- अरब प्रायद्वीप के तट पर दुनिया के 10 में से 8 सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट स्थित हैं
- हालिया ईरानी मिसाइल हमलों से फुजैरा और कुवैत के पावर-लिंक्ड डिसैलिनेशन प्लांट्स के आसपास मलबा गिरा
- अगर इनमें से डिसैलिनेशन प्लांट्स पर हमला हुआ तो यहां रहे लोगों की प्यास बुझाना तक मुश्किल हो जाएगा
मिडिल ईस्ट में संकट क्या गहराया, पूरी दुनिया में तेल आपूर्ति को लेकर हाहाकार मचने लगा. यकीनन ईरान-इजरायल की जंग से दुनिया की नजर तेल की कीमतों पर है, लेकिन असल जोखिम पानी का है. ये भी किसी से छिपा नहीं कि खाड़ी की पूरी लाइफलाइन इसी पर टिकी है. अरब प्रायद्वीप के तट पर दुनिया के सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट भी हैं, जो समुद्र के खारे पानी से रोजाना करोड़ों लोगों के लिए पीने का पानी बनाते हैं. मार्च के पहले हफ्ते में ईरानी मिसाइल और इंटरसेप्टर मलबे की वजह से इन परिसरों के पास हुई दो घटनाओं ने साफ दिखा दिया कि अगर यह सिस्टम ठप पड़ा, तो सबसे धनी पेट्रोलियम देश भी चंद दिनों में रहने लायक नहीं रहेंगे. इस खतरे का जिक्र इंडिपेंडेंट एनालिस्ट शनाका एनश्लेम परेरा ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में भी किया है.
खाड़ी का वाटर सिस्टम: 10 में 8 सबसे बड़े प्लांट यहीं
अरब प्रायद्वीप के तट पर दुनिया के 10 में से 8 सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट मौजूद हैं. ये सुविधाएं वैश्विक डिसैलिनेटेड पानी का लगभग 60% बनाती हैं और हर दिन 10 करोड़ लोग इन्हीं प्लांट से मिला पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं. कुवैत 90%, ओमान 86% और सऊदी अरब 70% पीने का पानी डिसैलिनेशन से हासिल करते हैं. नतीजतन, इन प्लांट्स के ठप पड़ते ही पूरा सामाजिक‑आर्थिक तंत्र तुरंत संकट के दायरे में आ जाएगा और लोगों के जीवन पर ही संकट मंडराने लगेगा.
ईरान-इजरायल की जंग के बीच तेल पर सबकी नजर है, लेकिन खाड़ी का असली संकट पानी है. दुनिया के 60% डिसैलिनेशन प्लांट अरब तट पर हैं जो करोड़ों लोगों की पानी की जरूरत पूरी करते हैं. हालिया ईरानी मिसाइल मलबे ने दिखाया कि यह इन्फ्रास्ट्रक्चर कितनी आसानी से खतरे में आ सकता है और एक गलती पूरी खाड़ी को मानवीय संकट में बदल सकती है.
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फुजैरा और कुवैत के पावर-लिंक्ड परिसरों पर ‘कॉलेटरल' असर
2 मार्च को ईरान की मिसाइल का मलबा फुजैरा के उस पावर स्टेशन पर आकर गिर गया, जो दुनिया के सबसे बड़े डिसैलिनेशन प्लांट्स में से एक को बिजली देने का काम करता है, इसी दौरान, इंटरसेप्टर के टुकड़ों से कुवैत के दोहा वेस्ट पावर एंड वाटर डिसैलिनेशन कॉम्प्लेक्स में आग लग गई. खास बात यह रही कि किसी प्लांट को सीधे निशाना नहीं बनाया गया और कोई भी फेसिलिटी नष्ट नहीं हुई. दोनों घटनाएं “collateral damage” के रूप में दर्ज हुईं. अगर सच में प्लांट नष्ट होता तो क्या मंजर होता है, इसके बारे में सुनकर ही डर लगने लगेगा.
डिसैलिनेशन प्लांट्स पर सीधे वार नहीं, इसका सिग्नल क्या है?
यकीनन ईरान के पास खाड़ी क्षेत्र के हर डिसैलिनेशन प्लांट के सटीक कॉर्डिनेट्स हैं. पिछले सात दिनों में उसकी ओर से फुजैरा, कुवैत सिटी, रियाद, अबू धाबी, दोहा और बहरीन पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले हुए. जिनके टारगेट रहे रिफाइनरी, मिलिट्री बेस, एम्बेसी और पावर स्टेशन. हमले के दौरान डिसैलिनेशन प्लांट को सीधे तौर पर हुआ भी नहीं गया. ये ताबड़तोड़ हमले पानी की सप्लाई कभी भी बंद कर सकते हैं. जिसके बाद पानी के लिए ही हाहाकार मच जाएगा.
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के कारण शनिवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया. ब्रेंट क्रूड की कीमत 91.84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का दाम 89.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. इस तेजी के साथ ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई की कीमतों में क्रमशः 24.55 प्रतिशत और 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने की आशंकाएं फिर से तेज हो गई हैं.
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स्थानीय कमांडरों के पास लक्ष्य चुनने की छूट
ईरान की सैन्य संरचना Mosaic Defense डॉक्ट्रिन पर काम करती है. 31 प्रांतीय कमान, हर एक के पास स्वतंत्र टार्गेटिंग अथॉरिटी और तेहरान से आदेश न मिले तब भी लड़ाई जारी रखने की डिज़ाइन. अब संदर्भ यह है कि केंद्रीय कमान, जिसने ‘डिसैलिनेशन पर संयम' का रणनीतिक फैसला लिया था, नष्ट हो चुकी है, और ईरान के सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई भी नहीं रहे. इससे वे कमांडर, जिन्होंने “संयम” को अपनी विरासत में पाया था, संस्थागत रूप से उसे निभाने के बाध्य नहीं है. वह स्ट्रक्चरल बदलाव है जो पूरा जोखिम‑गणित बदल देता है
1991 की मिसाल, 2026 की निर्भरता
साल 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान इराक ने कुवैत के डिसैलिनेशन इनटेक में कच्चा तेल छोड़ दिया था. जिसका नतीजा ये हुआ कि 750 इमरजेंसी वाटर टैंकर आयात करने पड़े और सालों में जाकर पुनर्प्राप्ति हुई. साल 2026 में खाड़ी देशों की डिसैलिनेशन पर निर्भरता कहीं ज़्यादा है. आबादी बड़ी, खपत ऊंची, और मीठे पानी के वैकल्पिक स्रोत शून्य. ऐसे में किसी एक बड़े प्लांट पर सीधा वार, सबसे अमीर देशों को भी मानवीय संकट में धकेल सकता है.
तेल सप्लाई के रिस्क की कीमत लग रही, पानी रुके तो क्या होगा?
तेल का बाज़ार अभी सप्लाई रुकने के खतरे को तो कीमत में जोड़ रहा है, लेकिन वह इस बात का अंदाजा नहीं लगा रहा कि फारस की खाड़ी का सबसे अहम ढांचा—डिसैलिनेशन (समुद्री पानी को पीने लायक बनाना) है. जो कि किसी एक IRGC कमांडर के निशाना तय करने भर से तुरंत बंद हो सकता है. इसलिए यहां असली हथियार “संयम” ही है और जो नेता अब तक इस संयम पर लगाम रखे हुए था, वह अब नहीं रहा. यही सबसे अहम संकेत है, जिसे इस युद्ध की बहस में सबसे कम समझा गया है.
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