विज्ञापन

ईरान-यूक्रेन से लेकर ट्रेड डील तक... मिड टर्म चुनाव में हार, अब क्या-क्या खामियाजा भुगत सकती है ट्रंप सरकार?

कांग्रेस के दोनों सदनों में विपक्ष का नियंत्रण के बाद ट्रंप के लिए बड़े कानून पास कराना, बजट मंजूर कराना और अपने प्रमुख एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है. उनकी सरकार को ज्यादा जांच-पड़ताल, संसदीय सुनवाई और फंडिंग संबंधी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है.

फाइल फोटो
NDTV

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके के बाद अब ट्रंप सरकार की ताकत पहले की तरह नहीं रह जाएगी. दोनों सदनों में बहुमत से चूकने के बाद ऐसा नहीं है कि ट्रंप अचानक शक्तिहीन हो जाएंगे, लेकिन उनकी सरकार के लिए आगे का रास्ता निश्चित रूप से मुश्किल हो सकता है. अमेरिकी राजनीति में ऐसी स्थिति को 'डिवाइडेड गवर्नमेंट' कहा जाता है, जब कांग्रेस अलग-अलग पार्टियों के नियंत्रण में हों.

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी एक रिसर्च के मुताबिक, 'डिवाइडेड गवर्नमेंट' की स्थिति में जरूरी कानून पास होने की संभावना लगभग 30% कम हो जाती है. राष्ट्रपति की बड़ी कोशिशों के फेल होने की दर 45% बढ़ जाती है, 75% तक बड़े नेशनल मुद्दे अटके रहते हैं और व्हाइट हाउस में कांग्रेस की जांच दोगुनी या तिगुनी हो जाती है. यही वजह है कि मिडटर्म चुनावों के नतीजे किसी भी राष्ट्रपति की राजनीतिक ताकत को प्रभावित करते हैं, भले ही उनका पद सुरक्षित रहे.

दरअसल, कांग्रेस अमेरिकी शासन व्यवस्था में कानून बनाने और सरकारी खर्चों को मंजूरी देने वाली संस्था है. यदि विपक्षी दल कांग्रेस पर नियंत्रण हासिल कर लेता है तो ट्रंप के कई बड़े एजेंडे, चाहे वे टैक्स, व्यापार, आव्रजन या घरेलू नीतियों से जुड़े हों, उन्हें संसद में विरोध का सामना करना पड़ सकता है. विपक्ष कई प्रस्तावों को रोक सकता है, उनमें बदलाव की मांग कर सकता है या उन्हें लंबे समय तक लटका सकता है.

अब भी ट्रंप के हाथ में कुछ ताकत बची है, क्या कोई भी प्लान है?

भले ही ट्रंप ने दोनों सदनों में बहुमत खो दिया है लेकिन उनके पास राष्ट्रपति के रूप में कई अहम संवैधानिक शक्तियां बनी रहेंगी. वह कार्यकारी आदेश जारी कर सकते हैं, सेना के सर्वोच्च कमांडर बने रहेंगे, विदेश नीति पर उनका बड़ा प्रभाव रहेगा और कांग्रेस द्वारा पारित किसी विधेयक पर वीटो भी लगा सकते हैं. खुद ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि ऐसी स्थिति में वह 'मिस्टर वीटो' की भूमिका निभाएंगे.

व्हाइट हाउस भी लंबे समय से इस संभावना की तैयारी करता रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप टीम ने ऐसे विकल्पों पर काम किया है जिनके जरिए कांग्रेस के सहयोग के बिना भी राष्ट्रपति अपने एजेंडे के कुछ हिस्सों को कार्यकारी शक्तियों के माध्यम से आगे बढ़ा सकें. इसके साथ ही प्रशासन को संभावित संसदीय जांच, समन और दस्तावेज मांगने जैसी कार्रवाइयों से निपटने की रणनीति पर भी ब्रीफिंग दी गई है.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील समेत कई मुद्दों पर आ सकती है अड़चन

विदेश नीति के मोर्चे पर भी चुनौतियां बढ़ सकती हैं. भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता, मध्य पूर्व में इजरायल के समर्थन और ईरान से जुड़े मामलों पर कांग्रेस का रुख महत्वपूर्ण हो सकता है. खासतौर पर यदि किसी नीति के लिए अतिरिक्त फंडिंग या विधायी मंजूरी की आवश्यकता हो, तो विपक्षी बहुमत व्हाइट हाउस पर दबाव बना सकता है. ऐसे में ट्रंप को अपने कई फैसलों के लिए राजनीतिक समझौते और बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ सकता है.

नियुक्तियों के मोर्चे पर भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं. कैबिनेट पदों, संघीय एजेंसियों और न्यायपालिका में अहम नियुक्तियों पर अधिक जांच-पड़ताल हो सकती है. विपक्षी सांसद सुनवाई के दौरान प्रशासन पर दबाव बढ़ा सकते हैं और कई फैसलों पर जवाबदेही तय करने की कोशिश कर सकते हैं.

अगर ट्रंप के खिलाफ महाभियोग लाया गया तो क्या होगा?

मिडटर्म चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा महाभियोग यानी इम्पीचमेंट को लेकर हो सकती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति तुरंत पद से हट जाएंगे. अमेरिका में महाभियोग की प्रक्रिया दो चरणों में होती है.

पहला चरण में प्रतिनिधि सभा यानी निचले सदन में प्रस्ताव लाया जाता है. महाभियोग प्रस्ताव सबसे पहले प्रतिनिधि सभा में लाया जाता है. यदि साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो राष्ट्रपति आधिकारिक रूप से 'इम्पीच' हो जाते हैं. इसके बाद मामला सीनेट में जाता है, जहां ट्रायल चलता है. राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. यही सबसे बड़ी चुनौती होती है. यदि विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या नहीं है या कुछ सांसद समर्थन नहीं करते, तो महाभियोग पारित होने के बावजूद राष्ट्रपति पद पर बने रह सकते हैं.

क्या ट्रंप की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है?

सैद्धांतिक रूप से हां, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह आसान नहीं है. केवल प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पास होना राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं होता. अंतिम फैसला सीनेट में होता है और वहां दो-तिहाई समर्थन जुटाना बेहद कठिन माना जाता है.

यह भी पढ़ें: क्या ट्रंप को महंगाई मार गई? Gen-Z के गुस्से ने भी ठोक दी ताबूत में कील, एक्सपर्ट ने समझाए असल कारण

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Donald Trump, Midterm Election
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com