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इटली के इस स्टेशन पर मौजूद हिटलर का सीक्रेट प्लेटफॉर्म नंबर 21, यहां से चलती थी 'मौत वाली रेल'

इटली के मिलान सेंट्रल स्टेशन का “बिनारियो 21” यानी “प्लेटफॉर्म 21” बाहर से एक सामान्य हिस्सा लगता था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह हिटलर के नाजी आतंक का गुप्त दरवाजा बन गया था. जानिए उसी की कहानी.

इटली के इस स्टेशन पर मौजूद हिटलर का सीक्रेट प्लेटफॉर्म नंबर 21, यहां से चलती थी 'मौत वाली रेल'
इटली के मिलान सेंट्रल स्टेशन के “प्लेटफॉर्म 21” का डरावना है इतिहास
अल्टर्ड बाई एनडीटीवी इंडिया, AFP

ऊपर लोग ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. स्टेशन पर हलचल थी, आवाजें थीं, सफर शुरू हो रहे थे. लेकिन उसी स्टेशन के नीचे एक ऐसी जगह छिपी थी, जहां से लोगों को चुपचाप मौत की तरफ भेजा जा रहा था. इटली के मिलान सेंट्रल स्टेशन का “बिनारियो 21” यानी “प्लेटफॉर्म 21” बाहर से एक सामान्य हिस्सा लगता था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह हिटलर के नाजी आतंक का गुप्त दरवाजा बन गया था. चलिए आपको उसी मौत के “प्लेटफॉर्म 21” के बारे में बताते हैं.

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म जमीन के नीचे बना हुआ था और आम यात्रियों की नजर से पूरी तरह छिपा रहता था. 1943 से 1945 के बीच यहां से यहूदियों और राजनीतिक कैदियों को ट्रेन के जरिए कंसंट्रेशन कैंप्स (यातना शिविर) भेजा जाता था.

काम की बात- कंसंट्रेशन कैंप ऐसे नजरबंदी केंद्र होते हैं, जहां राजनीतिक कैदियों, जातीय अल्पसंख्यकों या दुश्मन माने जाने वाले लोगों को बिना किसी निष्पक्ष सुनवाई के, सरकारों द्वारा अत्यधिक क्रूरता के साथ कैद किया जाता है. नाजी जर्मनी में 1933-1945 के बीच लाखों यहूदियों और अन्य लोगों को ऐसे शिविरों में रखा गया, जहां अत्यधिक भूख, बीमारी और यातना से मौतें हुईं.

कैसे काम करता था मौत का प्लेटफॉर्म?

यहूदियों और राजनीतिक कैदियों को पहले मिलान की सैन विट्टोरे जेल से यहां लाया जाता और फिर माल ढोने वाले डिब्बों में भर दिया जाता. इन डिब्बों को बाद में एक विशेष लिफ्ट की मदद से ऊपर रेलवे ट्रैक तक पहुंचाया जाता था. इसके बाद ट्रेनों को ऑशविट्ज जैसे कैंप्स की तरफ रवाना कर दिया जाता. ऊपर स्टेशन पर मौजूद लोगों को अक्सर अंदाजा भी नहीं होता था कि नीचे क्या चल रहा है. रिपोर्ट में बताया गया कि यहां से कई ट्रेनें रवाना हुईं और हजारों लोगों को भेजा गया. इनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे. इन्हीं में लिलियाना सेग्रे नाम की 13 साल की लड़की भी थीं, जिन्हें जनवरी 1944 में यहां से ऑशविट्ज भेजा गया था. बाद में वे होलोकॉस्ट सर्वाइवर बनीं और आज इटली की सबसे प्रसिद्ध गवाहों में गिनी जाती हैं.

युद्ध खत्म होने के बाद यह जगह लंबे समय तक लगभग भुला दी गई. बाद में इसे एक मेमोरियल में बदल दिया गया ताकि दुनिया उस भयावह इतिहास को याद रख सके. आज यहां पुराने मालगाड़ी के डिब्बे, अंधेरे रास्ते और उन लोगों की यादें मौजूद हैं जिन्हें यहां से भेजा गया था. मेमोरियल के प्रवेश पर एक बड़ा शब्द लिखा है — “इंडिफरेंस” यानी “उदासीनता”. यह इस बात का प्रतीक है कि लोगों की चुप्पी और अनदेखी ने इस त्रासदी को और भयानक बना दिया.

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Ashutosh Kumar Singh
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