.
पैर में कूट बांधकर उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया
जानकारी के अनुसार वीडियो मंझौल रेफरल अस्पताल का है, जहां सड़क हादसे में घायल एक युवक को समुचित इलाज के लिए भर्ती कराया गया था. लेकिन मौजूद डॉक्टर ने उसके पैर में कूट(कार्टून) बांधकर उसे हायर सेंटर रेफर कर दिया, जिसका वीडियो किसी परिजन ने बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. अब इस मामले में सिविल सर्जन ने जांच के बाद कार्रवाई का भरोसा दिया है. सिविल सर्जन ने बताया कि कर्मियों के कमी के कारण कभी-कभी ऐसे हालात उत्पन्न हो जाते हैं. वही, इस मामले में मंझौल अनुमंडल अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी अभिनव प्रियदर्शिनी ने बताया की आर्थो के डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे और ड्रेसर भी नहीं था. मेडिकल साइंस में ऐसा करना गलत भी नहीं है. कई बार जान बचाने के लिए इमोलाईजेशन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है. लेकिन मंझौल अनुमंडल अस्पताल में कर्मियों की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है इसके लिए कई बार विभाग को पत्राचार किया गया है.
नावकोठी थाना क्षेत्र के महेशवाड़ा गांव का रहने वाला कुणाल कुमार बाइक से जा रहा था, तभी हर साइन पुल के पास वह हादसे का शिकार हो गया और उसके पैर में फ्रैक्चर हो गया. परिजन और स्थानीय लोगों ने उसे उठाकर मंझौल अनुमंडलीय अस्पताल लाया जहां डॉक्टरों ने उसके पूरे पैर में कॉटन बांधकर सदर अस्पताल बेगूसराय भेज दिया.
'ना तो डॉक्टर है ना ड्रेसर है'
जब इस संबंध में अनुमंडलीय अस्पताल के प्रभारी अभिनव प्रियदर्शी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि पैर फ्रैक्चर होने के बाद ब्लड रोकने के लिए और प्राथमिक उपचार के लिए कार्टून लगाया जाता है. यह मेडिकल साइंस में गलत नहीं है. साथ ही उस वक्त ऑर्थोपेडिक डॉक्टर अस्पताल में नहीं थे और ड्रेसर भी नहीं था. इस कारण से ऐसा किया गया. अब सवाल उठता है जब करोड़ों से बने इस अनुमंडलीय अस्पताल में एक फ्रैक्चर का इलाज संभव नहीं है और प्रभारी भी मान रहे हैं कि ना तो डॉक्टर है ना ड्रेसर है तो फिर स्वास्थ्य विभाग कैसे कम कर रहा है या सहज समझा जा सकता है .
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