जापान जाने वाले हर नए यात्री को सबसे बड़ा झटका यही लगता है कि वहां सार्वजनिक कूड़ेदान लगभग नहीं मिलते. अत्याधुनिक तकनीक, वेंडिंग मशीनें और बेहतरीन व्यवस्था तो दिखती है, लेकिन कचरा फेंकने की जगह ढूंढना किसी चुनौती से कम नहीं. आखिर इतना साफ देश कूड़ेदानों से क्यों दूर रहता है?
जब डस्टबिन ढूंढना बन जाए चुनौती
जापान में आमतौर पर सड़क, पार्क, स्टेशन या सार्वजनिक जगहों पर कूड़ेदान नहीं होते. अगर कहीं दिख भी जाएं, तो वे बंद या सील रहते हैं. दुकान से खरीदी गई कॉफी वहीं पीनी होती है और कप दुकान को लौटा दिया जाता है. चॉकलेट का रैपर हो या टॉफी का कागज, लोग उसे अपने बैग में रखकर घर ले जाते हैं. यहां बोर्ड लगे होते हैं, जिन पर साफ लिखा होता है कि अपना कचरा अपने साथ ले जाएं.

सफाई सिर्फ आदत नहीं, संस्कार है
जापान में सफाई को सम्मान की तरह देखा जाता है. स्कूलों में बच्चे खुद कक्षा, मैदान और शौचालय तक साफ करते हैं. उन्हें सिखाया जाता है कि जिस जगह का इस्तेमाल करें, उसे खुद साफ करना उनकी जिम्मेदारी है. यही सोच जापानी समाज की नींव है.
टोक्यो सबवे में सरीन गैस हमला
लेकिन कूड़ेदान हटाने की असली वजह क्या है? इस सवाल का जवाब ले जाता है करीब 30 साल पीछे, एक ऐसे दिन पर जिसने पूरे जापान को हिला दिया था. 20 मार्च 1995 को टोक्यो की सबवे ट्रेनों में एक भयानक आतंकी हमला हुआ. एक पंथ संगठन ने प्लास्टिक की थैलियों में भरी सरीन गैस को ट्रेन के फर्श पर फैला दिया। सरीन एक बेहद जहरीली तंत्रिका गैस है. हमलावरों ने छाते की नुकीली नोक से थैलियां छेदीं और गैस छोड़ दी. कुछ ही मिनटों में लोग आंखों में जलन, चक्कर और उल्टी की शिकायत करने लगे. कई यात्री बेहोश होकर गिर पड़े और कई की मौके पर ही मौत हो गई.

इसके बाद लिया गया बड़ा फैसला
इस हमले में 12 लोगों की मौत हुई और हजार से ज्यादा घायल हुए. कई लोग बाद में दम तोड़ बैठे. ट्रेनें, जो जापान की पहचान थीं, डर और असुरक्षा की प्रतीक बन गईं. यह हमला सिर्फ लोगों पर नहीं, बल्कि जापान की आत्मा पर हमला था. इस आतंकी हमले के बाद जापान ने सार्वजनिक कूड़ेदान हटाने का फैसला किया. वजह साफ थी, कूड़ेदान में विस्फोटक या जहरीले पदार्थ छिपाए जा सकते हैं. सरकार ने तय किया कि सुरक्षा के लिए यह जरूरी कदम है. कई देशों में कुछ समय बाद कूड़ेदान वापस आ जाते हैं, लेकिन जापान ने तीन दशकों से इस फैसले को नहीं बदला.

सुरक्षा और जिम्मेदारी का अनोखा मेल
जापान ने आतंक से लड़ने के लिए सिर्फ पुलिस या कानून पर भरोसा नहीं किया, बल्कि लोगों की जिम्मेदारी पर भरोसा किया. नागरिकों को खुद अपना कचरा संभालने की आदत डाली गई. सुरक्षा और अनुशासन को जीवन का हिस्सा बना दिया गया. आज भी जापान में जगह-जगह माफीनामे जैसे नोट दिखते हैं, जिन पर लिखा होता है कि कृपया अपना कचरा अपने साथ ले जाएं. बिना कूड़ेदान के भी देश साफ रहता है, क्योंकि वहां सफाई कानून नहीं, संस्कृति है.
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