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होर्मुज फिर खौल रहा, डील तोड़ने के लिए नहीं, अपने हक में करने के लिए हुए अमेरिका-ईरान के हमले?

अमेरिका और ईरान सीजफायर होने के 10 दिन के अंदर एक-दूसरे पर हमला कर बैठे हैं. आखिर इसकी वजह क्या है. क्यों MoU समझौता अपनी अस्पष्ट भाषा के दबाव में ही टूटता दिख रहा है.

होर्मुज फिर खौल रहा, डील तोड़ने के लिए नहीं, अपने हक में करने के लिए हुए अमेरिका-ईरान के हमले?
US Iran War: अमेरिका और ईरान में तनाव फिर बढ़ गया है (फोटो- NDTV)
  • 10 दिन पहले हुए सीजफायर डील के बावजूद अमेरिका और ईरान ने एक दूसरे पर फिर से बमबारी शुरू कर दी, वजह क्या है
  • पूर्व राजनयिकडॉ बी बाला भास्कर के अनुसार ऐसी झड़प तो सीजफायर के बाद होने वाली वार्ता में बेहद आम है
  • दोनों पक्ष अपनी अपनी ताकत फिर से साबित करने की कोशिश कर रहें ताकि चल रही नेगोशिएशन में उनकी अहमियत ज्यादा हो

रिश्तों की अपनी मियाद होती है, उम्मीदों की अपनी एक्सपायरी डेट होती है, लेकिन क्या वैसे ही जंग के खत्म होने की कोई डेडलाइन नहीं होती? सवाल सिंपल है कि आखिर मिडिल ईस्ट की यह जंग खत्म क्यों नहीं होती? इसका जवाब इतना सिंपल नहीं. सिर्फ 10 दिन पहले हुए सीजफायर डील के बावजूद जब अमेरिका और ईरान ने एक दूसरे पर फिर से बमबारी शुरू कर दी, होर्मुज का पानी फिर खौलने लगा तो यह सवाल फिर सबकी जुबान पर चला आया. डोनाल्ड ट्रंप फिर से ईरान को नक्शे से मिटा देने की धमकी दे रहे हैं. ईरान ने भी चेतावनी दी है कि अगर सीजफायर तोड़ी, तो सारी बातचीत पूरी तरह रोक दी जाएगी. इन सबके बीच खाड़ी के लोग अपने ऊपर से गुजरती मिसाइलों को पिछले 4 महीने की अशांति के बाद पुरानी जिंदगी की ओर लौटने की उम्मीद पर हमला मान रहे हैं.

अभी के लिए तो अमेरिकी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर हमले रोकने पर सहमत हो गए हैं. अगर यह सच भी है तो यह मर्ज का इलाज नहीं, उससे दूरी बनाना भर है. सच्चाई यह है कि खाड़ी क्षेत्र में अचानक नए सिरे से तनाव भड़क उठा है, जिससे दोनों देशों के बीच फिर से युद्ध छिड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

नेगोशिएशन वाला यह दांव-पेंच

लेकिन क्या अभी मिडिल ईस्ट में कुछ ऐसा हो रहा है जिसकी उम्मीद एक्सपर्ट्स को नहीं थी? जवाब है एकदम नहीं. हमने नॉर्वे में भारत के राजदूत पद से रिटायर और अभी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) में प्रोफेसर, डॉ बी बाला भास्कर से की. उनसे भी यही सवाल किया कि जब अमेरिका और ईरान ने शुरुआती डील यानी MoU पर साइन कर लिया है, दोनों बड़ी डील के लिए 60 दिनों की बातचीत में लगे हैं, तब दोनों आपस में क्यों फिर लड़ बैठे हैं. इसपर डॉ बी बाला भास्कर ने नेगोशिएशन वाला वह दांव-पेंच समझाया, जो अभी दोनों देश लगा रहे हैं. 

उनके अनुसार फिर से एक-दूसरे पर हमला किसी भरोसे की कमी या ट्रस्ट डेफिसिट की वजह से नहीं है, असल में ऐसी झड़प तो सीजफायर के बाद होने वाली वार्ता में बेहद आम है. आगे किसी भी वार्ता में किसकी चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ग्राउंड पर हुई लड़ाई में किसका पलड़ा भारी रहा, जंग में कौन मजबूत पार्टी साबित हुआ. अब वार्ता के बीच आपस में लड़कर दोनों पक्ष अपनी अपनी ताकत फिर से साबित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि चल रही नेगोशिएशन में उनकी अहमियत ज्यादा हो, उनका अपर हैंड हो.

उन्होंने साफ-साफ कहा कि जबतक कोई देश जमीनी लड़ाई में अपनी ताकत साबित न कर दे, तबतक वार्ता की मेज पर जो भी फैसले लिए जाएंगे, वह उसके पक्ष में नहीं होंगे. जबतक फाइनल समझौता नहीं हो जाता, तबतक दोनों पक्ष अपनी ताकत साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे और वार्ता के बाकि बचे लगभग 50 दिनों में फिर से हमले की संभावना को नकारा नहीं जा सकता.

ईरान का इक्का और होर्मुज का टकराव

इसे होर्मुज के टकराव से ही समझिए. अभी जो हमले वापस से शुरू हुए हैं, उसके पीछे होर्मुज के कंट्रोल वाला फैक्टर था. ट्रंप जानते हैं कि होर्मुज ईरान का सबसे बड़ा हथियार बन गया है. खुद अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का असेसमेंट यानी आकलन है कि ईरान के हाथ परमाणु से बड़ा हथियार लग गया है. अब जब वार्ता हो रही थी तो अमेरिका ने दांव चला और होर्मुज में ही ओमान के करीब से नया रूट खोल दिया. कोशिश थी ईरान के दबदबे को कम किया जाए, नेगोशिएशन में अपनी पावर बढ़ाई जाए. ईरान को यह नागवार गुजरा और उसने ओमान वाले रूट पर कंटेनर जहाज पर ड्रोन हमला कर दिया. फिर अमेरिका ने जवाबी हमला किया और फिर ईरान ने खाड़ी में अमेरिकी सैन्य बेस पर पलटवार किया. कुल मिलाकर कोशिश आगे वाले के हाथ से तुरुप का इक्का छीनने की थी. 

सुपरपावर होने के बावजूद जंग के मैदान पर अमेरिका को झटका लगा है और वह पैनिक मोड में है. यही वजह है कि वह किसी भी तरह होर्मुज का कंट्रोल ईरान से छीनना चाहता है. हर तरह से ईरान को न्यूट्रलाइज करने की कोशिश कर रहा है. इस कोशिश ने चिंगारी लगाई वहां से वार-पलटवार का चेन रिएक्शन शुरू हो गया.

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46 साल पुरानी जंग

यहां यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह जंग केवल 4 महीने पुरानी नहीं है, जब ट्रंप ने आदेश देकर सुप्रीम लीडर अली खामेनेई को मौत के घाट उतार दिया था और संघर्ष शुरू हो गया था. यह जंग 46 साल पुरानी है और यह उम्मीद करना बेईमानी होगी कि 2 महीने के वार्ता से पूरी तरह शांति आ जाएगी. डॉ भास्कर के अनुसार इस वार्ता में कई गहरे मुद्दे जुड़े हैं जो सिर्फ अमेरिका और ईरान से नहीं बल्कि लेबनान और इजरायल जैसे दूसरे देशों से भी जुड़े हैं. 

MoU की भाषा

लड़ाई फिर से छिड़ने के पीछे एक वजह दोनों देश के बीच हुए समझौते यानी MoU के लैंग्वेज को भी माना जा रहा है. द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार एक्सपर्ट को ऐसा लगता है कि समझौते के मेमोरेंडम में जानबूझकर जो अस्पष्ट भाषा रखी गयी है, उसका दोनों पक्ष अब अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं और इसने दबाव बनाने का काम किया है. तेहरान में तो इस समझौते का समर्थन करने वाले लोग खुद को कमजोर स्थिति में पा रहे हैं. अब यह बात तेजी से कही जा रही है कि ईरान की सरकार को होर्मुज दोबारा खोलने के लिए कभी भी राजी नहीं होना चाहिए था. रिपोर्ट्स के अनुसार यह राय ईरान के सिर्फ कट्टरपंथी नेताओं की ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों के बीच भी फैल रही है.

दरअसल 14 बिंदुओं वाले इस MoU में दो सबसे विवादित मुद्दों- लेबनान में सीजफायर और होर्मुज खोलने को लेकर जानबूझकर अस्पष्ट भाषा रखी गई थी. उम्मीद थी कि जैसे-जैसे दोनों पक्षों के बीच भरोसा बढ़ेगा, वैसे-वैसे किसी एक समाधान पर सहमति बन जाएगी. लेकिन हो इसके उलट रहा है. अब यह समझौता दबाव में टूटता हुआ दिख रहा है और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते की शर्तें तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं.

तो अभी फिलहाल के लिए हर नई मिसाइल, हर नया हमला और हर नई धमकी वार्ता की मेज को थोड़ा और कमजोर करेगी. दांव दोनों तरफ के एक दूसरे के खिलाफ चल रहे हैं, दोनों अपने पत्ते में मशगूल नहीं है, बल्कि दोनों को आगे वाले का इक्का चाहिए. नेगोशिएशन वाला चौपड़ खेला जा रहा है, लग रहा कि पासा होर्मुज बना है और दांव पर पूरी खाड़ी है.

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