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48 घंटे का अल्टीमेटम और फिर फाइनल एक्शन, POK में प्रदर्शनकारियों ने मुनीर को चेतावनी

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में एक बार फिर चुनाव से पहले सरकार और अवामी एक्शन कमेटी आमने-सामने हैं. जिसमें लोगों ने सरकार को 38 मांगों को लेकर 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है.  

48 घंटे का अल्टीमेटम और फिर फाइनल एक्शन, POK में प्रदर्शनकारियों ने मुनीर को चेतावनी
POK में लोगों ने सरकार को 38 मांगों को लेकर 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है.  

Protests In PoK: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर एक बार फिर प्रदर्शन तेज हो गया है. जम्मू कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने इस्लामाबाद सरकार को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उसकी 38 सूत्रीय मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वह आंदोलन के अंतिम और सबसे बड़े चरण की शुरुआत करेगी. क्षेत्र में 27 जुलाई को होने वाले चुनावों से पहले यह टकराव सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है. यहां इससे पहले भी कई बार इस तरह के प्रदर्शन होते रहे हैं. जब लोग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे हैं. 

चुनाव से पहले बढ़ा राजनीतिक तनाव

जेएएसी ने घोषणा की है कि वह मुजफ्फराबाद की ओर बड़ा विरोध मार्च निकालेगी. संगठन का कहना है कि लंबे समय से लोगों की मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है. चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही यह आंदोलन पीओके की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच सहमति नहीं बनी तो आने वाले दिनों में हालात और तनावपूर्ण हो सकते हैं.

12 आरक्षित सीटों को लेकर सबसे बड़ा विवाद

वर्तमान विवाद का मुख्य कारण विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें हैं जो पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए निर्धारित हैं. जेएएसी इन सीटों को खत्म करने की मांग कर रही है. संगठन का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद पीओके की राजनीति पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव बनाए रखता है.

आलोचकों का कहना है कि लगभग 4.36 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली इन 12 सीटों का राजनीतिक वजन क्षेत्र में रहने वाले करीब 33 लाख लोगों के प्रतिनिधित्व वाली 33 सीटों की तुलना में काफी अधिक है. हालांकि 7 जून को पीओके की सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि ये सीटें संविधान के तहत संरक्षित हैं और इन्हें केवल संवैधानिक संशोधन के जरिए ही समाप्त किया जा सकता है.

महंगाई और बिजली दरों से नाराज जनता

जेएएसी की 38 सूत्रीय मांगों में केवल राजनीतिक मुद्दे ही शामिल नहीं हैं. संगठन ने जलविद्युत परियोजनाओं की शर्तों की समीक्षा करने, आटा जैसी आवश्यक वस्तुओं पर अधिक सब्सिडी देने और बिजली की दरें कम करने की भी मांग की है.

आंदोलनकारियों का कहना है कि जिस क्षेत्र में बिजली पैदा हो रही है वहां के लोगों को ही महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है. लगातार बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की परेशानियां और बढ़ा दी हैं जिससे सरकार के खिलाफ नाराजगी मजबूत हुई है.

मजबूत हुआ अवामी एक्शन कमेटी का आंदोलन

साल 2023 में बने जेएएसी ने बहुत कम समय में खुद को पीओके के सबसे प्रभावशाली जन मंच के रूप में स्थापित कर लिया है. मई 2024 में महंगाई और सब्सिडी की मांग को लेकर हुए बड़े प्रदर्शनों ने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींचा था. इसके बाद सितंबर 2025 में भी संगठन ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया था. अब चुनाव से पहले एक बार फिर यह संगठन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है.

अधिकारों के दावों पर उठते रहे हैं सवाल

पाकिस्तान इस क्षेत्र को "आजाद कश्मीर" कहता है लेकिन इसकी संवैधानिक व्यवस्था को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. पीओके का अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा और सुप्रीम कोर्ट है लेकिन कई महत्वपूर्ण अधिकार अब भी इस्लामाबाद के नियंत्रण वाले संस्थानों के पास हैं.

इसके अलावा यहां चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को पाकिस्तान के साथ विलय का समर्थन करने वाला घोषणा पत्र देना पड़ता है. क्षेत्र में पाकिस्तान के खिलाफ राजनीतिक रुख अपनाने की अनुमति नहीं है.

प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर लेकिन विकास में पीछे

पीओके वन संपदा, खनिज और जल संसाधनों से समृद्ध माना जाता है. पाकिस्तान की कृषि के लिए उपयोग होने वाले सिंधु नदी तंत्र का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से गुजरता है. यहां की जलविद्युत परियोजनाएं पाकिस्तान की कुल बिजली का महत्वपूर्ण हिस्सा पैदा करती हैं.

इसके बावजूद स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनके संसाधनों से होने वाली आय का लाभ मुख्य रूप से पाकिस्तान को मिलता है जबकि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों की स्थिति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है.

गरीबी, खाद्य संकट और स्वास्थ्य चुनौतियां

हाल के अध्ययनों के अनुसार पीओके की बड़ी आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है लेकिन खाद्य असुरक्षा गंभीर समस्या बनी हुई है. बड़ी संख्या में परिवारों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता जबकि पहाड़ी इलाकों में स्थिति और अधिक चिंताजनक बताई जाती है. स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई चुनौतियां मौजूद हैं. बच्चों में कुपोषण और मातृ मृत्यु दर को लेकर सामने आए आंकड़े क्षेत्र की सामाजिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.

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