जिस मोहम्मद अली जिन्ना ने धर्म की बुनियाद एक पूरे मुल्क का बंटवारा कर दिया, जब वो शख्स अपना दिल्ली वाला घर छोड़कर गया, तो उस आलीशान बंगले को 'गंगाजल' से धोया गया था. लुटियंस दिल्ली में बना यह बंगला पाकिस्तान के विचार और उसकी रणनीति को लेकर मुस्लिम लीग की कई ऐतिहासिक बैठकों का गवाह रह चुका है. दिल्ली की इनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला बताते हैं कि जिन्ना के बंगले को देश के मशहूर उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया ने महज ढाई लाख रुपए में खरीदा था. लेकिन जिन्ना के जाते ही बंगले को गंगाजल से क्यों धुलवाया? इसके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है.
दिल्ली का 10 औरंगजेब रोड. इसे आज एपीजे अब्दुल कलाम रोड के नाम से जानते हैं. साल 1943 था, जब मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने ये घर खरीदा. ये कोई आम घर नहीं था. करीब ढाई एकड़ में फैला ये बेजोड़ यूरोपियन स्टाइल का बंगला था. इसमें 10 आलीशान बेडरूम, एक बड़ा सा ड्राइंग रूम, बिलियर्ड्स रूम और एक स्पेशल 'बार' था. इसी बंगले की चारदीवारी में बैठकर भारत और पाकिस्तान की सरहदों का नक्शा तय हुआ था. आपको जानकर हैरत होगी कि पाकिस्तान का मशहूर अखबार डॉन (Dawn) दिल्ली के दरियागंज से छपता था इसे जिन्ना चलाते थे. उस वक्त ये अखबार पाकिस्तान के विचार को आगे बढ़ाने का जरिया था.

मस्जिद तक नहीं जाते थे जिन्ना
पत्रकार विवेक शुक्ला बताते हैं, "जिन्ना की शख्सियत बड़ी अजीब थी. वो एक इस्लामिक मुल्क की मांग कर रहे थे, लेकिन खुद कभी दिल्ली की किसी मस्जिद में नमाज पढ़ते नहीं दिखे. वो थ्री-पीस सूट पहनते थे और शाम को इसी बंगले के अपने 'बार' में बैठकर महंगी शराब पीते थे. धर्म से उनका कोई लेना-देना नहीं था, बस सियासत के लिए उन्होंने धर्म को अपना हथियार बनाया."
एयर इंडिया के शेयर खरीद रहे थे जिन्ना
दिल्ली के पुराने लोग जिन्ना को 'पैसे का पीर' कहते थे. यानी एक ऐसा आदमी जिसका असली ईमान पैसा था. आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि अगस्त 1947 में, जब देश बंटने ही वाला था, तब भी जिन्ना 'एयर इंडिया' के शेयर खरीद रहे थे. क्योंकि एक पक्के बिजनेसमैन की तरह उन्हें भी ये अंदाजा नहीं था कि पाकिस्तान इतनी जल्दी, महज सात सालों में बन जाएगा. वो तो मुनाफा कमाने की सोच रहे थे.
बेटी की बगावत, खाली हाथ पाकिस्तान गए जिन्ना
इतना बड़ा बंगला था, लेकिन रहता कौन था? सिर्फ जिन्ना और उनकी डेंटिस्ट बहन फातिमा. जिन्ना अंदर से निहायती अकेले इंसान थे. उनकी अपनी इकलौती बेटी दीना से उनकी बिल्कुल नहीं बनती थी. पिता एक कट्टर इस्लामिक देश बना रहे थे, लेकिन बेटी ने उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर एक पारसी से शादी कर ली. जब जिन्ना ने दीना को पाकिस्तान चलने को कहा, तो बेटी ने साफ इनकार कर दिया कि वो हिंदुस्तान नहीं छोड़ेगी. इसी पारिवारिक क्लेश और गुस्से में जिन्ना ने अपना ये प्यारा घर बेटी को देने के बजाय बेचना सही समझा.
7 अगस्त 1947: जिन्ना की आखिरी विदाई
फिर आया 7 अगस्त 1947 का दिन. दिल्ली भयंकर उमस और दंगों की आग में जल रही थी, लेकिन जिन्ना को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था. हालांकि, जो आदमी पूरी जिंदगी सिर्फ अपनी पत्नी की मौत पर रोया था, वो आज इस बंगले को छोड़ते वक्त भावुक था. सफदरजंग एयरपोर्ट जाने से ठीक पहले जिन्ना ने इस घर की दीवारों को बड़े प्यार से छुआ. शायद वो जानते थे कि अब इस मुल्क में उनकी वापसी कभी नहीं होगी. हमेशा सूट पहनने वाले जिन्ना ने उस दिन जानबूझकर एक शेरवानी पहनी थी, ताकि दुनिया को एक नए इस्लामिक मुल्क के रहनुमा का मैसेज दे सकें.

रामकृष्ण डालमिया ने खरीदा बंगला
जिन्ना के जाने के बाद कहानी का असली ट्विस्ट शुरू होता है. जिन्ना जाते-जाते ये ढाई एकड़ का बंगला अपने एक दोस्त को सिर्फ ढाई लाख रुपये में बेच गए. ये दोस्त थे देश के दिग्गज उद्योगपति लाला रामकृष्ण डालमिया. अब आप सोचेंगे कि मुस्लिम लीग के नेता और एक हिंदू मारवाड़ी कारोबारी में कैसी दोस्ती? लेकिन डालमिया कोई आम कारोबारी नहीं थे. 1930 के दशक में टाटा और बिड़ला के बाद देश का सबसे बड़ा औद्योगिक साम्राज्य उन्हीं का था. रोहतक में जन्मे डालमिया ने अपनी मेहनत से ये अंपायर खड़ा किया था.
दोस्ती अपनी जगह थी, लेकिन डालमिया एक पक्के सनातनी और गोरक्षा के बहुत बड़े समर्थक थे. जब जिन्ना पाकिस्तान चले गए और बंगले की चाबियां डालमिया के पास आईं, तो उन्होंने सबसे पहला काम पुजारियों को बुलाया और इस पूरे ढाई एकड़ के बंगले को, इसके हर कमरे, हर कोने और उस शराब वाले 'बार' को 'गंगाजल' से धुलवाया. इसका पूरा शुद्धिकरण करवाया गया.

बाद में, जब डालमिया की नेहरू से ज्यादा बनती नहीं थी. उन्हें डर सताने लगा कि कहीं सरकार ये बंगला छीन न ले. इसलिए उन्होंने 1961 में इसे नीदरलैंड की सरकार को बेच दिया. आज भी वहां नीदरलैंड के राजदूत रहते हैं. आज आप उस सड़क से गुजरेंगे तो शायद आपको पता भी न चले कि इसी इमारत में मुल्क के टुकड़े करने की इबारत लिखी गई थी.
(वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला की नई किताब 1947: विभाजन के शेष सवाल जल्द आने वाली है.)
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