बलूचिस्तान में सूफी दरगाह पर हमला पाक में आईएस के मजबूत होने का संकेत देता है...
इस्लामाबाद:
पुलिस अधिकारियों, तालिबानी सरगनाओं और विश्लेषकों का कहना है कि आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) अब उज़बेक आतंकवादियों को भर्ती कर, असंतुष्ट तालिबानी आतंकियों को अपनी ओर आकर्षित कर और पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा हिंसक सांप्रदायिक गुटों में से एक से साझीदारी कर रहा है.
आईएसआईएस का हालिया कारनामा शनिवार को बलूचिस्तान में एक सूफी दरगाह पर हुआ था, जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए, और 100 अन्य घायल हो गए थे. गुट ने एक बयान में कहा था कि एक फिदायीन हमलावर ने शियाओं को मारने के लिए हमला किया था, और गुट ने हमलावर की तस्वीर भी जारी की थी.
पिछले महीने बलूचिस्तान की पुलिस अकादमी पर हुए आतंकवादी हमले के बाद आईएसआईएस ने जब एक हमलावर की तस्वीर जारी की थी, तब तालिबान के दो 'अधिकारियों' ने एसोसिएटेड प्रेस से कहा था कि हमलावर उज़बेक था, और पूरी संभावना है कि वह इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़बेकिस्तान (आईएमयू) का सदस्य हो. 26 अक्टूबर को हुए इस हमले में 60 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें ज़्यादातर पुलिस के नए रंगरूट थे.
तालिबान के आईएमयू से भलीभांति परिचित 'अधिकारियों' ने यह जानकारी नाम न छापे जाने की शर्त पर दी, क्योंकि उनके नेतृत्व ने उन्हें मीडिया से बात करने के लिए प्रतिबंधित कर दिया है.
अधिकारियों ने शुरुआत में कहा था कि पुलिस अकादमी पर हुआ हमला आफगानिस्तान में छिपे आतंकवादियों ने किया था, और इसके लिए पाकिस्तान का शिया-विरोधी लश्कर-ए-झांगवी गुट ज़िम्मेदार है, लेकिन बाद में आईएसआईएस ने इस की ज़िम्मेदारी ले ली, और लश्कर-ए-झांगवी प्रवक्ता अली बिन सूफियान ने कहा कि उन्होंने यह हमला आईएसआईएस के साथ मिलकर किया था.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आईएसआईएस ने अपना नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासन रखा है, जो इस इलाके का प्राचीन भौगोलिक नाम रहा है, जिसमें तुर्कमेनिस्तान से लेकर ईरान और अफगानिस्तान तक के इलाके आ जाते हैं.
इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासन ने अपना प्रमुख अड्डा अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में बनाया है, और उसने आईएसआईएस के प्रति निष्ठा जताई है, लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि दोनों संगठनों के बीच सीधे आर्थिक और संचालन संबंधी रिश्ते हैं या नहीं.
पुलिस, अफगान अधिकारियों तथा आईएसआईएस के मीडिया आउटलेटों के मुताबिक, अफगानिस्तान में लड़ रहे ज़्यादातर आईएसआईएस लड़ाके पाकिस्तानी नागरिक हैं, और उनमें से भी ज़्यादातर कबीलाई इलाकों के रहने वाले हैं. उधर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान के असंतुष्ट लड़ाके भी विदेशी लड़ाकों के साथ मिल गए हैं, जो ज़्यादातर मध्य एशिया से हैं. जुलाई में ड्रोन हमले में मारे जाने से पहले तक हफीज़ सईद खान इस गुट का नेता था, जो पहले पाकिस्तानी तालिबान कमांडर रहा था. आईएसआईएस ने कभी खान की मौत होना कबूल नहीं किया, लेकिन अफगान तथा अमेरिकी फौजें उसकी पुष्टि कर चुकी हैं.
पाकिस्तान में आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आईएसआईएस ने सोशल मीडिया के ज़रिये स्थानीय आतंकवादियों तक पहुंच बनाना शुरू कर दिया है. दक्षिणी शहर कराची में तैनात काउंटर-टेररिज़्म कमांडर जुनैद शेख ने कहा, "वे सोशल मीडिया पर ज़ोरदार प्रचार कर मिलती-जुलती सोच वाले पाकिस्तानी युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं..."
आईएसआईएस का हालिया कारनामा शनिवार को बलूचिस्तान में एक सूफी दरगाह पर हुआ था, जिसमें कम से कम 50 लोग मारे गए, और 100 अन्य घायल हो गए थे. गुट ने एक बयान में कहा था कि एक फिदायीन हमलावर ने शियाओं को मारने के लिए हमला किया था, और गुट ने हमलावर की तस्वीर भी जारी की थी.
पिछले महीने बलूचिस्तान की पुलिस अकादमी पर हुए आतंकवादी हमले के बाद आईएसआईएस ने जब एक हमलावर की तस्वीर जारी की थी, तब तालिबान के दो 'अधिकारियों' ने एसोसिएटेड प्रेस से कहा था कि हमलावर उज़बेक था, और पूरी संभावना है कि वह इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़बेकिस्तान (आईएमयू) का सदस्य हो. 26 अक्टूबर को हुए इस हमले में 60 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें ज़्यादातर पुलिस के नए रंगरूट थे.
तालिबान के आईएमयू से भलीभांति परिचित 'अधिकारियों' ने यह जानकारी नाम न छापे जाने की शर्त पर दी, क्योंकि उनके नेतृत्व ने उन्हें मीडिया से बात करने के लिए प्रतिबंधित कर दिया है.
अधिकारियों ने शुरुआत में कहा था कि पुलिस अकादमी पर हुआ हमला आफगानिस्तान में छिपे आतंकवादियों ने किया था, और इसके लिए पाकिस्तान का शिया-विरोधी लश्कर-ए-झांगवी गुट ज़िम्मेदार है, लेकिन बाद में आईएसआईएस ने इस की ज़िम्मेदारी ले ली, और लश्कर-ए-झांगवी प्रवक्ता अली बिन सूफियान ने कहा कि उन्होंने यह हमला आईएसआईएस के साथ मिलकर किया था.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में आईएसआईएस ने अपना नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासन रखा है, जो इस इलाके का प्राचीन भौगोलिक नाम रहा है, जिसमें तुर्कमेनिस्तान से लेकर ईरान और अफगानिस्तान तक के इलाके आ जाते हैं.
इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासन ने अपना प्रमुख अड्डा अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत में बनाया है, और उसने आईएसआईएस के प्रति निष्ठा जताई है, लेकिन फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि दोनों संगठनों के बीच सीधे आर्थिक और संचालन संबंधी रिश्ते हैं या नहीं.
पुलिस, अफगान अधिकारियों तथा आईएसआईएस के मीडिया आउटलेटों के मुताबिक, अफगानिस्तान में लड़ रहे ज़्यादातर आईएसआईएस लड़ाके पाकिस्तानी नागरिक हैं, और उनमें से भी ज़्यादातर कबीलाई इलाकों के रहने वाले हैं. उधर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान के असंतुष्ट लड़ाके भी विदेशी लड़ाकों के साथ मिल गए हैं, जो ज़्यादातर मध्य एशिया से हैं. जुलाई में ड्रोन हमले में मारे जाने से पहले तक हफीज़ सईद खान इस गुट का नेता था, जो पहले पाकिस्तानी तालिबान कमांडर रहा था. आईएसआईएस ने कभी खान की मौत होना कबूल नहीं किया, लेकिन अफगान तथा अमेरिकी फौजें उसकी पुष्टि कर चुकी हैं.
पाकिस्तान में आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आईएसआईएस ने सोशल मीडिया के ज़रिये स्थानीय आतंकवादियों तक पहुंच बनाना शुरू कर दिया है. दक्षिणी शहर कराची में तैनात काउंटर-टेररिज़्म कमांडर जुनैद शेख ने कहा, "वे सोशल मीडिया पर ज़ोरदार प्रचार कर मिलती-जुलती सोच वाले पाकिस्तानी युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं..."
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