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चूल्हे तक आई ईरान जंग की आंच अब थाली तक पहुंचने को तैयार, अगले साल और बेकाबू होगी महंगाई: UN रिपोर्ट

अब जंग का असर सिर्फ लड़ने वाले दो मुल्कों में नहीं होता, बल्कि पूरी दुनिया पर होता है. यूक्रेन युद्ध के कारण दुनिया पहले ही तेल-गैस की किल्लत झेल रही थी, ईरान युद्ध ने उसे और बढ़ा दिया. मगर संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ने दावा किया है कि ये युद्ध 40 दिनों से ज्यादा चला तो खाने-पीने के सामानों की कीमतें बेकाबू होने लगेंगी.

चूल्हे तक आई ईरान जंग की आंच अब थाली तक पहुंचने को तैयार, अगले साल और बेकाबू होगी महंगाई: UN रिपोर्ट
खाने के सामान की कीमतों बढ़ीं तो दुनिया में कई लोगों को दो वक्त भोजन मिलना भी मुश्किल हो जाएगा.
  • मार्च में वैश्विक खाद्य कीमतें पिछले साल सितंबर के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं हैं
  • ईरान युद्ध के कारण पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें खाद्य वस्तुओं की महंगाई का मुख्य कारण हैं
  • अगर संघर्ष 40 दिनों से अधिक चलता है तो अगले साल खाद्य उत्पादन और महंगाई प्रभावित होगी

ईरान युद्ध की तपिश हर कोई महसूस कर रहा है. गैस की किल्लत से आपके चूल्हे तक आई जंग की आंच धीरे-धीरे आपकी थाली तक पहुंच रही है. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने शुक्रवार को कहा है कि मार्च में वैश्विक खाद्य कीमतें (World food prices) पिछले साल सितंबर के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं हैं और अगर ईरान युद्ध जारी रहता है तो इनमें और वृद्धि हो सकती है.

रिपोर्ट में क्या है

एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने एक बयान में कहा, "युद्ध शुरू होने के बाद से खाने-पीने के सामान की कीमतों में वृद्धि मामूली रही है, जिसका मुख्य कारण पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतें हैं. मगर दुनिया भर में अनाज अधिक मात्रा में मौजूद होने के कारण अभी महंगाई बेकाबू नहीं हुई है. लेकिन अगर संघर्ष 40 दिनों से अधिक चलता है और खेती की लागत अधिक हो जाती है, तो किसान उत्पादन कम कर सकते हैं. मतलब कम बुवाई कर सकते हैं या कम उर्वरक (खाद) वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं. इससे अलगे साल होने वाली पैदावार पर असर पड़ेगा और इस साल के बाकी बचे समय और अगले पूरे साल के लिए खाने-पीने के सामान बहुत महंगे हो जाएंगे."

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खाद्य एवं अफ्रीकी संघ (एफएओ) का खाद्य मूल्य सूचकांक वैश्विक स्तर पर कारोबार की जाने वाली खाद्य वस्तुओं की एक टोकरी में होने वाले परिवर्तनों को मापता है. फरवरी के संशोधित स्तर से 2.4% बढ़ गया है. यह एक वर्ष पहले के मूल्य से 1% अधिक है, हालांकि यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद मार्च 2022 में पहुंचे अपने उच्चतम स्तर से अभी भी लगभग 20% नीचे है.

क्या-क्या हुआ महंगा

  1. पिछले महीने की तुलना में अनाज मूल्य सूचकांक में 1.5% की वृद्धि हुई है. इसका मुख्य कारण अमेरिका में फसल की बिगड़ती संभावनाओं और ऑस्ट्रेलिया में उर्वरक की बढ़ती कीमतों के कारण कम बुवाई की आशंका है. अंतरराष्ट्रीय गेहूं की कीमतों में 4.3% की वृद्धि हुई है. वैश्विक मक्का की कीमतों में मामूली वृद्धि हुई है, क्योंकि पर्याप्त वैश्विक आपूर्ति ने उर्वरक की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंताओं को कम कर दिया है, और ऊर्जा की ऊंची कीमतों से जुड़ी इथेनॉल की बढ़ती मांग की संभावनाओं से भी अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन मिला.
  2. कटाई के समय और आयात मांग में कमी के कारण चावल की कीमतों में 3.0% की गिरावट आई. मगर वनस्पति तेल की कीमतों में 5.1% की वृद्धि हुई, जो लगातार तीसरी मासिक वृद्धि है. ताड़, सोया, सूरजमुखी और रेपसीड तेल की ऊंची कीमतों में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और जैव ईंधन की मजबूत मांग की उम्मीदों का प्रभाव झलकता है.
  3. ताड़ के तेल की कीमतें मध्य 2022 के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं. चीनी की कीमतों में मार्च में 7.2% की उछाल आई और वे अक्टूबर 2025 के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण यह उम्मीद जगी कि दुनिया का सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश ब्राजील गन्ने का अधिक उपयोग इथेनॉल उत्पादन में करेगा.
  4. मांस की कीमतों में 1.0% की वृद्धि हुई, जिसका मुख्य कारण यूरोपीय संघ में सुअर के मांस की कीमतों में वृद्धि और ब्राजील में गाय के मांस की कीमतों में वृद्धि थी, जबकि मुर्गी पालन की कीमतों में मामूली गिरावट आई. 
  5. एक अलग रिपोर्ट में, एफएओ ने 2025 के वैश्विक अनाज उत्पादन के अपने अनुमान को थोड़ा बढ़ाकर रिकॉर्ड 3.036 अरब मीट्रिक टन कर दिया है. यह पिछले वर्ष की तुलना में 5.8% अधिक होगा.

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