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ईरान-US में बीच का रास्ता छोड़िए, कोई टस से मस होने को तैयार नहीं; क्यों अब समझौता नामुमकिन लगने लगा है?

तेहरान का मानना है कि इन शर्तों को मान लेने का मतलब अपनी संप्रभुता को गिरवी रखना होगा. ईरान के इस सख्त रुख के पीछे कई ठोस कारण हैं.

ईरान-US में बीच का रास्ता छोड़िए, कोई टस से मस होने को तैयार नहीं; क्यों अब समझौता नामुमकिन लगने लगा है?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अब ऐसे मोड़ पर आ गया है जहां से शांति की राह ओझल होती दिख रही है. ईरान ने अमेरिका के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस प्रस्ताव को लेकर काफी उत्साहित थे. उन्हें उम्मीद थी कि इस प्रस्ताव में कोई रास्ता निकल सकता है. हालांकि ईरान ने इस डील को सिरे से खारिज कर दिया है. लेकिन ईरान की ओर से एक नई डील पाकिस्तानी मध्यस्थों के जरिए भेजी गई जिसे अमेरिकी राष्ट्र्पति ने खारिज कर दिया. 

तेहरान का मानना है कि इन शर्तों को मान लेने का मतलब अपनी संप्रभुता को गिरवी रखना होगा. ईरान के इस सख्त रुख के पीछे कई ठोस कारण हैं. इसमें परमाणु कार्यक्रम से लेकर सैन्य प्रभुत्व और आर्थिक हर्जाने तक की मांगे हैं.

अमेरिका की शर्तों पर ईरान का क्या कहना है?

अमेरिका की सबसे पहली और बड़ी शर्त यह है कि ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम और उससे जुड़ा पूरा बुनियादी ढांचा पूरी तरह खत्म करना होगा. ईरान इसे अपनी वैज्ञानिक प्रगति पर हमला मानता है. तेहरान का तर्क है कि परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन के लिए कर रहा है.

ईरान के मुताबिक, अपनी ही जमीन पर रिसर्च और तकनीक को नष्ट करना किसी भी संप्रभु राष्ट्र के अधिकारों का उल्लंघन है. ईरान का मानना है कि अगर वह अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों को अमेरिका के कहने पर खत्म कर देता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी बड़ी हार होगी और भविष्य में उसकी आत्मनिर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी.

होर्मुज भी डील के बीच बड़ी खाई है

अमेरिकी प्रस्ताव में एक अहम शर्त यह भी है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए पूरी तरह खुला रखे और वहां अपनी दखलंदाजी बंद करे. दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है. इस पर ईरान का भौगोलिक नियंत्रण है.

ईरान के लिए यह स्ट्रेट उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है. तेहरान को लगता है कि अगर उसने इस रास्ते पर अपना नियंत्रण छोड़ दिया, तो वह खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य और कूटनीतिक पकड़ खो देगा. अमेरिका की इस शर्त को ईरान एक ऐसी चाल के तौर पर देखता है जिससे तेहरान को रक्षात्मक रूप से पंगु बनाया जा सके.

हर्जाने की मांग पर अड़ा ईरान

शांति वार्ता में एक पेंच युद्ध में हुई नुकसान की भरपाई को लेकर फंसा है. ईरान का साफ कहना है कि इस पूरे विवाद और तनाव की शुरुआत अमेरिका ने की है. ईरान के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसकी अर्थव्यवस्था को जो अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है, शांति से पहले अमेरिका को उसका हर्जाना देना होगा.

दूसरी ओर, अमेरिका किसी भी तरह का हर्जाना देने या युद्ध जैसी स्थिति के लिए खुद को जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं है. ईरान का तर्क है कि बिना मुआवजे के शांति समझौता करना उन लाखों ईरानियों के साथ अन्याय होगा. युद्ध और प्रतिबंधों की वजह से महंगाई और किल्लत झेली है.

लीगल गारंटी की मांग कर रहे ईरानी

ईरान ने अमेरिका के सामने एक शर्त रखी है कि उसे लिखित रूप में यह 'गारंटी' दी जाए कि भविष्य में उस पर कोई हमला नहीं होगा और न ही कोई गुप्त ऑपरेशन चलाया जाएगा.

ईरान चाहता है कि यह गारंटी अंतरराष्ट्रीय कानूनी बाध्यता के साथ आए ताकि सत्ता परिवर्तन होने पर भी अमेरिका अपनी बात से न मुकर सके. ईरान के लिए बिना गारंटी का समझौता 'कोरे कागज' जैसा है, क्योंकि उसे डर है कि शर्तें मानने के बाद भी अमेरिका किसी न किसी बहाने उसे निशाना बनाना जारी रखेगा.

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