- अमेरिका के चिहुआहुआन रेगिस्तान में 119 गुफाओं का नेटवर्क स्थित है जो चूना-पत्थर की चट्टानों के घुलने से बना है
- अंधेर गुफाओं में ऐसे साइनोबैक्टीरिया मिलते हैं जिनको जिंदा रहने के लिए रोशनी की जरूरत होती है
- इन साइनोबैक्टीरिया में ऐसे क्लोरोफिल होते हैं जो इंसानी आंखों से नजर न आने वाले नियर-इन्फ्रारेड लाइट सोखते हैं
अमेरिका के राज्य न्यू मैक्सिको में चिहुआहुआन रेगिस्तान की गहरी और पथरीली घाटियों के नीचे 119 गुफाओं का एक नेटवर्क है. ये गुफाएं करोड़ों साल पहले सल्फ्यूरिक एसिड के कारण चूना-पत्थर की चट्टानों के घुलने से बनी थीं. यह गुफाएं कार्लस्बैड कैवर्न्स नेशनल पार्क का हिस्सा हैं और लोग यहां घूमने आते हैं. वैसे तो हर साल लगभग 3.5 लाख लोग कार्लस्बैड गुफा देखने आते हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर लोगों को यह बिल्कुल नहीं पता होता है कि यह गुफा पिछले दशक की सबसे हैरान करने वाली वैज्ञानिक खोजों में से एक का केंद्र रही है. इस गुफा के हद से अधिक घुप अंधेरे में भी ऐसे जीव रहते हैं जिनको जिंदा रहने के लिए रोशनी की जरूरत होती. कमाल की बात है कि यह वही रोशनी थी जो हमारी गैलेक्सी में सबसे आम तरह के तारे- 'रेड ड्वार्फ' तारों से निकलती है.
गुफा में घुप अंधेरा लेकिन जिंदा थे साइनोबैक्टीरिया
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जब गुफाओं की बायोलॉजिस्ट हेजल बार्टन इन गुफाओं के घने अंधेरे में गईं, तो उन्हें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि उन्हें ऐसे जीव मिलेंगे जो रोशनी से इनर्जी हासिल करते हैं. अंधेरे में भी फोटोसिंथेसिस यानी प्रकाश-संश्लेषण होने की इस नई जानकारी से उन्हें एहसास हुआ कि ब्रह्मांड में ऐसी जगहों पर भी जीवन हो सकता है, जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था.

पथरीली घाटियों के नीचे है 119 गुफाओं का एक नेटवर्क (फोटो- लार्स बेहरेंड्ट)
20 से ज्यादा सालों से, बार्टन जमीन के बहुत नीचे पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों का अध्ययन कर रहे हैं. 2018 में जब वह उप्साला यूनिवर्सिटी के एक सूक्ष्मजीवविज्ञानी लार्स बेहरेंड्ट के साथ इन गुफाओं के बहुत अंदर तक गईं तो इसके बाद जो हुआ, वह उसके लिए भी हैरानी की बात थी.
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार बार्टन ने बताया, "हम गुफा में और अंदर जाते गए. आखिरकरा हम ऐसी जगह पहुंच गए जहां बिना फ्लैशलाइट के कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. अपने चेहरे के सामने हाथ देखने के लिए भी हमें हेडलाइट का इस्तेमाल करना पड़ा, फिर भी दीवार पर हरा रंग साफ दिख रहा था."
काम की बात- पौधे क्लोरोफिल नाम के केमिकल की वजह से हरे होते हैं, जो रोशनी की इनर्जी को सोखता है. फोटोसिंथेसिस में, इस इनर्जी का इस्तेमाल कार्बन डाइऑक्साइड और पानी को ग्लूकोज और ऑक्सीजन में बदलने के लिए किया जाता है. सायनोबैक्टीरिया में भी यह प्रक्रिया काफी हद तक वैसी ही होती है. लेकिन यहां, गुफा में सूरज की रोशनी नहीं थी.

अंधेरे में डूबे गुफाओं की दीवारों पर साइनोबैक्टीरिया (फोटो- लार्स बेहरेंड्ट)
बिना रोशनी कैसे जिंदा थे साइनोबैक्टीरिया?
रिपोर्ट के अनुसार पता चला है कि गुफा में मौजूद ये साइनोबैक्टीरिया में क्लोरोफिल का एक खास वर्जन होता है, जो नियर-इन्फ्रारेड लाइट को सोख सकता है. इस लाइट की वेवलेंथ विजिबल लाइट से ज्यादा होती है और यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर इन्फ्रारेड से ठीक पहले आती है. इसे इंसानी आंखों से नहीं देखा जा सकता. भले इंसानी आंखों से दिखाई देने वाली रोशनी गुफाओं में सिर्फ कुछ सौ फीट तक ही जा सकती है, लेकिन लाइमस्टोन (चूना-पत्थर) की चट्टानों के रिफ्लेक्टिव नेचर की वजह से नियर-इन्फ्रारेड रोशनी काफी दूर तक जा सकती है. बार्टन कहते हैं, "जिस लाइमस्टोन चट्टान से गुफा बनी है, वह दिखाई देने वाली लगभग सारी रोशनी को सोख लेती है, लेकिन नियर-इन्फ्रारेड रोशनी के लिए गुफाएं किसी शीशमहल जैसी होती हैं"
बेहरेंड्ट कहते हैं, "हमने दिखाया कि वे न सिर्फ वहाँ नीचे रहते हैं, बल्कि पूरी तरह से सुरक्षित माहौल में फोटोसिंथेसिस भी करते हैं, जहां शायद 49 मिलियन सालों से उन्हें किसी ने छेड़ा तक नहीं है."
(इनपुट- बीबीसी)
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