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ऐसी क्या ताकत है कि अमेरिका और इजरायल को चुनौती दे रही है ईरान की IRGC

IRGC आज ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य और राजनीतिक संस्था है. यह सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है और ईरान-इराक युद्ध के बाद से ही देश की मिसाइल तकनीक, अर्थव्यवस्था और कुदुस फोर्स का कंट्रोल इसी के पास है.

ऐसी क्या ताकत है कि अमेरिका और इजरायल को चुनौती दे रही है ईरान की IRGC
  • ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य और राजनीतिक संस्था IRGC है, जो सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है
  • IRGC की स्थापना 1979 में अयातुल्लाह रुहेल्लाह खुमैनी ने इस्लामिक क्रांति की रक्षा के लिए की थी
  • ईरान-इराक युद्ध के दौरान IRGC ने देश की रक्षा की मुख्य जिम्मेदारी संभाली और सैन्य क्षमता को बढ़ाया
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ईरान में खामेनेई चले गए लेकिन युद्ध क्यों नहीं रुका? ईरान में आंदोलन हुआ लेकिन तख्तापलट क्यों नहीं हुआ? अमेरिका के अड्डों पर मिसाइल हमले का प्लान किसने बनाया था? ईरान में मिसाइलों के अंडरवर्ल्ड का असली बटन किसके पास है? ईरान की किस फोर्स को यूरोपीय यूनियन ने आतंकवादी घोषित कर दिया है? ईरान ने किसके लिए पूरी यूरोपियन यूनियन की सेना को आतंकी लिस्ट में डाल दिया है? हर सवाल का एक ही जवाब है. IRGC यानी इस्लामिक रिव्यॉल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स. ईरान के हर दर्द की दवा, सुपर पॉवरफुल. जिसका रिमोट कंट्रोल अयातुल्लाह के पास होता है. अयातुल्लाह की हर मर्जी को सच साबित करने का जिम्मा IRGC के पास है. IRGC ईरान का DNA है.

कैसे बनी IRGC? 

IRGC की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  अमेरिका और इजरायल ने कई कई बार ईरान के नेताओं,कमांडर,वैज्ञानिकों को बड़ी संख्या में मार डाला फिर भी ईरान की मिलिट्री ताकत और अयातुल्लाह की हस्ती को मिटा नहीं पाया. ईरान में रिजीम चेंज की हर कोशिश नकाम हो जाती है और मिडिल ईस्ट, अरब देशों में ईरान का काफी खौफ है.

अयातुल्लाह रुहेल्लाह खुमैनी ने 1979 में IRGC का निर्माण किया था. इसका मकसद इस्लामिक क्रांति की रक्षा था. 1951 में ईरान ने लोकतांत्रिक तरीके से डॉ मोहम्मद मोसद्देक की सरकार को चुना. ये एक लोकतांत्रिक सरकार थी. 1951 में मोसद्देक की सरकार ने एंग्लो ईरानियन ऑयल कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया. ब्रिटेन इसके खिलाफ था. उसने अमेरिका को बताया कि मोसद्देक कम्यूनिस्ट हो जाएगा.मोसद्देक की सरकार को हटाने के लिए 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ज्वाइंट गुप्त अभियान ऑपरेशन अजाक्स चलाया. ईरान में घरेलू दंगे हुए, नेताओं की खरीद फरोख्त हुई और सेना को प्रभावित किया गया. 19 अगस्त 1953 में मोसद्देह की सरकार हटा दी गयी. जनरल फज़ल्लुलाह ज़ाहेदी को प्रधानमंत्री बना दिया गया. जिसने बाद में शाह मोहम्मद रजा शाह पहलवी को सत्ता सौंप दी. 

25 साल तक ईरान में पश्चिम समर्थित शासन चला. तो जब 1979 में पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह रुहेल्लाह खुमैनी ने ईरान की कमान संभाली तो उनके नीचे वही सेना,प्रशासन और नेता थे जो अमेरिका,पश्चिम दुनिया के लिए एक चुनी हुई सरकार को गिरा चुके थे. अयातुल्लाह को उस समय की सेना और प्रशासन पर विश्वास नहीं था. उन्हें लगता था कि पहलवी वंश के लिए काम करने वाली सेना और प्रशासन के भरोसे रहे तो कहीं तख्तापलट न हो जाए. इस्लामिक क्रांति नाकाम न हो जाए. इस्लामिक क्रांति से पहले पहलवी का ईरान इजरायल का दोस्त था. ईरान उन चंद देशों में शामिल था जिन्होंने इजरायल को राष्ट्र की मान्यता दी थी. इजरायल ईरान के मिसाइल कार्यक्रम में मदद भी कर रहा था.जबकि रूहेल्लाह खुमैनी पश्चिम विरोधी थे. उन्होंने सत्ता संभालते ही तेहरान में बनी इजरायल की एंबेसी को फिलीस्तीन का दूतावास घोषित कर दिया था. अमेरिका के दूतावास में अधिकारियों को बंधक बना लिया था. दुनिया में कुदुस डे कि शुरूआत की. जो पूरी दुनिया में फिलीस्तीन,यरुशलम को आजादी दिलाने और अमेरिका की बदमिज़ाजी का विरोध करने के लिए रमजान महीने के आखिरी शुक्रवार को मनाया जाता है. जब अयातुल्लाह खुमैनी एक्टिव हुए तो उन्होंने पुराने लोगों को हटाया नहीं लेकिन हर महत्वपूर्ण जगह की जिम्मेदारी रिवॉल्यूशनरी गार्डस को दे दी. रिवॉल्यूशनरी गार्ड अयातुल्लाह को रिपोर्ट करते थे. बाद में जब ईरान में संसद,न्यायपालिका और राष्ट्रपति का सिस्टम शुरू हुआ तब भी IRGC की रिपोर्टिंग सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह के प्रति बनी रही.

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कौन हैं रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स?

रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में समाज के उन लोगों को भर्ती किया गया था जो समाजिक सुरक्षा और मस्जिद की ओर से बनने वाले संगठनों में सक्रिय सदस्य होते थे. इस्लामिक क्रांति के नेताओं का आदेश जमीन पर सच करते थे. शाह की सत्ता के खिलाफ खुमैनी के कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे. बाद में आर्थिक रूप से कमजोर भी  IRGC में शामिल किए जाने लगे. ईरान के सुदूर इलाकों में रहने वाले धार्मिक गुरू की सिफारिश पर आने वाले युवा भी IRGC का हिस्सा बने. जैसे जैसे ईरान की जरूरतें बदलीं वैसे वैसे IRGC में शामिल होने वालों का प्रोफाइल भी बदलने लगा. ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियन के मुताबिक IRGC में इस समय 90% लोग ऐसे हैं जो वैज्ञानिक,अर्थशास्त्री,इंजीनियर या रिसर्चर हैं. 

ईरान में IRGC की जड़ें शुरू से इतनी मजबूत थी कि 11 फरवरी 1979 में ईरान इस्लामिक गणराज्य बना तो भी IRGC की स्थिति पर असर नहीं पड़ा. 2-3 दिसंबर 1979 में जनमत संग्रह के बाद नया संविधान लागू हुआ तब भी IRGC वहीं का वहीं रहा. 25 जनवरी 1980 में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ. 14 मार्च 1980 को संसद के चुनाव हुए. फिर भी IRGC का मुकाम और काम पहले जैसा ही रहा. इसका एक बड़ा कारण था ईरान में सरकार का नया प्रयोग था. ईरान में इस्लामिक स्टेट का हाईब्रिड अवतार लागू किया गया था. ईरान का स्टेट हेड एक धार्मिक व्यक्ति होगा जिसे सुप्रीम कमांडर कहते हैं. उसके नीचे सेना, संसद, न्यायपालिका को जगह दी गयी. ये सेना समर्थित धर्मतंत्र था जो कि लोकतांत्रिक सरकार से चलता है. लेकिन सबकी कमान सुप्रीम लीडर के पास है. जिसपर अयातुल्लाह बैठते हैं और ये IRGC पूरी तरह से सुप्रीम लीडर का सिस्टम है. तो कोई आए कोई जाए. लेकिन इस्लामिक गणराज्य ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह और IRGC की सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकता है.

ईरान-इराक युद्ध और IRGC

IRGC की जड़ों को मजबूत करने में ईरान-इराक युद्ध की बड़ी भूमिका है. इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान संभल ही रहा था कि 22 सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया. ईरान-इराक युद्ध के दौरान IRGC ईरान की रक्षा का प्रमुख चेहरा बना. ईरान की सेना कमजोर थी और दुश्मन मजबूत था. ईरान के नए लीडर अयातुल्लाह रूहेल्ला खुमैनी ने देश की रक्षा IRGC को सौंप दी. ये IRGC के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ. 1980 से 1988 तक युद्ध चला. 8 साल में रिवॉल्यूशनरी गार्डस ढीले ढाले क्रांतिकारी दस्ते से विकसित हो कर शक्तिशाली सैन्य राजनीतिक संस्था बना.

ईरान-इराक युद्ध के दौरान ही ईरान को अपने दोस्त-दुश्मन का पता चला. दुनिया के सिस्टम का एक्सपोज़र मिला. देश की जरूरतों की जानकारी भी हुई. इसी दौरान  IRGC ने कमांड संरचना, हथियार, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक विकास, युद्ध रणनीति और आर्थिक मजबूती का सिस्टम तैयार किया. IRGC की भूमिका तेजी से बदली, असंगठित संगठन समानांतर सेना में बदल गया. रिवॉल्यूशनरी गार्डस ने फ्रंटलाइन पर मोर्चा संभाला. यहीं से IRGC ने एसेमेट्रिक वॉर की वो विशेषता हासिल की जो ईरान की पहचान है, जिसमें मजबूत दुश्मन को कमजोर सेनाएं परेशान करती हैं. IRGC ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान ही सरप्राइज अटैक, गुरिल्ला वार, रासायनिक हमले से निपटने की ट्रेनिंग ली. मिसाइल विकास, वायुसेना और नौसेना की तैयारी भी पूरी कर ली की. इसी युद्ध के दौरान IRGC ने बासिज मिलिशिया और कुदुस फोर्स का निर्माण किया. बासिज मिलिशिया को जमीन पर लड़ने में लगाया और कुदुस फोर्स को विदेश में ईरान की हितरक्षा का काम सौंपा.

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IRGC और राजनीति

1988 में जब इराक के साथ युद्ध खत्म हुआ तो IRGC के कई कमांडर पॉलिटिक्स में भी आए. IRGC ने ईरान की राजनीति को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया. 1989 में जब इस्लामिक क्रांति के जनक रूहेल्ला खुमैनी का निधन हो गया तो नए अयातुल्लाह बने अली खामेनेई. अयातुल्लाह अली खामेनेई ने IRGC को एक एलीट फोर्स में बदला. अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके बेटे जो अब ईरान के नए सुप्रीम लीडर हैं मुज़्तबा खामेनेई दोनो का IRGC से गहरा जुड़ाव रहा है. 1981 से 1989 तक अली खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति रहे. इस वजह से वो IRGC और सेना की अहम बैठक में शामिल होते थे. युद्ध के दौरान मोर्चे पर जाते थे. 1979 से 1989 तक IRGC की अनियमित युद्ध शाखा के सदस्य रहे. IRGC के बड़े ऑपरेशन्स में हिस्सा लिया. 1980 में तेहरान के फ्राइडे प्रेयर ईमाम बने. 2026 तक IRGC की तर्ज पर 26 साल तक राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार प्रसार किया.

मौजूदा सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने 17 साल की उम्र में IRGC ज्वाइन कर लिया था. चार प्रमुख लड़ाइयों में हिस्सा लिया. युद्ध में लड़ते हुए घायल हुए. जब युद्ध खत्म हुआ तो मुज्तबा खामेनेई  2009 से 2026 तक बासिज पैरामिलिट्री मिलिशिया के प्रमुख रहे. साथ ही IRGC की खुफिया और खुफिया सुरक्षा शाखा के अघोषित प्रमुख रहे हैं.

दूसरी सेनाओं के साथ अभ्यास
IRGC औपचारिक तरीके से अन्तरराष्ट्रीय सेनाओं के साथ युद्ध अभ्यास भी करती है. यूरोपियन यूनियन ने भले ही उसे आतंकी लिस्ट में डाला है. लेकिन वो तो चीन की सेना के साथ आतंक को मिटाने के लिए ट्रेनिंग करती है. IRGC कमांडर का रसूख ऐसा है कि खुद सुप्रीम कमांडर उनकी याद में होने वाले जलसे में तकरीर करते हैं. भारी भीड़ जमी होती है. ऐसे ही एक IRGC कमांडर थे कासिम सुलेमानी. IRGC के बहुत ही करामाती कमांडर माने जाते थे. पूरी दुनिया में उनके दोस्त थे. कासिम सुलेमानी के बारे में कहा जाता था कि उनकी गुप्त सूचनाएं किसी को भी सरप्राइज़ कर सकती थीं. दुनिया के लिए खतरा बन गए ISIS और बगदादी को खत्म कऱने में उनकी बड़ी भूमिका थी. लेकिन 2020 में अमेरिका ने उन्हें इराक के बगदाद एयरपोर्ट के पास मार दिया. हमले के लिए रिपर ड्रोन का इस्तेमाल किया गया. ड्रोन ने तीन मिसाइल छोड़ीं.उनके साथ हमले में इराक के शिया मिलिशिया PMF के डिप्टी चीफ अबू महदी अल मुहंदिस भी मारे गए थे.अमेरिका ने कहा कि ये प्रिएंपिटव स्ट्राइक थी क्योंकि कासिम सुलेमानी अमेरिकी अड्डो पर हमले की योजना बना रहे थे.

IRGC के अंग
पिछले 46 साल में इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का काफी विस्तार हुआ है. आज के ईरान में IRGC के काफी ज्यादा वर्टिकल्स हैं. इनमें से कुछ प्रमुख हैं-सेना, सुरक्षा,खुफिया तंत्र, सोशल कंट्रोल, मॉरल पुलिसिंग, आतंरिक सुधार, विद्रोह दमन, रिसर्च, कल्चर,राष्ट्रवाद,मीडिया,इनोवेशन और इकॉनमी.

IRGC ने 2025 में दुनिया का पहला ड्रोन कैरियर अपने बेड़े में शामिल किया था. समुद्र में दौड़ने वाले इस जहाज की छत पर ड्रोन्स के उड़ान भरने की हवाई पट्टी तैयार की गयी थी. जिसमें हेलिकॉप्टर भी उतर सकते थे. आपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स के बारे में काफी सुना होगा लेकिन ड्रोन कैरियर्स IRGC का स्ट्रैटजिक प्रयोग है.ऐसे ही न जाने और कितने प्रयोग IRGC ने किए हैं.

मौजूदा IRGC चीफ
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद ब्रिगेडियर जनरल अहमद वहिदी के पास IRGC की कमान है. सुप्रीम लीडर ही इसकी नियुक्ति करता है. IRGC डिस्ट्रीब्यूटेड कमांड मॉडल पर काम करती है. जिसका मतलब है कि अगर वरिष्ठ नेता मर जाए या राजधानी से संपर्क कट जाए तो भी इसके काम और परिणाम पर फर्क नहीं पड़ता है.ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद ईरान का जवाब इसके सबूत की तरह पेश किया जाता है.IRGC में कुल 31 कमांड हैं.

इसकी मुख्य आर्म हैं-

  1. कुद्स फोर्स: यह IRGC की विदेशी शाखा है जो ईरान के बाहर रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करती है. यह अफगानिस्तान, इराक ,लेबनान,सीरिया और यमन जैसे देशों में प्रॉक्सी ताकतों को ट्रेनिंग, पैसा और हथियार देती है.
  2. बसीज रेजिस्टेंस फोर्स: यह एक अर्धसैनिक स्वयंसेवक मिलिशिया है जिसका काम आंतरिक विद्रोह को रोकना, जासूसी करना और नागरिकों को इस्लामिक आदर्श के मुताबिक तैयार करना है.यह स्कूलों और विश्वविद्यालयों में भी सक्रिय रहते हैं.
  3. एयरोस्पेस फोर्स: इसके पास बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन्स (UAVs) और अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी है. यह रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को ड्रोन सप्लाई करने के लिए भी जानी जाती है.
  4. ग्राउंड फोर्सेस: यह पारंपरिक सेना की तरह है जो सीमा सुरक्षा के साथ-साथ देश के भीतर विरोध प्रदर्शनों को दबाने में बसीज की मदद करती है.
  5. नौसेना फोर्स: ईरान के समुद्र तटों की रक्षा करती है. "हिट-एंड-रन" (छापामार) युद्ध में माहिर है. होर्मूज गलियारे में ये सबसे ज्यादा एक्टिव है. मुख्य ईरानी नौसेना से अधिक तेज और फुर्तीली है.
  6. इंटेलिजेंस ऑर्गनाइजेशन: यह स्वतंत्र रूप से काम करती है. नरेटिव बनाने और तोड़ने में मुख्य भूमिका निभाती है. पत्रकारों और शासन का विरोध करने वाले इसके रडार में रहते है.
  7. इंटेलिजेंस प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन: इसका मुख्य काम IRGC के भीतर ही काउंटर-इंटेलिजेंस और सुरक्षा बनाए रखना है, ताकि जासूसी और बाहरी खतरों से बचा जा सके.
  8. सायबर डिफेंस कमांड: सायबर खतरों पर नजर रखना.ईरान के दुश्मनों को डिजिटली कन्फ्यूज करना. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान होर्मूज गलियारे में तेल के जहाजों का GPS सिस्टम हैक करके उन्हें रास्ते में भटकाना. दुश्मन के रडार में उनके ही विमानों की पहचान बदल देना इसके कुछ प्रमुख दावे हैं.

 
IRGC का हाईटेक युद्ध
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान ईरान ने एक बड़ी कंपनी के डेटा सेंटर पर बमबारी की थी. दुनिया भर की आईटी और एआई कंपनियों में खलबली मच गयी थी. इसके कुछ दिन बाद ही IRGC ने एक ऐसा फतवा जारी कर दिया जिससे युद्ध नए रास्ते की ओर जाते दिखा. IRGC ने अमेरिका और इज़रायल की ऐसी कंपनियों पर हमले की धमकी दी जिनकी तकनीकी का इस्तेमाल जंग में किया जा रहा है.

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