नेपाल में कुदरत के कहर ने पूरी दुनिया को दहला कर रख दिया है. जलप्रलय के बीच एक-एक करके इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं.लेकिन तबाही की ख़ौफ़नाक दास्तान के बीच नेपाल के त्रिशूली का एक मकान चर्चा के केंद्र में आ गया है.
26 अगस्त को जब ग्लेशियर का मलबा लिए तूफ़ानी लहरें आसपास की हर इमारत को मटियामेट कर चुकी थीं तो इस घर में रहने वाले लोगों की सांसें अटकी हुई थीं. लेकिन वो खुशकिस्मत निकले,लहरों के थपेड़े इस मकान को गिराने पर आमादा थे, लेकिन उसकी नींव को हिला नहीं सके, दीवारों को गिरा नहीं सके. अब एनडीटीवी जब इस मकान तक पहुंचा तो चारों तरफ तबाही का अलग ही मंजर देखने को मिला.
जो घर इन लहरों में बच गया, उसकी नींव भी पूरी तरह कमजोर पड़ चुकी है. चारों तरफ सिर्फ कीचड़ ही कीचड़ है. सभी के मन में सवाल है कि आखिर यह मकान इन लहरों के बीच कैसे बच गया.
मजबूत का क्या राज है?
बाढ़ और भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे मकानों को खास तरीके से तैयार किया जाता है. इसमें प्लिंथ (मजबूत बुनियाद), कॉलम (पिलर) और बीम का एक ऐसा ढांचा होता है जो पूरे घर का वजन उठाता है न कि सिर्फ ईंटों की दीवारें.
नेपाल में इसे आमतौर पर 'पिलर वाला घर' कहा जाता है. इस तकनीक में बुनियाद जमीन के काफी भीतर तक मजबूत नींव पर टिकी होती है, जिसके कारण पानी का भारी दबाव और तेज झटके भी इसके कंक्रीट फ्रेम को हिला नहीं पाते. कमजोर और बिना पिलर वाले कच्चे मकान बह गए, लेकिन यह फ्रेम-आधारित मजबूत ढांचा पानी के प्रचंड बहाव के बावजूद अपनी जगह पर जमा रहा.
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