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Explainer: भारत की तरह जिन्ना ने बलूचिस्तान को भी ठगा, इस एक कहानी में छिपी है पाकिस्तान से आज की बगावत

2000 तक पाकिस्तान के खिलाफ चार बलूच विद्रोह हुए. 2005 में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) बनी और आज तक बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी के लिए लड़ रहे हैं.

Explainer: भारत की तरह जिन्ना ने बलूचिस्तान को भी ठगा, इस एक कहानी में छिपी है पाकिस्तान से आज की बगावत
  • जिन्ना ने 1947 में बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए मीर अहमद खान के साथ मिलकर प्रयास किए थे
  • बलूचिस्तान ने 12 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता घोषित की, लेकिन सुरक्षा का जिम्मा पाकिस्तान को सौंप दिया गया था
  • मार्च 1948 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया, इससे वहां की आबादी पाकिस्तान से नाराज हो गई
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मोहम्मद अली जिन्ना वो शख्स जिसने भारत को दो टुकड़ों में बांटने के लिए अपनी जिंदगी खपा दी. कभी महात्मा गांधी के मुरीद रहे जिन्ना लगभग 1906-1920 तक हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे. 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के बाद, वे कांग्रेस से अलग हो गए और पूरी तरह मुस्लिम लीग के साथ हो गए. यहीं से जिन्ना पर भारत को दो टुकड़ों में बांटने का भूत सवार हुआ. बलूचिस्तान भी इसी की भेंट चढ़ा.

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Photo Credit: AFP

क्या हुआ बलूचिस्तान के साथ

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज आर्थिक रूप से बर्बाद हो चुके थे. उन्हें एहसास हो गया था कि अब वो भारत पर शासन नहीं कर पाएंगे. भारत में जगह-जगह आजादी के लिए विद्रोह हो रहे थे. तब अंग्रेजों ने ये तय कर लिया कि वो भारत को छोड़कर चले जाएंगे. जिन्ना मुस्लिमों के लिए अलग देश की मांग पर अड़े हुए थे. इसी समय कलात तब के बलूचिस्तान में भी अलग देश के लिए आजादी की मांग तेज हो गई. जब 1946 में ये तय हो गया कि अंग्रेज भारत छोड़ रहे हैं, तब कलात के खान यानी शासक मीर अहमद खान ने अंग्रेजों के सामने अपना पक्ष रखने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को सरकारी वकील बनाया. उन्हें यकीन था कि मुस्लिम देश की मांग करने वाले जिन्ना अंग्रेजों के सामने उनकी मांग को बेहतर तरीके से रख पाएंगे.

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12 अगस्त को आजाद हुआ

बलूचिस्तान नाम से एक नया देश बनाने के लिए 4 अगस्त 1947 को दिल्ली में एक बैठक बुलाई गई. इसमें मीर अहमद खान के साथ जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए. बैठक में जिन्ना ने कलात की आजादी की वकालत की. इस बैठक में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भी माना कि कलात को भारत या पाकिस्तान का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है. तब जिन्ना ने ही ये सुझाव दिया कि चार जिलों- कलात, खरान, लास बेला और मकरान को मिलाकर एक आजाद बलूचिस्तान बनाया जाए. 11 अगस्त 1947 को कलात और मुस्लिम लीग के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इसके साथ ही बलूचिस्तान एक अलग देश बन गया. हालांकि, इसमें एक पेंच ये था कि बलूचिस्तान की सुरक्षा पाकिस्तान के हवाले थी.

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फिर ब्रिटेन के जरिए धोखा

आखिरकार कलात के खान ने 12 अगस्त को बलूचिस्तान को एक आजाद देश घोषित कर दिया. बलूचिस्तान में मस्जिद से कलात का पारंपरिक झंडा फहराया गया. कलात के शासक मीर अहमद खान के नाम पर खुतबा पढ़ा गया, लेकिन आजादी घोषित करने के ठीक एक महीने बाद 12 सितंबर को ब्रिटेन ने एक प्रस्ताव पारित किया और कहा कि बलूचिस्तान एक अलग देश बनने की हालत में नहीं है. वह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां नहीं उठा सकता.

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कलात के खान ने अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान का दौरा किया. "बलूच राष्ट्रवाद" किताब में ताज मोहम्मद ब्रेसीग ने जिन्ना और खान के बीच बैठक का जिक्र किया है. बैठक में जिन्ना ने खान से बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय करने की बात कही. कलात के शासक ने बात नहीं मानी. उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान कई जनजातियों में बंटा देश है. वह अकेले यह तय नहीं कर सकते. बलूचिस्तान आजाद मुल्क रहेगा या पाकिस्तान के साथ जाएगा, ये वहां की जनता तय करेगी. 

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भारत से मदद मांगने पर विवाद

वादे के मुताबिक खान ने बलूचिस्तान जाकर विधानसभा की बैठक बुलाई, जिसमें पाकिस्तान से विलय का विरोध किया गया. पाकिस्तान का दबाव बढ़ने लगा था. मामले को समझते हुए खान ने कमांडर-इन-चीफ ब्रिगेडियर जनरल परवेज को सेना जुटाने और हथियार गोला-बारूद की व्यवस्था करने को कहा. जनरल परवेज हथियार हासिल करने के लिए दिसंबर 1947 में लंदन पहुंचे. ब्रिटिश सरकार ने कहा कि पाकिस्तान की मंजूरी के बिना उन्हें कोई सैन्य सहायता नहीं मिलेगी.

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जिन्ना ने 18 मार्च 1948 को खारन, लास बेला और मकरान को अलग करने की घोषणा की. दुश्का एच सैय्यद ने अपनी किताब 'द एक्सेशन ऑफ कलात: मिथ एंड रियलिटी' में लिखा है कि जिन्ना के एक फैसले से कलात चारों तरफ से घिर गया. जिन्ना ने कई बलूच सरदारों को अपनी तरफ मिला लिया, जिससे खान के पास कोई चारा नहीं रहा. इसके बाद खान ने भारतीय अधिकारियों और अफगान शासक से मदद के लिए अनुरोध किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.  27 मार्च, 1948 को ऑल इंडिया रेडियो ने राज्य विभाग के सचिव वी.पी. मेनन के हवाले से कहा कि कलात के खान ने भारत से विलय के लिए संपर्क किया था, लेकिन भारत सरकार ने ये मांग ठुकरा दी. हालांकि बाद में तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल और फिर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बयान का खंडन किया.

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आज तक लड़ रहे

26 मार्च को पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में घुस गई. अब खान के पास जिन्ना की शर्तें मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, लेकिन इस कब्जे से बलूचिस्तान की एक बड़ी आबादी के मन में पाकिस्तान के लिए नफरत पैदा हो गई. बलूचिस्तान सिर्फ 227 दिनों तक ही आजाद देश बना रह सका. इसके बाद खान के भाई प्रिंस करीम खान ने बलूच राष्ट्रवादियों का एक दस्ता तैयार किया. उन्होंने 1948 में पाकिस्तान के खिलाफ पहला विद्रोह शुरू किया.

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पाकिस्तान ने 1948 के विद्रोह को कुचल दिया. करीम खान समेत कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. विद्रोह को तब भले ही दबा दिया गया, लेकिन ये कभी खत्म नहीं हुआ. बलूचिस्तान की आजादी के लिए शुरू हुए इस विद्रोह को नए नेता मिलते रहे. 1950, 1960 और 1970 के दशक में वे पाकिस्तान सरकार के लिए चुनौती बनते रहे. 2000 तक पाकिस्तान के खिलाफ चार बलूच विद्रोह हुए. 2005 में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) बनी और आज तक बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी के लिए लड़ रहे हैं.
 

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