PhD Scholar on street: कहते हैं वक्त की मार जब पड़ती है, तो बड़े-बड़ों का सिंहासन डोल जाता है. आगरा की तपती सड़कों पर घूमते एक बुजुर्ग, जिनका नाम 'डॉक्टर संतोष गोयल' है, आज की तारीख में महज एक 'लाचार' चेहरा नजर आते हैं, लेकिन इनकी हकीकत किसी को भी हैरान कर सकती है. 1971 में इंग्लिश लिटरेचर में 'PhD' करने वाले और 'NDA' के जांबाजों को अंग्रेजी की तालीम देने वाले ये 'उस्ताद' आज दाने-दाने को मोहताज हैं. आंखों की रोशनी क्या गई, मानों किस्मत ने इनसे इनका सब कुछ छीन लिया. आज वो किसी आलीशान बंगले में नहीं, बल्कि मंदिर की शरण में अपनी ढलती उम्र गुजार रहे हैं.
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आगरा की सड़कों पर ये बुजुर्ग क्यों बेच रहे हैं सामान? (English Professor selling items)
कहते हैं कि वक्त जब करवट लेता है, तो शहंशाह को भी फकीर बना देता है. वीडियो में दिख रहे इन शख्स को पहली नजर में शायद आप मामूली समझ लें, लेकिन जब ये ज़ुबान खोलते हैं, तो शेक्सपियर और मिल्टन की नज्में (कविताएं) इनके लबों पर नाचती हैं. वीडियो में शख्स ने बताया कि, 1971 में...जब दुनिया बदल रही थी, इन्होंने अंग्रेजी साहित्य में 'PhD' की डिग्री हासिल की थी. इतना ही नहीं, इनका ताल्लुक देश की आन-बान और शान 'NDA (National Defence Academy)' से भी रहा है. खड़कवासला में इन्होंने तीन साल तक आर्मी के उन जांबाजों को अंग्रेजी सिखाई, जो आज कर्नल और ब्रिगेडियर जैसे ऊंचे ओहदों पर तैनात हैं.
आंखों की रोशनी गई और छिन गई पहचान (Santosh Goyal English teacher)
जिंदगी का फलसफा बड़ा अजीब है. डॉक्टर गोयल बताते हैं कि अगर उनकी आंखों की रोशनी सलामत होती और 15 साल की सर्विस पूरी हो जाती, तो आज वो 75-80 हजार रुपये की पेंशन पर ठाठ से जी रहे होते, लेकिन आंखों की खराबी की वजह से उन्हें 'बोर्ड आउट' कर दिया गया. शख्स ने कहा, 'आज दांत नहीं हैं...तो रोटी नहीं चबा पाता, बस ये मंदिर के पास रहने वाले लोग ढोकले और लड्डू खिला देते हैं, तो पेट भर जाता है'. आज वो आगरा के नगला पदी इलाके के एक मंदिर में अपना बसेरा किए हुए हैं. उनकी हालत देख दिल पसीज जाता है, लेकिन उनका जज्बा आज भी वैसा ही है जैसा एक 'प्रोफेसर' का होता है.
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सड़कों पर आज भी देते हैं 'ज्ञान की घुट्टी' (Agra ke PhD wale baba)
हैरानी की बात तो ये है कि इतनी तंगहाली के बावजूद, डॉक्टर 'साहब' ने पढ़ाना नहीं छोड़ा. आज भी सड़कों पर चलते-फिरते वो MA के स्टूडेंट्स को 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' और 'जूलियस सीजर' के पाठ पढ़ा देते हैं. उनकी याददाश्त इतनी तेज है कि ग्रामर के बारीक से बारीक नियम उन्हें आज भी ज़ुबानी याद हैं. वो आज भी आगरा की तपती सड़कों पर कुछ सामान बेचते दिख जाते हैं, ताकि खुद की खुद्दारी (self-respect) को जिंदा रख सकें.
(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
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