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लेबनान में लोग अपनों को दो बार दफन करने को क्यों मजबूर हैं? रूह कपाने वाली है कहानी

टायर के इन अस्थायी कब्रिस्तानों में आज सन्नाटा पसरा है. हवाई हमलों के डर से अधिकांश परिवार शहर छोड़ चुके हैं और पीछे रह गई हैं बस वो बेनाम कब्रें, जो अपने घर लौटने का इंतजार कर रही हैं.

लेबनान में लोग अपनों को दो बार दफन करने को क्यों मजबूर हैं? रूह कपाने वाली है कहानी
AI की तस्वीर
  • लेबनान में युद्ध के कारण अस्थायी कब्रिस्तानों में दफनाने पर मजबूर कर दिया गया है.
  • मृतकों की पहचान अब पत्थर की तख्तियों की बजाय लकड़ी की पट्टियों पर स्प्रे पेंट से लिखी संख्याओं से की जाती है.
  • इस्लामिक प्रावधान वदिया के तहत युद्ध की स्थिति में शवों को ताबूत में दफनाया जाता है.
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लेबनान में युद्ध की विभीषिका ने न केवल जीवितों का चैन छीना है, बल्कि मृतकों को मिलने वाली गरिमापूर्ण अंतिम विदाई को भी एक दर्दनाक संघर्ष में बदल दिया है. लेबनानी संस्कृति में अंतिम संस्कार से पहले मृतक के शव को उसके गृहनगर की गलियों से ऊंचा उठाकर ले जाया जाता है ताकि वह अपनी जड़ों की आखिरी झलक देख सके. लेकिन इस युद्ध ने सदियों पुरानी इन परंपराओं को तहस-नहस कर दिया है.

लेबनान के परिवारों को अपने प्रियजनों को उनकी पैतृक भूमि में दफनाने के बजाय उत्तर के सुरक्षित इलाकों, जैसे टायर शहर के अस्थायी कब्रिस्तानों में दफनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. पारंपरिक कब्रों की जगह दो मीटर चौड़ी खाइयां खोदी गई हैं. मृतकों की पहचान पत्थर की तख्तियों से नहीं, बल्कि लकड़ी की पतली पट्टियों पर चमकीले लाल स्प्रे पेंट से लिखी गई संख्याओं से होती है.

'वदिया' क्या है? 

इस संकटपूर्ण स्थिति में इस्लाम का एक विशेष प्रावधान सहारा बना है, जिसे 'वदिया' कहा जाता है. सामान्यतः इस्लाम में शव को बिना ताबूत के सीधे मिट्टी में दफनाया जाता है, लेकिन युद्ध जैसी असाधारण परिस्थितियों में 'वदिया' के तहत शव को ताबूत में रखकर दफनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि जब शांति बहाल हो, तो शव को नहीं बल्कि पूरे ताबूत को निकालकर सुरक्षित रूप से उनकी पैतृक भूमि में दोबारा दफनाया जा सके. यह प्रक्रिया उस भावना को जीवित रखने की कोशिश है, जो लेबनानी लोगों के लिए उनकी पहचान का हिस्सा है.

शवों को नहलाना या कफन देना भी संभव नहीं

द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार अंतिम संस्कार की निगरानी करने वाले रबीह कौबैसी जैसे लोग इस त्रासदी के मूक गवाह हैं. वे बताते हैं कि युद्ध इतना क्रूर है कि कई बार शवों को नहलाना या कफन देना भी संभव नहीं हो पाता. क्षत-विक्षत शवों के टुकड़ों को बॉडी बैग और ताबूतों में समेटना पड़ता है. कौबैसी के अनुसार, परिवारों के लिए सबसे कठिन क्षण वह होता है जब वे अपने प्रियजनों का चेहरा देखने की जिद करते हैं. वे कहते हैं, "आप उनसे झूठ नहीं बोल सकते, लेकिन पूरा सच बताकर उनका दिल भी नहीं तोड़ सकते."

कब्रिस्तान बुलडोजरों से रौंद दिए गए

दुख की बात यह है कि अस्थायी रूप से दफनाने के बाद भी शांति नहीं है. लोगों को डर है कि इजरायल द्वारा लिटानी नदी के दक्षिण पर अनिश्चितकालीन कब्जे की चेतावनी के बाद, शायद वे कभी अपने घरों को लौट ही न पाएं. जिन गांवों से इजरायली सेना पीछे हटी, वहां लौटे लोगों ने पाया कि उनके पैतृक कब्रिस्तान बुलडोजरों से रौंद दिए गए हैं और मस्जिदें मलबे में तब्दील हो चुकी हैं.

टायर के इन अस्थायी कब्रिस्तानों में आज सन्नाटा पसरा है. हवाई हमलों के डर से अधिकांश परिवार शहर छोड़ चुके हैं और पीछे रह गई हैं बस वो बेनाम कब्रें, जो अपने घर लौटने का इंतजार कर रही हैं. यह युद्ध केवल ज़मीन की लड़ाई नहीं, बल्कि एक समुदाय की अपनी मिट्टी और अपने पूर्वजों से जुड़े रहने की आखिरी जद्दोजहद भी है.

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