- ईरान के विरोध सालों में सबसे गंभीर हैं, लेकिन इस्लामी गणराज्य के तुरंत पतन की भविष्यवाणी अभी जल्दबाजी होगी.
- संगठित विपक्ष की कमी और प्रवासी ईरानियों की आपसी खींचतान बदलाव की सबसे बड़ी बाधा है.
- खामेनेई के बाद सत्ता किसे मिलेगी, यही ईरान के भविष्य का सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
पिछले दो हफ्तों से जारी विरोध-प्रदर्शन ईरान के धार्मिक शासन के लिए बीते कई सालों की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं. प्रदर्शन जिस पैमाने और जिस तेवर के साथ हो रहे हैं, वे असाधारण हैं. लेकिन जानकारों का कहना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे इस इस्लामी शासन का अंत हो जाएगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि संकट गंभीर जरूर है, लेकिन उसका अंतिम रास्ता अभी तय नहीं है. 28 दिसंबर से शुरू हुए ये प्रदर्शन आमजनों पर आर्थिक दबाव के विरोध में शुरू हुए थे लेकिन अब यह उस मौलवी सिस्टम में पूरी तरह बदलाव की मांग तक पहुंच गए हैं, जिसने 1979 की क्रांति में राजशाही को सत्ता से हटाने के बाद से ईरान पर शासन किया है.
ईरान के अधिकारी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई कर रहे हैं, जिसमें मानवाधिकार समूहों के मुताबिक सैकड़ों की संख्या में लोगों की मौत हुई है. लगातार होते विरोध प्रदर्शन के बावजूद देश में 86 वर्षीय सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का शासन चल रहा है.
पेरिस में साइंसेज पो सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज की प्रोफेसर निकोल ग्राजेव्स्की का कहना है कि यह संकट किस दिशा में जाएगा, यह अभी साफ नहीं है. वे कहते हैं, "ये विरोध प्रदर्शन शायद इस्लामिक राष्ट्र ईरान के लिए बीते कई सालों में बढ़ती स्पष्ट राजनीतिक मांगों को लेकर आई सबसे बड़ी चुनौती हैं."
उन्होंने कहा कि यह साफ तो नहीं है कि विरोध प्रदर्शनों से लीडरशिप हटेगी या नहीं पर इस बातचीत में वो "ईरान के दबाने वाले सिस्टम की गहराई और मजबूती" की ओर इशारा किए.
वहीं ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थॉमस जूनो का कहना है कि ईरानी शासन आज घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर पहले से कहीं अधिक कमजोर है. उनके मुताबिक, ईरान की मौजूदा हालत 1980 से 1988 के बीच चले ईरान–इराक युद्ध के सबसे बुरे दौर के बाद सबसे नाजुक मानी जा सकती है.
ईरानी अधिकारियों ने अपनी जवाबी रैलियां भी बुलाई हैं, जिसमें सोमवार को हजारों लोग शामिल हुए.
जूनो ने कहा, "इस समय, मुझे अभी भी नहीं लगता कि शासन का पतन होने वाला है. हालांकि, मुझे इस आकलन पर पहले की तुलना में कम भरोसा है."
Thousands have been killed and injured , but see how, Iranians, flooding the streets of different cities in Iran and chanting against the dictator. This is what real bravery looks like.#FreeIran pic.twitter.com/b0af1UdbGC
— Masih Alinejad 🏳️ (@AlinejadMasih) January 13, 2026
अब तक क्या-क्या हुआ?
विरोध प्रदर्शन 28 दिसंबर को तेहरान के बाजार में हड़ताल के साथ शुरू हुआ था, लेकिन बीते हफ्ते राजधानी और अन्य शहरों में बड़े पैमाने पर रैलियों के साथ यह सत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती में तब्दील हो गया. इससे पहले 2022-2023 में ईरान में बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था.
सितंबर 2022 में धार्मिक मामलों की पुलिस ने ईरानी महिला महसा अमीनी को गिरफ्तार किया था. उन पर सिर को ढंकने के एक सख्त नियम का पालन नहीं करने का आरोप था. उसके बाद महसा अमीनी को पुलिस वैन में बुरी तरह पीटने का आरोप लगा जिसके बाद वो कोमा में चली गईं और उनकी मौत हो गई. हालांकि पुलिस का कहना था कि उनकी मौत गिरफ्तार किए जाने के बाद हार्टि फेलियर से हुई थी. उससे पहले 2009 में भी विवादित चुनावों के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.
इस बार ईरानी अधिकारियों ने पिछले कई दिनों से पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया है. इंटरनेट निगरानी संस्था नेटब्लॉक्स के मुताबिक ईरान देशव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट की चपेट में है, जिसका मकसद लोगों की आवाज को दबाया जाना है. इसकी वजह से वहां से प्रदर्शन के कम वीडियो सामने आ रहे हैं.
अमेरिका स्थित समूह यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान के पॉलिसी डायरेक्टर जेसन ब्रोडस्की ने कहा कि ये विरोध प्रदर्शन ऐतिहासिक हैं.
पर साथ ही वो ये भी कहते हैं कि, "वर्तमान शासन के पतन के लिए कुछ अलग-अलग चीजों की जरूरत होगी. इसके लिए रिवोल्यूशनरी गार्ड्स जैसे सुरक्षा सेवाओं को जिम्मेदार लोगों को दल बदलने का फैसला लेना होगा और वर्तमान राजनीतिक गठन में दरारें पैदा होनी पड़ेगी."
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ईरान के खिलाफ इसराइल के 12 दिनों चले युद्ध में अमेरिका शामिल हुआ था, जिसमें ईरान के कुछ शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की मौत हुई थी
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इजरायली या अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है. उन्होंने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसद अधिक टैरिफ लगाने का एलान भी किया है. हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि वो राजनयिक स्तर पर इस मसले को सुलझता देखना चाहते हैं पर जून में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ 12 दिनों के युद्ध में शामिल होने वाले ट्रंप ईरान पर हमले से भी इनकार नहीं करते हैं. जून में उन हमलों के दौरान ही ईरान के कुछ शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की मौत हुई थी. सर्वोच्च नेता खामेनेई को छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा था और ईरान के भीतर इजराइल की खुफिया एजेंसियों की पकड़ का खुलासा भी हुआ था.
ग्राजेव्स्की कहते हैं कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वो वर्तमान स्थिति को पूरी तरह बदल देगा.
जूनों कहते हैं, "1980-1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध के सबसे बुरे सालों के बाद से ईरान का शासन घरेलू और भू-राजनीतिक रूप से पहले से कहीं अधिक कमजोर दिख रहा है."
इन सब के बीच सोमवार को ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि संबंधों में गिरावट के बावजूद उनके देश ने अमेरिका के साथ बातचीत के रास्ते खोल रखे हैं.

ईरान में ताजा विरोध प्रदर्शन 28 दिसंबर से शुरू हुआ है
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मजबूत विपक्ष का मौजूद नहीं होना
अमेरिका में रह रहे ईरान के अपदस्थ शाह के बेटे रजा पहलवी ने खुले तौर पर विरोध-प्रदर्शनों का समर्थन किया है. उनके समर्थन में ईरान की सड़कों पर नारे भी लग रहे हैं, पर समस्या ये है कि ईरान में कोई मजबूत और संगठित राजनीतिक विपक्ष इस समय मौजूद नहीं है. वहीं देश के बाहर रहने वाला ईरानी प्रवासी समुदाय भी बुरी तरह बंटा हुआ है. वहां अलग-अलग राजनीतिक गुट हैं, जो अक्सर एक-दूसरे से भिड़ते रहे हैं.
येल यूनिवर्सिटी के लेक्चरर अराश अजीजी कहते हैं कि ईरान में बदलाव के लिए ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो सिर्फ एक राजनीतिक धड़े का नहीं, बल्कि ईरानी समाज के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करे और यह आपस में गठबंधन बना कर ही संभव है.

खामेनेई की सेहत- सबसे बड़ा सवाल
अयातुल्लाह अली खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता हैं. वो आजीवन इस पद पर रहने वाले हैं. ईरान में 1979 में हुई क्रांति के अगुवा रुहोल्लाह खुमैनी की मौत के बाद यह जिम्मेदारी खामेनेई ने संभाली थी. हाल ही में वे सार्वजनिक रूप से सामने आए और हमेशा की तरह सख्त लहजे में विरोध-प्रदर्शनों की निंदा की. इससे यह संकेत मिला कि सत्ता फिलहाल झुकने के मूड में नहीं है. लेकिन लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि खामेनेई के बाद सत्ता किसके हाथ में जाएगी. संभावनाओं में उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का नाम लिया जाता है, जो बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देते हैं. एक और संभावना यह है कि सत्ता किसी एक व्यक्ति के बजाय किसी समिति के हाथों में चली जाए.

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स में करीब दो लाख सैनिक बताए जाते हैंं
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बढ़ सकती है इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की भूमिका
जानकार ये भी मानते हैं कि अगर मौजूद व्यवस्था पूरी तरह कायम रहती है और कोई बड़ा बदलाव होता है तो एक बीच का रास्ता अख्तियार किया जा सकता है. विश्लेषक जूनो कहते हैं, "ऐसे हालात में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स सत्ता में अधिक औपचारिक या अनौपचारिक दखल हासिल कर सकते हैं. यानी ईरान में सत्ता का संतुलन धीरे-धीरे सैन्य ताकत की ओर झुक सकता है."
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