दुबई से इजरायल जा रही फ्लाइट में जब को-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला किया, तो लहूलुहान होने के बावजूद उन्होंने 180 यात्रियों की जान बचा ली. पूरी दुनिया उनकी जांबाजी को सलाम कर रही है, लेकिन इंटरनेट पर एक अलग ही चर्चा छिड़ गई है. लोग पूछ रहे हैं कि आखिर इस जांबाज पायलट का सरनेम 'मच्छार' (Machchhar) क्यों है, और वे किस जाति या समाज से आते हैं?
पूरे देश के लिए यह सरनेम थोड़ा अजीब हो सकता है, लेकिन गुजरात में यह कोई नई बात नहीं है. वहां हाथी, बाकरी (बकरी), मांकड़ी (कीड़ा) और पोपट जैसे सरनेम आम हैं. समाजशास्त्रियों का मानना है कि गुजरात में शारीरिक बनावट या आदतों पर भी सरनेम रख दिए जाते थे. जैसे लंबी नाक वाले को अक्सर 'पोपट' कह दिया जाता था.
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क्या है 'मच्छार' सरनेम का मतलब?
गुजराती सरनेम के इतिहास पर लिखी किताबों की मानें तो इसके तीन मुख्य कारण सामने आते हैं. गुजराती शब्द 'मत्सर' से यह बिगड़कर 'मच्छार' बना, जिसका मतलब ईर्ष्या या जलन होता है. माना जाता है कि जो परिवार मच्छरों की बहुतायत वाले इलाके में रहते थे, उन्हें पहचान के लिए यह नाम मिला. किसी दुबले-पतले या छोटे कद के इंसान को मजाकिया लहजे में यह नाम मिला हो.
1960 के दशक का एक किस्सा भी मशहूर है, जब पूर्व सांसद जयसुखलाल हाथी का सम्मान 'मच्छार' सरनेम वाले एक सज्जन ने किया था. उस दौर में खूब चुटकी ली गई थी कि 'क्या जमाना आ गया है, हाथी का सम्मान एक मच्छर कर रहा है!
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नागर ब्राह्मण या लोहाना?
गुजरात में 'मच्छार' सरनेम मुख्य रूप से दो समुदायों लोहाना और नागर ब्राह्मण में मिलता है.लोहाना समुदाय मूल रूप से कच्छ और पाकिस्तान के सिंध से जुड़ा कारोबारी तबका है. 19वीं सदी में ये मुंबई में व्यापार के सिलसिले में आकर बसे. कराची में आज भी एक मशहूर 'मछर कॉलोनी' है, जो मछुआरों से जुड़ी है. नागर ब्राह्मण सौराष्ट्र का यह समुदाय कलम और कागजात का धनी रहा है. मुगलों और अंग्रेजों के दौर में इस समाज के लोग मुंशी, लेखक और शिक्षक रहे. गुजराती साहित्य और आजादी के आंदोलन में नागरों का दबदबा रहा. मध्य प्रदेश के कायस्थों की तरह यह समाज खुद को प्रशासनिक कार्यों और पढ़ाई-लिखाई से ही जोड़कर देखता आया है. यानी 180 जिंदगियां बचाने वाले कैप्टन स्मित की बहादुरी जितनी अनोखी है, उनके सरनेम की कहानी भी उतनी दिलचस्प है.
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