Opinion: ट्रंप को अचानक जिनपिंग की याद क्यों आई, चीन दौरे का आखिर क्या निकलेगा नतीजा?

ट्रंप की यह यात्रा उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकती. ईरान के साथ उनका युद्ध उनके लिए एक नाकामी साबित हुआ है. उन्हें लगा था कि वे ईरान को झुकाकर चीन जाएंगे, लेकिन इसके उलट ईरान और सख्त हो गया है.

Opinion: ट्रंप को अचानक जिनपिंग की याद क्यों आई, चीन दौरे का आखिर क्या निकलेगा नतीजा?
सवाल यह है कि ट्रंप अपनी यात्रा को सफल बनाने के लिए चीन को कितनी छूट देंगे और इसका भारत के भू-राजनीतिक हितों पर क्या असर पड़ेगा.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा के नतीजों पर दुनिया के कई देशों की दिलचस्पी है. इस बात की संभावना कम है कि इस दौरे से कोई बड़े या टिकाऊ नतीजे निकलेंगे, हालांकि दोनों पक्षों ने पहले से तैयारी की होगी ताकि कुछ सकारात्मक नतीजों का ऐलान किया जा सके.

अपनी बेतरतीब और सनकी नीतियों के साथ-साथ वैश्विक व्यवस्था में खलल डालकर ट्रंप ने अमेरिका के इमेज को गहरा जख्म दिया है. इससे दुनियाभर देश की साख को नुकसान पहुंचा है. अमेरिका अब सहयोगियों और दोस्तों की नजर एक भरोसेमंद साथी नहीं रह गया है.

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विदेशी संबंधों के प्रति 'लेन-देन' वाला रवैया आपसी भरोसा पैदा नहीं करता, क्योंकि सौदेबाजी थोड़े वक्त के फायदे पर आधारित होती है. ये लंबी अवधि के रणनीतिक निवेश जैसे नहीं होते हैं. ट्रंप के फैसले से दुनिया ने देखा है कि वे खुद से किए समझौते को भी खुद ही तोड़ देते हैं. इसके अलावा, किसी भी डील में वे हमेशा 'अकेले विजेता' बनकर उभरना चाहते हैं, जिसका मतलब है कि वे सिर्फ अपने फायदे वाले सौदे चाहते हैं.

ट्रंप अपने रास्ते में आने वाले अमेरिकी संवैधानिक चेक-एंड-बैलेंस का उल्लंघन करते हैं और अपना काम निकालने के लिए घरेलू कानूनों को दरकिनार कर देते हैं. यही वह मानसिकता है जिसके कारण वे अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह नहीं करते है. वेनेजुएला के मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष को अगवा करना, ईरान के खिलाफ युद्ध, क्यूबा की घेराबंदी और वहां सत्ता बदलने की खुली धमकियां दिखाती हैं कि उनकी विदेश नीति सिर्फ ताकत के प्रदर्शन पर टिकी है. उनकी विदेश नीति में कूटनीति की तहजीब या सिद्धांतों की कोई जगह नहीं है.

चीन में ट्रंप क्या कर सकते हैं? 

ट्रंप भले ही राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने निजी रिश्तों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और चीनी नेता की जमकर तारीफ करते हैं जो कि उनके रसूख दिखाने वाले अंदाज़ का हिस्सा है लेकिन संजीदा और ठंडे दिमाग से हिसाब-किताब करने वाले चीनी नेता इन बातों से धोखा नहीं खाएंगे.

अहम बात यह है कि अमेरिका अब खुलकर चीन को टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अपना प्रतिद्वंद्वी मान रहा है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मामले में. अमेरिका की योजना धीरे-धीरे उन अहम तकनीकों और कच्चे माल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की है, जिन पर आज चीन का लगभग एकाधिकार है, ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके.

अमेरिका ने चीन पर कई इल्जाम लगाए हैं. इनमें रूस और ईरान को सैन्य मदद देना शामिल है. उसने चीन को पाबंदियों की धमकी दी है. लेकिन चीन ने भी ईंट का जवाब पत्थर से दिया है. यानी अगर अमेरिका ने चीन को उन्नत तकनीक, खासकर हाई-टेक चिप्स देने से मना किया है, तो चीन ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए ईवी बैटरी में इस्तेमाल होने वाले ग्रेफाइट और गैलियम, जर्मेनियम जैसे खनिजों के निर्यात पर रोक लगा दी है, जो सैन्य उपकरणों और सेमीकंडक्टर्स में बेहद जरूरी होते हैं.

इसके जवाब में अमेरिका का कहना है कि ये पाबंदियां सप्लाई चेन को चीन से दूर ले जाने और जोखिम कम करने की अहमियत को दर्शाती हैं. ट्रंप के दौरे से ठीक पहले, अमेरिका ने ईरानी तेल आयात करने वाली चीन की छोटी रिफाइनरियों पर पाबंदी लगा दी है. इसके जवाब में चीन ने अपनी कंपनियों को बचाने के लिए अपने घरेलू कानूनों का सहारा लिया है.

अमेरिका ने पनामा नहर  और होर्मुज के बाहर नाकेबंदी कर चीन के रणनीतिक और आर्थिक हितों को काफी चोट पहुंचाई है. अमेरिका का मानना है कि चीन को अपने बैंकों पर पाबंदी लगने का खौफ है. जो सच भी हो सकता है क्योंकि चीनी अर्थव्यवस्था निर्यात पर बहुत ज्यादा टिकी है. चीन कुछ समय के लिए नरम पड़ सकता है, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट गहरी और वास्तविक है.

अमेरिका के आत्मघाती रवैया

आम राय यह है कि अमेरिका ने यूरोप और अन्य जगहों पर अपने सहयोगियों को नाराज करके खुद का ही नुकसान किया है. ईरान के खिलाफ युद्ध को निर्णायक रूप से न जीत पाना और पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों को ईरानी हमलों से न बचा पाना, अमेरिका की भूमिका पर सवाल खड़े करता है. अमेरिकी हथियारों की प्रभावशीलता और युद्ध के नए तरीकों से निपटने की उसकी क्षमता सवाल उठे हैं. इसके बाद 'ग्लोबल चौधरी' बनने की उसकी साख पर सवाल उठे हैं.

चीन को अमेरिका की इन गलतियों और ट्रंप की 'धौंस' वाली नीतियों का सबसे बड़ा फायदा मिलता दिख रहा है. अगर देशों को अब अमेरिका की अनिश्चित नीतियों से खुद को बचाना है, तो उनके लिए चीन, रूस और ब्रिक्स-प्लस (BRICS-plus) जैसे समूहों के साथ करीबी रिश्ते बनाना समझदारी भरा फैसला होगा.

ताइवान का मुद्दा अमेरिका-चीन संबंधों में बेहद संवेदनशील है. चीन ताइवान को हथियारों की सप्लाई के मुद्दे पर अमेरिका से पुख्ता यकीन चाहेगा. वहीं ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया भी इस दौरे पर घबराहट के साथ नजर रखेंगे, क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच होने वाले किसी भी समझौते का उनके आर्थिक और सुरक्षा हितों पर गहरा असर पड़ेगा.

यूरोप भी इस दौरे के नतीजों को गौर से देखेगा. अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों के बीच, यूरोप चीन की तरफ हाथ बढ़ाने के लिए मजबूर हो सकता है, लेकिन यूरोप के खुद के भी चीन के साथ कई मसले हैं. अमेरिका लगातार यूरोप पर दबाव बना रहा है कि वह चीन को आधुनिक तकनीक देने से रोके. इसी खींचतान के बीच यूरोप अपनी भविष्य की रणनीति तय करेगा.

दिग्गज कारोबारियों की टोली क्यों?

खबरें हैं कि ट्रंप के साथ अमेरिका की बड़ी टेक्नोलॉजी और इन्वेस्टमेंट कंपनियों के सीईओ भी चीन जा रहे हैं. इसमें एलन मस्क, टिक कुक, मेटा की दीना पॉवेल मैककॉर्मिक, बोइंग के केली ऑर्टबर्ग, वीजा के रयान मैकिनर्नी और गोल्डमैन सैक्स के डेविड सोलोमन जैसे नाम शामिल हैं. इसका संदेश साफ नहीं है. एक तरफ ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिकी कंपनियां अपने देश में निवेश करें और नौकरियां वापस लाएं, तो दूसरी तरफ वे चीन के साथ मैन्युफैक्चरिंग पार्टनरशिप की बात कैसे कर सकते हैं?

ट्रंप हमेशा से चीन को ज्यादा कृषि उत्पाद (जैसे सोयाबीन, मक्का, मांस आदि) बेचना चाहते हैं ताकि व्यापार घाटा कम हो सके, लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हुए क्योंकि चीन ने अब ब्राजील जैसे अन्य देशों से सामान खरीदना शुरू कर दिया है. 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुए समझौते का हश्र भी सबके सामने है, जहां चीन ने अपने वादे के मुताबिक सामान नहीं खरीदा था.

भारत को रखनी होगी नजर

भारत भी ट्रंप के इस दौरे को बड़ी दिलचस्पी से देखेगा. सवाल यह है कि ट्रंप अपनी यात्रा को सफल बनाने के लिए चीन को कितनी छूट देंगे और इसका भारत के भू-राजनीतिक हितों पर क्या असर पड़ेगा.

भारत ने अमेरिका के साथ रिश्तों में काफी निवेश किया है. 'क्वाड' (Quad) और 'इंडो-पैसिफिक' की रणनीति चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए बनाई गई थी. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि ट्रंप को इस समूह में बहुत कम दिलचस्पी है. इस साल भारत में होने वाले क्वाड शिखर सम्मेलन की संभावना भी कम दिख रही है.

इसके साथ ही, ट्रंप ने भारत के साथ संबंधों में कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो समझ से परे हैं. उन्होंने पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ाई हैं और वहां की भारत-विरोधी ताकतों को बढ़ावा दिया है. यह अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान और चीन की उस दोस्ती को मजबूती देता है जो भारत के खिलाफ है.

क्या यह दौरा नाकाम रहेगा?

ट्रंप की यह यात्रा दो वजहों से उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकती. पहला, ईरान के साथ उनका युद्ध उनके लिए एक नाकामी साबित हुआ है. उन्हें लगा था कि वे ईरान को झुकाकर चीन जाएंगे, लेकिन इसके उलट ईरान और सख्त हो गया है. चीन इस मामले में बहुत संभलकर चल रहा है और वह अमेरिका की खातिर ईरान पर दबाव नहीं बनाएगा.

दूसरा, चीन इस बात को भी ध्यान में रखेगा कि नवंबर में होने वाले चुनाव के बाद ट्रंप की घरेलू स्थिति क्या रहती है. क्या ट्रंप के साथ किसी समझौते में निवेश करना सही होगा? चीन को यह भी पता है कि अमेरिकी संसद और प्रशासन में चीन के खिलाफ काफी गुस्सा है.

(लेखक कंवल सिब्बल विदेश सचिव और तुर्की, मिस्र, फ्रांस और रूस में राजदूत रह चुके हैं. वे वाशिंगटन में डिप्टी चीफ ऑफ मिशन भी रहे हैं.)