- अमेरिका ने ईरान को तीन बार अल्टीमेटम दिया, जिसमें 48 घंटे से लेकर 10 दिनों तक की समय सीमा बढ़ाई गई है
- ट्रंप ने ईरान से बातचीत और गिफ्ट मिलने का दावा किया, लेकिन ईरान ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है
- ईरान ने अमेरिकी दावों का जवाब मिसाइल और ड्रोन हमलों से दिया और अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी है
मिडिल ईस्ट में जारी जंग अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है. एक तरफ जहां अमेरिका-इजरायल ईरान पर हमले कर रहा है, वहीं ईरान भी मुंहतोड़ जवाब दे रहा है. इस पूरे युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका काफी कन्फ्यूजन वाली दिख रही है. कहा भी जाता है कि युद्ध मैदान में बाद में लड़े जाते हैं, पहले वे लोगों के दिमाग यानी परसेप्सन (Perception) में जीते या हारे जाते हैं. फिलहाल इस मोर्चे पर सुपरपावर अमेरिका बैकफुट पर नजर आ रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कभी 48 घंटे, कभी 5 दिन और अब 10 दिन के बढ़ते अल्टीमेटम ने दुनिया को उलझा दिया है. एक तरफ ट्रंप इसे 'सकारात्मक बातचीत' और ईरान का 'गिफ्ट' बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ तेहरान किसी भी समझौते से साफ इनकार कर रहा है. क्या यह ट्रंप की कोई सोची-समझी रणनीति है या फिर अमेरिका अपनी ही धमक खोता जा रहा है? आइए समझते हैं.
बार-बार बदल रहे ट्रंप के अल्टीमेटम
खुद को सुपर पावर समझने वाला अमेरिका इस युद्ध में बार-बार अपने अल्टीमेटम ही बदल दे रहा है. बीते कुछ दिनों में व्हाइट हाउस की डेडलाइन रबर की तरह खिंचती नजर आई. अब तक ट्रंप तीन बार ईरान को चेतावनी दे चुके हैं.
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- पहला अल्टीमेटम: सबसे पहले 22 मार्च को ट्रंप ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए 48 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दिया. ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स को तबाह कर देगा.
- दूसरा अल्टीमेटम: लेकिन 48 घंटे पूरे होने से पहले ही, ट्रंप ने खुद इस हमले को 5 दिन के लिए टालने की घोषणा कर दी. ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बहुत अच्छी और प्रोडक्टिव बातचीत की है.
- तीसरा अल्टीमेटम: हैरानी तब और बढ़ गई जब इन 5 दिनों को बढ़ाकर 10 दिन कर दिया गया. 26 मार्च को ट्रंप ने कहा कि ईरानी सरकार के अनुरोध पर हमलों को 10 दिन और रोक रहे हैं.

Donald Trump Iran War
हमले करने से हिचक रहा है अमेरिका
कूटनीति में टाइमिंग ही सब कुछ है. बार-बार अल्टीमेटम की मियाद बढ़ाना रणनीतिक धैर्य कम और हिचकिचाहट ज्यादा लग रहा है. ईरान के पावर प्लांट्स उसकी इकॉनमी की रीढ़ हैं. उन्हें 10 दिन की छूट देने का सीधा मतलब है कि अमेरिका ने ईरान को अपनी सुरक्षा चाक-चौबंद करने और जवाबी रणनीति बनाने का पूरा वक्त दे दिया है. वहीं दूसरी ओर दुनिया के सामने यह संदेश जा रहा है कि अमेरिका अब ईरान के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाने से हिचक रहा है.
'गिफ्ट' की थ्योरी और ईरान का जवाब
कूटनीतिक मोर्चे पर अमेरिका की किरकिरी तब और हुई जब बात बैक-चैनल वार्ता की आई. ट्रंप ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से दावा किया कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है और उन्हें ईरान की तरफ से एक 'गिफ्ट' भी मिला है. इस बयान का मकसद शायद अमेरिकी जनता को यह दिखाना था कि उनका अल्टीमेटम काम कर रहा है और ईरान दबाव में झुक रहा है. लेकिन पासा तब उल्टा पड़ गया जब ईरान ने तुरंत और कड़े शब्दों में इस दावे का खंडन कर दिया. ईरान ने स्पष्ट किया कि न तो कोई गुप्त वार्ता हो रही है और न ही कोई 'गिफ्ट' भेजा गया है. इससे दो ही निष्कर्ष निकलते हैं, या तो अमेरिकी प्रशासन बिना किसी ठोस आधार के शांति का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहा है. या फिर अमेरिका और ईरान के बीच संवाद का जो भी तंत्र है, वह पूरी तरह टूट चुका है. ये दोनों ही स्थितियां परसेप्शन के लिहाज से अमेरिका के खिलाफ जाती हैं.

क्या ये स्ट्रैटेजिक मूव है या परसेप्सन की हार?
ट्रंप का स्टाइल हमेशा से ऐसा ही रहा है. वो पहले धमकी देते हैं फिर बातचीत करते हैं. लेकिन इस बार टाइमिंग और कम्युनिकेशन में गड़बड़ साफ दिख रही है. ईरान ने हर दावे को खारिज कर दिया. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा, 'अमेरिका कुछ देशों के जरिए मैसेज भेज रहा है, हम जवाब दे रहे हैं. लेकिन ये बातचीत या नेगोशिएशन नहीं है.' ईरान की ये इनकार की नीति चतुराई भरी है. वो सार्वजनिक तौर पर कमजोर नहीं दिखना चाहता. दूसरी तरफ ट्रंप हर छोटी बातचीत को ही अपनी जीत समझ रहे हैं.

परसेप्सन की लड़ाई क्यों हार रहा है अमेरिका?
सवाल यह भी है कि अगर अमेरिका परसेप्सन की लड़ाई में बैकफुट पर दिख रहा है, तो इसकी वजह क्या है? इसकी पहली वजह तो अमेरिका का बड़बोलापन ही है. ट्रंप बार-बार दावे करते हैं कि उन्होंने ईरान की नेवी और सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया है. लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान अभी भी पूरी ताकत से पलटवार कर रहा है. वो लगातार मिसाइल और ड्रोन से हमले कर रहा है. इसके साथ ही ईरान नैरेटिव की जंग भी अमेरिका को पछाड़ रहा है. ईरान बिना कोई मिसाइल दागे भी परसेप्सन में बढ़त बना रहा है. अमेरिका के बदलते बयान उसे घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत दिखा रहे हैं.
इसके अलावा इजरायल से लेकर सऊदी अरब तक, जो देश सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर देखते हैं, वे भी इस वक्त काफी मुश्किल में दिख रहे हैं. ईरान ने उन देशों में जमकर बमबारी की है, जहां अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं.
होर्मुज बंद होने से ग्लोबल ऑयल प्राइस आसमान छू रहे हैं. इससे पूरी दुनिया में तेल के दाम बढ़ गए हैं. अमेरिका समेत कई देशों के स्टॉक मार्केट में भारी गिरावट हुई है. ऐसे में दुनिया के ऐसे देश जो पारंपरिक रूप से अमेरिका के साथ थे, वो भी उससे अलग दिख रहे हैं. NATO इसका सबसे बड़ा प्रमाण है. वैश्विक समीकरणों को ध्यान से समझा जाए तो अमेरिका कहीं ना कहीं अकेला नजर आ रहा है. इधर ईरान किसी भी कीमत पर अमेरिका के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं है. एक्सपर्ट्स की मानें तो या तो ये जंग ईरान की शर्तों पर बंद होगी या फिर ये अभी और लंबी खिंचेगी.
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नैरिटिव वॉर में ईरान आगे
मौजूदा हालात में अमेरिका सैन्य रूप से भले ही ईरान से आगे हो, लेकिन 'वॉर ऑफ नैरेटिव' में ईरान बाजी मारता दिख रहा है. ट्रंप की नीतियां, जो कभी उनकी अनप्रेडिक्टेबिलिटी के लिए मशहूर थीं, अब 'असमंजस' में बदलती दिख रही हैं. अल्टीमेटम देकर पीछे हटना और फिर एकतरफा दावों का खंडन होना, अमेरिका की ग्लोबल छवि पर एक बड़ा धब्बा है. अब देखना यह है कि इस 10 दिन के ग्रेस पीरियड के बाद ट्रंप प्रशासन इस परसेप्शन को कैसे पलटता है.
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