- अमेरिका में लोकतंत्र के कई महत्वपूर्ण संकेतक पिछले पचास वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं - रिपोर्ट
- अमेरिका में प्रेस की आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता में गिरावट लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है
- अमेरिका की लोकतांत्रिक कमजोरियों से तानाशाह और कट्टरपंथी नेताओं को बढ़ावा मिला है- रिपोर्ट
अमेरिका में लोकतंत्र की हालत बिगड़ गई है और इस हद तक बिगड़ गई है कि यह अपने आप में रिकॉर्ड है. अमेरिका में लोकतंत्र के रसातल में जाने का असर अब दुनिया के दूसरे देशों पर भी दिखने लगा है. यह हम नहीं कह रहे हैं. एक प्रमुख वैश्विक संस्था ने इसकी चेतावनी दी है और कहा है कि अमेरिका में लोकतंत्र से जुड़े कई संकेतक (इंडिकेटर) 50 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. संस्था का कहना है कि इसका फायदा दुनिया के कट्टरपंथी और तानाशाही सोच वाले नेता उठा रहे हैं. इस रिपोर्ट में बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में हुए आंदोलनों का भी जिक्र है.
यह रिपोर्ट स्टॉकहोम स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्ट्रोरल असिस्टेंस (IDEA) ने जारी की है. मंगलवार को आई इस रिपोर्ट में कहा कि अमेरिका में प्रेस की आजादी से लेकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता तक, लोकतंत्र के कई बड़े संकेतक 50 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. इसका असर पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है.
रिपोर्ट में क्या लिखा है?
IDEA ने कहा कि नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (इंटरनेशनल ऑर्डर) से अमेरिका पीछे हटा है और इससे बहुपक्षीय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कम हुआ है. इससे तानाशाही सोच रखने वाले नेताओं और लोकलुभावन नेताओं का हौसला बढ़ा है. न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार IDEA ने जिन देशों को स्टडी किया है, उनमें से करीब 57 फीसदी देशों में 2020 से 2025 के बीच लोकतंत्र की जुड़े कम से कम एक संकेतक में गिरावट आई. इस स्टडी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, भरोसेमंद चुनाव, बोलने की आजादी और न्याय तक पहुंच जैसे मुद्दों को देखा गया.
IDEA के सेक्रेटरी जनरल केविन कासास-जमोरा कोस्टा रिका के पूर्व उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं. उन्होंने एएफपी से बात करते हुए इस वैश्विक समस्या की शुरुआत के लिए अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा कि बिना शक इस वैश्विक महामारी का ‘पेशेंट जीरो' अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति हैं.
कासास-जमोरा ने कहा कि यह सिलसिला 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी कांग्रेस की इमारत पर ट्रंप समर्थकों के हमले के बाद और तेज हो गया. इसके बाद 8 जनवरी 2023 को ब्रासीलिया में दंगे हुए. उस समय हजारों लोग पूर्व रूढ़िवादी नेता जायर बोल्सोनारो के समर्थक थे. उन्होंने ब्राजील की संसद में घुसकर तोड़फोड़ और लूटपाट की. वे वामपंथी राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप की मांग कर रहे थे. यह घटना लूला दा सिल्वा के राष्ट्रपति पद संभालने के करीब एक हफ्ते बाद हुई थी.
IDEA के प्रमुख ने यह भी कहा कि अमेरिका की विदेशी सहायता एजेंसी USAID को कमजोर करने और आखिरकार बंद करने के लिए अमेरिका में दिए गए तर्कों का इस्तेमाल सर्बिया की सरकार ने भी किया. वहां सरकार ने इन्हीं तर्कों के आधार पर नागरिक संगठनों पर कार्रवाई की.
रिपोर्ट में बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका को लेकर क्या कहा गया?
IDEA की रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बदलावों का जिक्र भी किया गया है. जैसे ऑस्ट्रेलिया में, जहां नस्लवाद-विरोधी रणनीति और बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी जैसे मुद्दों पर सिविल सोसाइटी ग्रुप्स से सलाह ली गई. इसी तरह सीरिया में, जहां बशर अल-असद की दमनकारी तानाशाही को उखाड़ फेंका गया. इसमें बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में युवाओं के नेतृत्व में हुए बड़े आंदोलनों का भी जिक्र है, जिसने लंबे समय से सत्ता में रहे नेताओं को हटा दिया. लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम समय में दूरगामी और सार्थक सुधार करना मुश्किल साबित हुआ है.
यह भी पढ़ें: ट्रंप का फिर वसूली वाला फरमान- होर्मुज में सुरक्षा देने के लिए सभी देश मुझे पैसा दें
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं