अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दो दिवसीय शिखर बैठक के लिए बुधवार को बीजिंग पहुंच गए. इस दौरे पर वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी बेहद अहम बैठक करने वाले हैं. इस बैठक पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं.
ट्रंप के बीजिंग पहुंचते ही ये पिछले 9 साल में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा होगा. ट्रंप ने अपना पिछला चीन दौरा 2017 में किया था. बीजिंग पहुंचते ही उनका स्वागत उपराष्ट्रपति हान झेंग ने किया. हान झेंग चीन में आला दर्जे के नेता है. उनकी वरीयता के देखते हुए, ऐसा माना जा रहा है कि चीन ट्रंप की स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है. ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रंप के पिछले दौरे के दौरान कनिष्ठ स्तर के नेता स्टेट काउंसलर यांग जिएची को स्वागत के लिए भेजा गया था.

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लेकिन इस दौरे की असली कहानी स्वागत समारोह, भोज या फोटो-ऑप से कहीं आगे जाती है. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और दो सबसे ताकतवर नेताओं की इस मुलाकात में आखिर क्या-क्या दांव पर लगा है?
यह मुलाकात ऐसे वक्त हो रही है जब अमेरिका महीनों से मध्य पूर्व में ईरान को लेकर तनाव में उलझा हुआ है. दूसरी तरफ चीन लगातार खुद को एक ऐसे खिलाड़ी के तौर पर पेश कर रहा है जो पर्दे के पीछे बातचीत करवा सकता है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रंप और शी जिनपिंग क्या बात करेंगे, बल्कि यह भी है कि दोनों एक-दूसरे से क्या हासिल करना चाहते हैं और बदले में क्या छोड़ने को तैयार हो सकते हैं.
क्या यह एक सामान्य दौरा है?
ऊपरी तौर पर देखें तो ट्रंप इस यात्रा को व्यापार केंद्रित बताना चाहते हैं. चीन रवाना होने से पहले उन्होंने कहा कि वह शी जिनपिंग से अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन का बाजार खोलने की मांग करेंगे. लेकिन असल तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है.
विदेश मामलों के जानकार रॉबिन्द्र सचदेव कहते हैं कि इस मुलाकात का पहला और सबसे बड़ा मुद्दा व्यापार ही है. उनके मुताबिक अगर ट्रंप चीन के साथ ट्रेड डील और अमेरिकी निर्यात को बेहतर कर लेते हैं, तो वह घरेलू राजनीति में भी इसे बड़ी उपलब्धि की तरह पेश कर सकेंगे.

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लेकिन चीन भी खाली हाथ नहीं बैठा है. उसका एजेंडा '3 T's' के इर्द-गिर्द घूमता है. ये हैं Tariff, Taiwan और Technology. बीजिंग चाहता है कि अमेरिका टैरिफ में राहत दे, ताइवान को लेकर अपने रुख में नरमी दिखाए, एआई और चिप टेक्नोलॉजी पर लगी पाबंदियों को कम करे.
ईरान युद्ध क्यों बना चीन के लिए सिरदर्द?
ईरान में जारी संघर्ष अब तीसरे महीने में पहुंच चुका है. चीन सार्वजनिक तौर पर बहुत आक्रामक बयानबाजी नहीं कर रहा, लेकिन पर्दे के पीछे उसकी सक्रियता बढ़ी है. मार्च में बीजिंग और इस्लामाबाद ने मिलकर एक पांच सूत्री योजना पेश की थी, जिसका मकसद युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना था.
दरअसल चीन के लिए यह युद्ध सिर्फ कूटनीतिक मसला नहीं, आर्थिक चुनौती भी है. चीन की अर्थव्यवस्था पहले से धीमी वृद्धि और बेरोजगारी से जूझ रही है. ऊपर से तेल की कीमतों में उछाल ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है. पेट्रोकेमिकल आधारित उद्योगों से लेकर कपड़ा और प्लास्टिक तक, कई सेक्टर दबाव में हैं.
हालांकि चीन के पास बड़े तेल भंडार हैं और इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा में उसकी मजबूत स्थिति उसे कुछ राहत देती है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था निर्यात पर टिकी है. लंबे युद्ध से वैश्विक व्यापार प्रभावित होता है और इसका असर सीधे चीन पर पड़ता है. यही वजह है कि बीजिंग युद्ध खत्म करवाने में दिलचस्पी दिखा रहा है.
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर चीन अमेरिका की मदद करता है और ईरान पर दबाव डालता है, तो बदले में वह क्या चाहेगा?

क्या ईरान और ताइवान के बीच कोई 'ग्रैंड बार्गेन' हो सकता है?
रॉबिन्द्र सचदेव का मानना है कि बंद कमरे में होने वाली बातचीत सार्वजनिक बयानों से बिल्कुल अलग हो सकती है. उनके मुताबिक दोनों देश एक तरह की 'ग्रैंड बार्गेन' की कोशिश कर सकते हैं.
यानी चीन ईरान पर दबाव बनाए कि वह तनाव कम करे, जबकि अमेरिका ताइवान को लेकर अपने सैन्य समर्थन की गति धीमी करे या कुछ मामलों में नरमी दिखाए. सचदेव कहते हैं कि दोनों देश अपने-अपने सहयोगियों को 'थ्रो अंडर द बस' करने जैसी रणनीति पर भी सोच सकते हैं.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका अचानक ताइवान से दूरी बना लेगा. ताइवान अमेरिका के लिए सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम हिस्सा है. अमेरिका लंबे समय से ताइवान को हथियार देता रहा है और चीन इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है.
ताइवान क्यों होगा असहज?
इस पूरी बातचीत में सबसे ज्यादा बेचैनी शायद ताइवान में होगी. क्योंकि अगर अमेरिका और चीन किसी बड़े समझौते की तरफ बढ़ते हैं, तो ताइवान को यह डर सताएगा कि कहीं उसकी सुरक्षा को सौदेबाजी का हिस्सा न बना दिया जाए.
रॉबिन्द्र सचदेव बताते हैं, "ताइवान के लिए यह चिंता की बात जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका रातोंरात उसका समर्थन बंद कर देगा. अमेरिका के लिए ताइवान चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का एक रणनीतिक केंद्र बना रहेगा.फिर भी, अगर ट्रंप प्रशासन चीन के साथ रिश्ते सुधारने को प्राथमिकता देता है, तो ताइवान को लेकर कुछ फैसलों में देरी या नरमी देखने को मिल सकती है. यही संभावना ताइवान को असहज कर रही है."
यानी अमेरिका कह सकता है कि चीन ईरान पर दबाव बनाए, जबकि चीन बदले में टेक्नोलॉजी प्रतिबंधों में ढील, टैरिफ राहत और ताइवान को लेकर नरमी की उम्मीद कर सकता है.
इसीलिए यह मुलाकात सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं मानी जा रही. इसका असर वैश्विक व्यापार, एआई टेक्नोलॉजी, चिप बाजार, मध्य पूर्व की राजनीति और एशिया की सुरक्षा व्यवस्था तक पर पड़ सकता है.
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