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साउथ अफ्रीका में लाठी लेकर विदेशियों को खोज रहे स्थानीय, 25 हजार लोग देश छोड़कर भागे

साउथ अफ्रीका में कट्टरपंथी समूहों ने अवैध प्रवासियों को देश छोड़ने के लिए 30 जून की डेडलाइन दी है. हिंसा, धमकियों और डराने-धमकाने की घटनाओं के बीच आंदोलन को लेकर पुलिस तैनाती की गई है.

साउथ अफ्रीका में लाठी लेकर विदेशियों को खोज रहे स्थानीय, 25 हजार लोग देश छोड़कर भागे
South Africa anti-migrant protests: साउथ अफ्रीका से 25 हजार प्रवासी भागे (फोटो- NDTV)
  • साउथ अफ्रीका में हिंसक एंटी-इमिग्रेशन विरोध प्रदर्शन के बीच 25 हजार प्रवासी देश छोड़कर जा चुके हैं
  • कट्टरपंथी नागरिक समूहों ने अवैध प्रवासियों को आज यानी 30 जून तक देश छोड़ने की चेतावनी दी थी
  • हिंसा, धमकियों और डराने-धमकाने की घटनाओं के बीच पूरे देश में आंदोलन को लेकर पुलिस तैनाती की गई है

क्या किसी देश में सिर्फ विदेशी होने की वजह से हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ सकता है? साउथ अफ्रीका में यही हालात बने हुए हैं. यहां कट्टरपंथी नागरिक समूहों ने अवैध प्रवासियों को आज यानी 30 जून तक देश छोड़ने की चेतावनी दी थी. डेडलाइन खत्म होने से पहले ही 25 हजार लोग देश छोड़कर जा चुके हैं. हिंसा में कई लोगों की जान जा चुकी है, जबकि हजारों लोग डर के कारण राहत शिविरों में रह रहे हैं. डेडलाइन को देखते हुए भारी पुलिसबल को तैनात किया गया है. सवाल है कि आखिर यह विरोध इतना उग्र क्यों हो गया? इसके पीछे सिर्फ अवैध प्रवासियों को बाहर करने की कोशिश वजह है या असली फैक्टर बेरोजगारी, अपराध और राजनीति का मेल है? आइए जानते हैं पूरी कहानी.

अब तक क्या हुआ है?

साउथ अफ्रीका से प्रवासी पलायन कर रहे हैं और यहां तक कि उनकी हत्या भी हुई है. हालिया अशांति में मोजाम्बिक के दो नागरिकों और मलावी के एक नागरिक की हत्या कर दी गई. पुलिस हत्या की जांच कर रही है. बॉर्डर मैनेजमेंट अथॉरिटी (BMA) ने बताया कि इस महीने कम से कम 988 घानावासी और लगभग 600 नाइजीरियाई हवाई जहाज से अपने देश लौट गए हैं. अथॉरिटी ने यह भी बताया कि इसी दौरान 15,000 से ज्यादा लोगों ने जमीनी रास्ते से जिम्बाब्वे, मलावी और मोजाम्बिक की सीमा पार की.

कट्टरपंथियों की धमकी के बाद साउथ अफ्रीका छोड़कर जाते प्रवासी

कट्टरपंथियों की धमकी के बाद साउथ अफ्रीका छोड़कर जाते प्रवासी

BMA के अनुसार कुल मिलाकर हाल के हफ्तों में लगभग 25,000 लोगों को उनके देश वापस भेजा गया है. ऐसी खबरें भी आई हैं कि साउथ अफ्रीका के आम लोग भी विदेशी नागरिकों के कागजात की जांच करने की मांग कर रहे हैं, या उनके घरों या काम की जगहों पर जाकर उन्हें वहां से चले जाने के लिए कह रहे हैं. वापस अपने देश लौट रहे कुछ लोगों का कहना है कि उनके काम पर मालिकों या मकान मालिकों ने उन्हें जाने के लिए कहा था, क्योंकि उन्हें डर था कि इंस्पेक्टर उन पर जुर्माना लगा सकते हैं या उपद्रवी उन पर हमला कर सकते हैं.

हिंसा, धमकियों और डराने-धमकाने की घटनाओं के कारण केन्या, युगांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे कई अफ्रीकी देशों ने अपने नागरिकों की स्वेच्छा से वापसी की व्यवस्था की है. इस बीच, हजारों अन्य विदेशी नागरिक पूर्वी शहर डरबन में बने अस्थायी कैंपों या जोहान्सबर्ग और केप टाउन के केंद्रों में घर लौटने में मदद का इंतज़ार कर रहे थे.

मंगलवार की डेडलाइन से पहले साउथ अफ्रीका के सरकारी अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से अपील की है कि शांति बनाए रखें, अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही. कहा गया कि सीमा पर नियंत्रण और जांच को मजबूत किया जाएगा. डेडलाइन डे को देखते हुए बड़े पैमाने पर पुलिस तैनाती भी की गई है. हिंसा और लूटपाट को रोकने के लिए पुलिस अधिकारी पूरी तैयारी में हैं.

यह आंदोलन कौन और क्यों चला रहा?

साउथ अफ्रीका में छोटे राजनीतिक दलों और नागरिकों के छोटे समूहों ने मिलकर ये विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए हैं. इनमें से कुछ समूहों की अगुवाई साउथ अफ्रीका के पारंपरिक ज़ुलु पोशाक पहने और हाथ में लाठी-ढाल लिए लोग कर रहे हैं. ये मुख्य रूप से यहां के मूल जुलु अश्वेत लोग हैं. उनका दावा है कि प्रवासी लोग अपराध बढ़ाते हैं और स्थानीय लोगों की नौकरियां छीनते हैं. इससे गरीबी, बेरोजगारी और कमजोर पुलिस व्यवस्था से जूझ रहे इलाकों में तनाव बढ़ता है.

अवैध प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन करते साउथ अफ्रीका के समूह

अवैध प्रवासियों के खिलाफ आंदोलन करते साउथ अफ्रीका के समूह

लेकिन जानकारों का कहना है कि ये समूह काफी संगठित और पैसे-ताकत से लैश लगते हैं. सोशल मीडिया पर भी इनकी मजबूत मौजूदगी है, जहां वे गलत जानकारी भी फैलाते हैं, जिसे न्यूज एजेंसी AFP ने फेक न्यूज साबित किया है. इस आंदोलन के पीछे की असली वजह के बारे में बात करते हुए पॉलिटिकल साइंटिस्ट सैंडिले स्वाना ने AFP को बताया कि इसके पीछे मुख्य वजह दक्षिणपंथी राजनीतिक अवसरवाद है. उन्होंने कहा, "हम 'ब्लैक-ऑन-ब्लैक' हिंसा यानी अश्वेतों के बीच हिंसा का एक नया रूप देख रहे हैं. यह आंदोलन साउथ अफ्रीका के आर्थिक संकट के असली दोषियों से ध्यान भटका रहा है."

साउथ अफ्रीका की सरकार को पुराना डर भी सता रहा है. पांच साल पहले 2021 में भी ऐसी अशांति देखने को मिली थी, जिसमें लूटपाट और दंगों के दौरान करीब 350 लोग मारे गए थे. उसी के दोहराए जाने की आशंका को देखते हुए सरकार ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं और मौके का फायदा उठाकर किए जाने वाले अपराधों को लेकर चेतावनी दी है.

अभी ही क्यों?

पिछले साल के आखिर में साउथ अफ्रीका के अंदर बिना डॉक्यूमेंट वाले विदेशी नागरिकों को क्लीनिक और अस्पतालों में जाने से रोका गया. इसके बाद छोटे-मोटे विरोध-प्रदर्शन भड़क उठे. इस साल तो विरोध और तेज हो गय. कुछ समूहों ने बिना वैध डॉक्यूमेंट वाले प्रवासियों को 30 जून तक अपने देश लौटने की चेतावनी दी. यह एक तरह की डेडलाइन थी. जानकारों का कहना है कि अफ्रीका के सबसे अमीर देश में बढ़ते जन-आक्रोश के कारण ऐसा हुआ है. यह आक्रोश असल में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी (जो लगभग 33 प्रतिशत है), अपराध और संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसे मुद्दों को लेकर है.

उनका कहना है कि मुख्य रूप से अफ्रीकी प्रवासियों का लगातार आना उन्हें एक आसान निशाना बना रहा है, और नवंबर में होने वाले नगर-निगम चुनावों से पहले राजनीतिक दल इस तनाव का फायदा उठा रहे हैं. साउथ अफ्रीका में लगभग 30 लाख प्रवासी हैं, जो कुल आबादी का लगभग 5.1 प्रतिशत है. इनमें से 63 प्रतिशत से ज्यादा लोग दक्षिणी अफ्रीका के अन्य देशों से आए हैं, जिनमें से कई देश आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहे हैं.

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